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तशरीह के साथ हदीसें

मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा है कि आपने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने मोज़ों पर मसह किया

عَنْ إِبرَاهِيمَ النَّخَعِيِّ عَنْ هَمَّامِ بنِ الحَارِثِ قَالَ: بَالَ جَرِيرٌ، ثُمَّ تَوَضَّأَ، وَمَسَحَ عَلَى خُفَّيْهِ، فَقِيلَ: تَفْعَلُ هَذَا؟ فَقَالَ: نَعَمْ، رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَالَ، ثُمَّ تَوَضَّأَ وَمَسَحَ عَلَى خُفَّيْهِ. قَالَ الأَعْمَشُ: قَالَ إِبْرَاهِيمُ: كَانَ يُعْجِبُهُمْ هَذَا الحَدِيثُ؛ لِأَنَّ إِسْلَامَ جَرِيرٍ، كَانَ بَعْدَ نُزُولِ المَائِدَةِ.
इब्राहीम नख़ई का हम्माम बिन हारिस से वर्णन है, वह कहते हैं : जरीर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने मोज़ों पर मसह किया, तो उनसे पूछा गया : आप ऐसा करते हैं? उन्होंने कहा : हाँ, मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा है कि आपने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने मोज़ों पर मसह किया। आमश ने कहा कि इब्राहीम कहते थे : लोगों को यह हदीस बहुत पसंद थी; क्योंकि जरीर (रज़ियल्लाहु अन्हु) सूरा माइदा के उतरने के बाद इस्लाम लाए थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

जरीर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु ने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने पैरों को धोने के बजाय अपने मोज़ों पर मसह कर लिया। अतः उनके आस-पास के लोगों ने उनसे पूछा : आप ऐसा करते हैं?! उन्होंने उत्तर दिया : हाँ, मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा है कि आपने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने मोज़ों पर मसह कर लिया। जरीर (रज़ियल्लाहु अन्हु) आख़िर दौर में सूरा माइदा के नाज़िल होने के बाद इस्लाम लाए थे, जिसमें वज़ू की आयत है, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि मोज़ों पर मसह करना उस आयत से मंसूख़ नहीं हुआ है।

फ़ायदे
  1. सहाबा और ताबेईन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत के अनुसरण के प्रति बड़े सजग थे।
  2. नववी कहते हैं : विश्वसनीय विद्वानों की इस बात पर सर्वसम्मति है कि सफ़र और घर, दोनों ही स्थितियों में चमड़े के मोज़ों पर मसह करना जायज़ है, चाहे इसकी कोई ज़रूरत हो या न हो। यहाँ तक कि यह उस महिला के लिए भी जायज़ है जो हर समय घर में रहती हो और उस अपाहिज व्यक्ति के लिए भी जो चल-फिर न सकता हो।
  3. जरीर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़ज़ीलत कि वह बड़े सहनशील थे, अपने छात्रों की आपत्तियों को धैर्य से सुनते थे, भले ही वे इस मामले में ग़लती पर होते।
  4. मोज़ों पर मसह का इनकार करने और उसे निरस्त बताने वालों का खंडन; क्योंकि जरीर रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस वज़ू की आयत के बाद की है।
  5. इस बात का बयान कि जिस व्यक्ति की किसी बात का खंडन किया जाए, और वह उसे सही मानता हो, तो उसके लिए उचित है कि वह उस व्यक्ति पर क्रोधित न हो जो अपनी धारणा के अनुसार उसका खंडन करता और उससे चर्चा करता है, अपितु वह उत्तम रीति से उसके सामने अपनी दलील स्पष्ट कर दे।
  6. आवश्यकता पड़ने पर इतिहास से दलील लेना।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 87) (387). صحيح مسلم (1/ 227) (272). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (7/ 39).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
मोज़ों आदि पर मसह

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com