सीधे कंटेंट पर जाएँ
तशरीह के साथ हदीसें

मोज़ों आदि पर मसह

10 हदीसें

इन्हें रहने दो; क्योंकि मैंने इन्हें वज़ू की हालत में पहने थे।

عَنْ المُغِيرَةِ رضي الله عنه قَالَ: كُنْتُ مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ، فَأَهْوَيْتُ لِأَنْزِعَ خُفَّيْهِ، فَقَالَ: «دَعْهُمَا، فَإِنِّي أَدْخَلْتُهُمَا طَاهِرَتَيْنِ» فَمَسَحَ عَلَيْهِمَا.
मुग़ीरा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : मैं एक यात्रा में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ था। मैंने आपके मोज़े उतारने के लिए हाथ बढ़ाए, तो आपने फ़रमाया : "इन्हें रहने दो; क्योंकि मैंने इन्हें वज़ू की हालत में पहने थे।" फिर आपने उनपर मसह किया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक सफ़र में थे। सफ़र के दौरान आपने वज़ू किया। वज़ू करते हुए जब पाँव धोने की बारी आई, तो मुग़ीरा बिन शोबा रज़ियल्लाहु अनहु ने आपके मोज़ों को उतारने के लिए हाथ बढ़ाया, ताकि आप पैरों को धो सकें। यह देख अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : इन मोज़ों को छोड़ दो। इनको मत उतारो। क्योंकि जब मैंने मोज़े पहने थे, उस समय मैं बावज़ू था। चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने पैरों को धोने के बजाय उनपर मसह किया।

फ़ायदे
  1. मोज़ों पर मसह की अनुमति केवल वज़ू के समय छोटी नापाकी दूर करने के लिए है। रही बात बड़ी नापाकी की, जिसमें स्नान वाजिब होता है, तो उसमें दोनों पैरों को धोना ज़रूरी है।
  2. मसह करते समय भीगे हाथों को मोज़े के ऊपरी भाग में एक बार फेर देना है। हाथों को मोज़ों के निचले भाग में नहीं फेरना है।
  3. मोज़ों पर मसह करने के लिए शर्त है कि मोज़ों को संपूर्ण वज़ू, जिसमें क़दमों को धोया गया हो, के बाद पहना गया हो, मोज़े पाक हों, क़दम के उस भाग को छुपाते हों जिसे वज़ू करते समय धोना फ़र्ज़ है, मसह बड़ी नापाकी नहीं, बल्कि छोटी नापाकी दूर करने के लिए किया जाए और शरीयत द्वारा निर्धारित समय के अंदर किया जाए। शरीयत ने ठहरे हुए व्यक्ति को एक दिन और एक रात मसह करने की अनुमति दी है, जबकि मुसाफ़िर को तीन दिन और तीन रात की अनुमति दी है।
  4. "الخفين" यानी चमड़े के मोज़ों पर दूसरी चीज़ों से बने हुए मोज़ों को भी क़यास किया जाएगा और उनपर मसह करना भी जायज़ होगा।
  5. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का उत्तम आचरण तथा शिक्षा देने का बेहतरीन तरीक़ा कि आपने मुग़ीरा रज़ियल्लाहु अनहु को मोज़े उतारने से मना किया, तो साथ में उसका कारण भी बता दिया कि मोज़े वज़ू की अवस्था में पहने गए हैं, ताकि वह संतुष्ट हो जाएं और मसला भी मालूम हो जाए।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 52) (206). صحيح مسلم (1/ 230) (274). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص50). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 36). خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص27).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मौजूद था। आप एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ लोग कूड़ा-करकट फेंका करते हैं और आपने खड़े होकर पेशाब किया।

عَنْ حُذَيْفَةَ رضي الله عنه قَالَ: كُنْتُ مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَانْتَهَى إِلَى سُبَاطَةِ قَوْمٍ، فَبَالَ قَائِمًا، فَتَنَحَّيْتُ فَقَالَ: «ادْنُهْ» فَدَنَوْتُ حَتَّى قُمْتُ عِنْدَ عَقِبَيْهِ فَتَوَضَّأَ فَمَسَحَ عَلَى خُفَّيْهِ.
हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मौजूद था। आप एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ लोग कूड़ा-करकट फेंका करते हैं और आपने खड़े होकर पेशाब किया। मैं ज़रा दूर हटकर खड़ा हो गया, तो फ़रमाया : "करीब आ जाओ।" तब मैं क़रीब आकर आपकी दोनों एड़ियों के पास खड़ा हो गया। इसके बाद आपने वज़ू किया और दोनों मोज़ों पर मसह किया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

हुज़ैफ़ा बिन यमान रज़ियल्लाहु अनहुमा कहते हैं कि वह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ थे। तो आपने पेशाब करने का इरादा किया, अतः एक जगह गए, जहाँ लोग कचरा और धूल फेंका करते थे और वहाँ खड़े होकर पेशाब किया। जबकि आम तौर पर पेशाब बैठकर ही किया करते थे। यह देखकर हुज़ैफ़ रज़ियल्लाहु अनहु आपसे दूर हटने लगे, तो आपने पास आने को कहा। तब बिल्कुल पास जाकर आपके पीछे एड़ियों के निकट खड़े हो गए, ताकि आड़ बन जाएँ और कोई आपको देख न सके। उसके बाद आपने वज़ू किया और जब पाँव धोने की बारी आई, तो मोज़ों को उतारने के बजाय उनपर मसह कर लिया। मोज़ों से मुराद पतले चमड़े आदि से बने हुए पैरों में पहनी जाने वाली ऐसी चीज़ें हैं, जो क़दमों को ढाँप कर रखती हों।

फ़ायदे
  1. मोज़ों पर मसह करना शरीयत सम्मत है।
  2. खड़े होकर पेशाब करना जायज़ है। शर्त यह है कि पेशाब के छींटे शरीर या कपड़े पर न पड़ें।
  3. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कचरा फेंकने के स्थान का चयन इसलिए किया कि आम तौर पर वह जगह नर्म होती है और पेशाब के छींटे शरीर पर पड़ने की संभवाना नहीं रहती।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 54) (224). صحيح مسلم (1/ 228) (273). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص51). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (1/ 61).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

आप हमें आदेश देते कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद के बाद अपने मोज़े न उतारें, मगर जनाबत की बात दूसरी है।

عَنْ زِرِّ بْنِ حُبَيْشٍ قَالَ: أَتَيْتُ صَفْوَانَ بْنَ عَسَّالٍ المُرَادِيَّ، أَسْأَلُهُ عَنِ المَسْحِ عَلَى الخُفَّيْنِ، فَقَالَ: مَا جَاءَ بِكَ يَا زِرُّ؟ فَقُلْتُ: ابْتِغَاءَ العِلْمِ، فَقَالَ: إِنَّ المَلاَئِكَةَ لَتَضَعُ أَجْنِحَتَهَا لِطَالِبِ العِلْمِ؛ رِضًا بِمَا يَطْلُبُ، فَقُلْتُ: إِنَّهُ حَكَّ فِي صَدْرِي المَسْحُ عَلَى الخُفَّيْنِ بَعْدَ الغَائِطِ وَالبَوْلِ، وَكُنْتَ امْرَأً مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَجِئْتُ أَسْأَلُكَ: هَلْ سَمِعْتَهُ يَذْكُرُ فِي ذَلِكَ شَيْئًا؟ قَالَ: نَعَمْ، كَانَ يَأْمُرُنَا إِذَا كُنَّا سَفْرًا أَوْ مُسَافِرِينَ أَلَّا نَنْزِعَ خِفَافَنَا ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ وَلَيَالِيهِنَّ إِلَّا مِنْ جَنَابَةٍ، لَكِنْ مِنْ غَائِطٍ وَبَوْلٍ وَنَوْمٍ، فَقُلْتُ: هَلْ سَمِعْتَهُ يَذْكُرُ فِي الهَوَى شَيْئًا؟ قَالَ: نَعَمْ، كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ فَبَيْنَا نَحْنُ عِنْدَهُ إِذْ نَادَاهُ أَعْرَابِيٌّ بِصَوْتٍ لَهُ جَهْوَرِيٍّ: يَا مُحَمَّدُ، فَأَجَابَهُ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَى نَحْوٍ مِنْ صَوْتِهِ: «هَاؤُمُ» وَقُلْنَا لَهُ: وَيْحَكَ اغْضُضْ مِنْ صَوْتِكَ، فَإِنَّكَ عِنْدَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَقَدْ نُهِيتَ عَنْ هَذَا، فَقَالَ: وَاللَّهِ لاَ أَغْضُضُ، قَالَ الأَعْرَابِيُّ: المَرْءُ يُحِبُّ القَوْمَ وَلَمَّا يَلْحَقْ بِهِمْ، قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «المَرْءُ مَعَ مَنْ أَحَبَّ يَوْمَ القِيَامَةِ»، فَمَا زَالَ يُحَدِّثُنَا حَتَّى ذَكَرَ بَابًا مِنْ قِبَلِ المَغْرِبِ مَسِيرَةُ عَرْضِهِ، أَوْ يَسِيرُ الرَّاكِبُ فِي عَرْضِهِ أَرْبَعِينَ أَوْ سَبْعِينَ عَامًا.
ज़िर्र बिन हुबैश से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं मोज़ों पर मसह के विषय में पूछने के लिए सफ़वान बिन अस्साल मुरादी के पास गया। उन्होंने आने का कारण जानना चाहा तो मैंने बताया कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए आया हूँ। इसपर वह बोले : ज्ञान प्राप्त करने वाले से प्रसन्न होकर फ़रिश्ते उसके सम्मान में अपने पंख बिछा देते हैं। मैंने कहा : मेरे दिल में पेशाब और पाखाने के बाद मोज़ों पर मसह के बारे में संदेह पैदा हो गया है। चूँकि आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा में से हैं, इसलिए आपके पास यह पूछने के लिए आया हूँ कि क्या आपने इस बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कुछ कहते हुए सुना है? कहा : हाँ, आप हमें आदेश देते कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद के बाद अपने मोज़े न उतारें, मगर जनाबत की बात दूसरी है। मैंने कहा कि क्या आपने नबी को प्रेम के बारे में कुछ कहते सुना है? कहा : हाँ, हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ एक सफ़र में थे। हम आपके पास ही थे कि एक देहाती ने ऊँची आवाज़ में आपसे कहा कि 'ऐ मुहम्मद!' अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी उसे उसी जैसी आवाज़ में उत्तर दिया कि 'हाँ, बोलो।' हमने उससे कहा : तेरा बुरा हो, ज़रा धीमी आवाज़ में बात कर ले, तू नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास है और तुझे इससे मना किया गया है। उस देहाती ने कहा : अल्लाह की क़सम! मैं धीमी आवाज़ में बात नहीं करूँगा। देहाती ने कहा : आदमी कुछ लोगों से प्रेम करता है और (कर्म के मामले में) उनके निकट पहुँच नहीं पाता? तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : आदमी क़यामत के दिन उसी के साथ होगा, जिससे प्रेम करता है। इस तरह, वह हमें हदीस सुनाते गए, यहाँ तक कि उन्होंने पश्चिम की ओर स्थित एक द्वार का ज़िक्र किया, जिसकी चौड़ाई इतनी है कि एक सवार उसकी चौड़ाई में चालीस या सत्तर साल चलता रहे।
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

ज़िर्र बिन हुबैश, सफ़वान बिन अस्साल रज़ियल्लाहु अन्हु के पास मोज़ों पर मसह के बारे में पूछने के लिए आए। तो सफ़वान रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : ऐ ज़िर्र, तुम किस लिए आए हो? ज़िर्र ने कहा : ज्ञान प्राप्त करने के लिए। उन्होंने कहा : फ़रिश्ते ज्ञान प्राप्त करने वाले से प्रसन्न होकर और उसके काम का सम्मान करते हुए, उसके लिए अपने पंख बिछा देते हैं। ज़िर्र ने कहा : मेरे दिल में पाखाने और पेशाब के बाद मोज़ों पर मसह के बारे में संदेह पैदा हो गया है, और आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों में से हैं, इसलिए मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि क्या आपने नबी को इस बारे में कुछ कहते हुए सुना है? सफ़वान ने कहा : हाँ, आप हमें आदेश देते थे कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद के बाद अपने मोज़े न उतारें। हाँ, मगर जनाबत की बात दूसरी है क्योंकि जनाबत के बाद इसको उतारना अनिवार्य है। मैंने कहा कि क्या आपने उन्हें प्रेम के बारे में कुछ कहते सुना है? उन्होंने कहा : हाँ, हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ एक सफ़र में थे। हम आपके पास ही थे कि एक देहाती ने आपको बुलन्द आवाज़ से पुकारा : ऐ मुहम्मद! तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी उसी की आवाज़ के क़रीब बुलन्द आवाज़ में जवाब दिया : इधर आओ। हमने उससे कहा : तेरी ख़राबी हो! अपनी आवाज़ धीमी रख, क्योंकि तू नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास है और तुझे आपके पास आवाज़ बुलन्द करने से मना किया गया है। तो उसने अक्खड़ता दिखाते हुए कहा : अल्लाह की क़सम, मैं अपनी आवाज़ धीमी नहीं करूँगा। देहाती ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! आदमी नेक लोगों से प्रेम करता है, लेकिन उनके जैसे कर्म नहीं कर पाता? तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : आदमी क़यामत के दिन उसी के साथ होगा, जिससे वह प्रेम करता है। ज़िर्र ने कहा : फिर सफ़वान हमें हदीस सुनाते रहे, यहाँ तक कि उन्होंने शाम की दिशा में स्थित तौबा के एक द्वार का ज़िक्र किया, जिसे अल्लाह ने उसी दिन बनाया था, जिस दिन आकाशों और धरती को बनाया था, जिसकी चौड़ाई में एक सवार को चालीस या सत्तर साल चलना पड़ जाए, और जो उस समय तक बंद नहीं होगा, जब तक कि सूरज पश्चिम से न निकल आए।

फ़ायदे
  1. ज्ञान प्राप्त करने की फ़ज़ीलत, ज्ञान अर्जित करने वाले की महान प्रतिष्ठा और फ़रिश्तों का उसका सम्मान करना।
  2. ताबेईन रह़िमहुमुल्लाह सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से ज्ञान प्राप्त करने के बड़े उत्सुक हुआ करते थे।
  3. मोज़ों पर मसह जायज़ है। उसकी अवधि मुसाफ़िर के लिए तीन दिन एवं तीन रातें, तथा ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एवं एक रात है।
  4. मोज़ों पर मसह केवल छोटी नापाकी के समय होगा।
  5. कोई पूछने वाला व्यक्ति आलिम (जानकार) से यह पूछ सकता है कि उसकी दलील कोई नस्स (क़ुरआन एवं हदीस का उद्धरण) है अथवा उसका अपना तर्क एवं इज्तिहाद और जानकार को इस पर कोई हर्ज या बुरा नहीं महसूस करना चाहिए।
  6. विद्वानों तथा सदाचारियों के साथ अदब एवं शिष्टता का व्यवहार करना, तथा ज्ञान की सभाओं में आवाज़ धीमी रखना।
  7. अज्ञान व्यक्ति को उत्तम शिष्टाचार तथा आचरण के नियमों की शिक्षा देना।
  8. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहनशीलता, अच्छे आचरण, तथा लोगों को उनके ज्ञान और बुद्धि के अनुसार संबोधित करने की नीति का अनुसरण करने की प्रेरणा।
  9. मुबारकपुरी कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने केवल उस पर दया के कारण अपनी आवाज़ बुलंद की, ताकि अल्लाह तआला के इस फ़रमान : {अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न करो} के कारण उसका कर्म नष्ट न हो जाए। अतः, आपने उसकी अज्ञानता के कारण उसे क्षमा कर दिया, और उसपर अपनी अत्यधिक करुणा के कारण अपनी आवाज़ इतनी बुलंद कर दी कि उसकी आवाज़ के बराबर या उससे भी ऊंची हो गई।
  10. नेक लोगों के साथ रहने, उनका निकटता प्राप्त करने और उनसे प्रेम करने का इच्छुक होना।
  11. नववी कहते हैं : उनके साथ होने से यह आवश्यक नहीं हो जाता है कि उसका दर्जा और बदला हर लिहाज़ से उनके जैसा हो।
  12. आशा और उम्मीद का द्वार खोलना, नजात का शुभ समाचार देना और उपदेश में कोमलता।
  13. अल्लाह की दया की विशालता एवं तौबा का द्वार खोलना।
  14. तौबा करने में जल्दी करने, अपना मुहासबा (आत्म-निरीक्षण) करने और अल्लाह की ओर लौट आने की प्रेरणा।
हवाला

سنن الترمذي (5/ 505) (3535). سنن ابن ماجه (1/ 302) (478). مسند أحمد (30/ 18) (18095). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 36). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 107). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 57). المعجم الوسيط (2/ 968).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते हुए देखा है।

عن عبد خير، عن علي رضي الله عنه ، قال: لو كان الدين بالرأي لكان أسفل الخُفِّ أولى بالمسح من أعلاه، وقد «رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح على ظَاهر خُفَيْهِ».
अब्द-ए-ख़ैर, अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णन करते हैं कि उन्होंने कहा : यदि धर्म का आधार राय होता, तो मोज़े के ऊपरी भाग के बजाय निचले भगा का मसह करना अधिक उचित होता। हालाँकि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते हुए देखा है।”
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अली -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि यदि धर्म का आधार अल्लाह की वाणी एवं उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत के बजाय अक़्ल होता, तो मोज़े के ऊपरी भाग के बजाय निचले भाग का मसह करना अधिक उचित होता। क्योंकि उसके निचले भाग का संपर्क धरती से रहता है और उसमें गंदगियाँ एवं धूल-मिट्टी आदि लगती हैं। अतः विवेक यही कहता है कि मसह उसी का होना चाहिए। लेकिन शरीयत का आदेश इससे भिन्न है। अतः अमल उसी पर करना है और सुन्नत के विपरीत राय को छोड़ देना है। अली -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते देखा है और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का अमल एक अन्य दृष्टिकोण से अक़्ल के अनुरूप भी है। क्योंकि पानी से निचले भाग का मसह उससे नजासत के चिपकने का सबब बनेगा। अतः ऊपरी भाग के मसह का आदेश दिया गया, ताकि उससे लगी हुई धूल साफ़ हो जाए। क्योंकि नज़र तो ऊपरी भाग ही आता है। अतः मसह भी उसी का होना चाहिए। याद रहे कि शरई आदेश एवं निर्देश, सारे के सारे, स्वस्थ विवेक के अनुरूप हैं। लेकिन कभी-कभी यह बात कुछ लोगों की पहुँच से बाहर रह जाती है।

हवाला

سنن أبي داود، تأليف: سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، الناشر: المكتبة العصرية، صيدا. مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، تأليف: علي بن سلطان القاري، الناشر: دار الفكر، الطبعة: الأولى، 1422هـ. مشكاة المصابيح، تأليف: محمد بن عبد الله التبريزي، تحقيق : محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: المكتب الإسلامي، الطبعة: الثالثة، 1985م. تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف: صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، الطبعة: الأولى، 1427 هـ - 2006 م. توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن بن صالح البسام، الناشر: مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. سبل السلام شرح بلوغ المرام، تأليف: محمد بن إسماعيل بن صلاح الصنعاني، الناشر: دار الحديث الطبعة: بدون طبعة وبدون تاريخ. شرح سنن أبي داود، تأليف: عبد المحسن بن حمد بن عبد المحسن العباد، نسخة الإلكترونية.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक सेना भेजी, जिन्हें ठंडी लग गई। जब वे वापस आए, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें पगड़ियों तथा मोज़ों पर मसह करने का आदेश दिया।

عن ثوبان رضي الله عنه ، قال: «بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سَرِيَّةً، فأصابهم البَرْد فلما قَدِموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم أمَرَهُم أن يَمْسَحوا على الْعَصَائِب والتَّسَاخِين».
सौबान -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं : “अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक सेना भेजी, जिन्हें ठंडी लग गई। जब वे वापस आए, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें पगड़ियों तथा मोज़ों पर मसह करने का आदेश दिया।”
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

سنن أبي داود، تأليف: سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، الناشر: المكتبة العصرية، صيدا. مسند الإمام أحمد، تأليف: أحمد بن محمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرناؤوط وغيره، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ. صحيح أبي داود - الأم، للألباني، نشر: مؤسسة غراس للنشر والتوزيع، الكويت، الطبعة: الأولى، 1423هـ - 2002 م. توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن بن صالح البسام، الناشر: مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة، الطبعة الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. فتح ذي الجلال والإكرام، شرح بلوغ المرام، تأليف: محمد بن صالح بن محمد العثيمين، الناشر: المكتبة الإسلامية، تحقيق: صبحي بن محمد رمضان، وأُم إسراء بنت عرفة. منحة العلام في شرح بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن صالح الفوزان، الناشر: دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى ، 1427 هـ - 1431 هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

जब तुममें से कोई वज़ू करे और उसके बाद मोज़े पहने, तो उनको पहनकर नमाज़ पढ़े और उनपर मसह करे और चाहे तो उन्हें जुनबी हो जाने के सिवा किसी परिस्थिति में न उतारे।

عَنْ أَنَسٍ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِذَا تَوَضَّأَ أَحَدُكُمْ وَلَبِسَ خُفَّيْهِ فَلْيُصَلِّ فِيهِمَا، وَلْيَمْسَحْ عَلَيْهِمَا ثُمَّ لَا يَخْلَعْهُمَا إِنْ شَاءَ إِلَّا مِنْ جَنَابَةٍ».
अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई वज़ू करे और उसके बाद मोज़े पहने, तो उनको पहनकर नमाज़ पढ़े और उनपर मसह करे और चाहे तो उन्हें जुनबी हो जाने के सिवा किसी परिस्थिति में न उतारे।"
इसे दाराक़ुतनी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि जब कोई मुसलमान वज़ू करने के बाद मोज़े पहने और उसके बाद वज़ू टूट जाने के कारण दोबारा वज़ू करना चाहे, तो इस बात की अनुमति है कि अगर चाहे तो एक निर्धारित अवधि तक मोज़ों को उतारने के बजाय उनपर मसह कर लिया करे। परन्तु, जुनबी हो जाने की अवस्था में मोज़े उतारकर पैरों को धोना पड़ेगा।

फ़ायदे
  1. मोज़ों पर मसह उसी अवसथा में जायज़ है, जब उनको पूरे तौर पर तहारत प्राप्त करने के बाद पहना जाए।
  2. मसह की अवधि : ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात है और यात्री के लिए तीन दिन तीन रात।
  3. मोज़ों पर मसह केवल छोटी नापाकी को दूर करते समय किया जा सकता है, बड़ी नापाकी को दूर करते समय नहीं। बड़ी नापाकी को दूर करते समय मोज़ों पर मसह करना जायज़ नहीं है। इस अवस्था में मोज़ों को उतारकर क़दमों को धोना पड़ेगा।
  4. यहूदियों की मुख़ालफ़त के तौर पर जूता और मोज़ा पहनकर नमाज़ पढ़ना मुसतहब है। लेकिन यह उसी अवस्था में है, जब दोनों पाक हों और उनसे नमाज़ियों को कष्ट न होता हो या मस्जिद में गंदगी न फ़ैलती हो। मसलन फ़र्श वाली मस्जिदों में जूता पहनकर नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी।
  5. मोज़ों पर मसह की अनुमति दरअसल इस उम्मत के लिए आसानी पैदा करने और उसका बोझ हल्का करने का एक रूप है।
हवाला

سنن الدارقطني (1/ 376) (781). توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، لعبد الله البسام (1/ 274). سبل السلام شرح بلوغ المرام، للصنعاني (1/ 86).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

इन्होंने उसे मार डाला है, अल्लाह इनका विनाश करे! जब इन्हें पता नहीं था, तो इन्होंने किसी से पूछ क्यों नहीं लिया? क्योंकि न जानने का इलाज पूछना ही है। उसके लिए तो बस इतना काफ़ी था कि तयम्मुम कर लेता और अपने ज़ख़्म पर एक कपड़े का टुकड़ा (या पट्टी) बाँध लेता और फिर उसपर मसह कर लेता और पूरे शरीर को धो लेता

عن جابر رضي الله عنه قال: خرجنا في سَفَر فأصاب رجُلا مِنَّا حَجَرٌ فَشَجَّهُ في رأسه، ثم احتلم فسأل أصحابه فقال: هل تجدون لي رُخْصَة في التَّيمم؟ فقالوا: ما نَجِد لك رُخْصَة وأنت تَقْدِرُ على الماء فاغْتَسَل فمات، فلمَّا قَدِمْنَا على النبي صلى الله عليه وسلم أخبر بذلك فقال: «قَتَلُوه قَتَلَهُم الله ألا سَألُوا إذ لم يعلموا فإنَّما شِفَاء العِيِّ السؤال، إنما كان يَكفيه أن يَتيمَّم ويَعْصِر-أو يَعْصِب- على جُرحِه خِرقَة، ثم يمسح عليها، ويَغسل سائر جسده».
जाबिर (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि हम एक यात्रा में निकले हुए थे कि हममें से एक व्यक्ति को एक पत्थर आ लगा और उसका सर ज़ख़्मी हो गया। फिर उसे स्वप्नदोष हो गया। ऐसे में, उसने अपने साथियों से पूछा कि क्या तुम मेरे लिए तयम्मुम करने की छूट पाते हो? उन्होंने उत्तर दिया: चूँकि तुम्हारे लिए पानी उपलब्ध है, इसलिए हम तुम्हारे लिए तयम्मुम की छूट नहीं पाते। अतः, उसने स्नान कर लिया और मर गया। जब हम अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास पहुँचे और आपको इसके बारे में बताया गया, तो आपने फ़रमाया: इन्होंने उसे मार डाला है, अल्लाह इनका विनाश करे! जब इन्हें पता नहीं था, तो इन्होंने किसी से पूछ क्यों नहीं लिया? क्योंकि न जानने का इलाज पूछना ही है। उसके लिए तो बस इतना काफ़ी था कि तयम्मुम कर लेता और अपने ज़ख़्म पर एक कपड़े का टुकड़ा (या पट्टी) बाँध लेता और फिर उसपर मसह कर लेता और पूरे शरीर को धो लेता।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन लि-ग़ैरिही (अन्य सनदों अथवा रिवायतों के साथ मिलकर हसन)
हवाला

سنن أبي داود، تأليف: سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، الناشر: المكتبة العصرية، صيدا. سنن ابن ماجه، تأليف: محمد بن يزيد بن ماجه القزويني، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: الناشر: دار إحياء الكتب العربية. مشكاة المصابيح، تأليف: محمد بن عبد الله، التبريزي، تحقيق: محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: المكتب الإسلامي، الطبعة: الثالثة، 1985م. معالم السنن، تأليف: حمد بن محمد بن إبراهيم الخطابي، الناشر: المطبعة العلمية، الطبعة: الأولى 1351 هـ. النهاية في غريب الحديث والأثر، تأليف: مجد الدين أبو السعادات المعروف بابن الأثير، الناشر: المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م، تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي. معجم اللغة العربية المعاصرة، تأليف: د/ أحمد مختار عبد الحميد عمر، بمساعدة فريق عمل، الناشر: عالم الكتب، الطبعة: الأولى، 1429 هـ - 2008م. تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف: صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، الطبعة: الأولى، 1427 هـ - 2006 م. توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، تأليف: عبد الله البسام، الناشر: مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. فتح ذي الجلال والإكرام، شرح بلوغ المرام، تأليف: محمد بن صالح بن محمد العثيمين، الناشر: المكتبة الإسلامية، تحقيق: صبحي بن محمد رمضان، وأُم إسراء بنت عرفة. سبل السلام شرح بلوغ المرام، تأليف: محمد بن إسماعيل بن صلاح الصنعاني، الناشر: دار الحديث، الطبعة: بدون طبعة وبدون تاريخ. شرح سنن أبي داود، تأليف: عبد المحسن بن حمد بن عبد المحسن العباد، نسخة الإلكترونية.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यात्री के लिए तीन दिन तीन रात और ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात निर्धारित की है

عن شريح بن هانئ، قال: أتيتُ عائشة أسألها عن المسح على الخُفَّين، فقالت: عَلَيْكَ بِابْنِ أبِي طالب، فَسَلْهُ فإِنَّه كان يُسَافِرُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فسألناه فقال: «جَعَلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ وَلَيَالِيَهُنَّ للمسافر، ويوما وليلة للمُقيم».
शुरैह बिन हानी कहते हैं कि मैं आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) के पास, उनसे मोज़ों पर मसह करने की अवधि पूछने के लिए आया, तो उन्होंने बताया: तुम अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास जाओ और उनसे पूछो; क्योंकि वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ सफ़र किया करते थे। हमने उनसे पूछा, तो बताया: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यात्री के लिए तीन दिन तीन रात और ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात की अवधि निर्धारित की है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423 هـ. توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة 1423هـ، 2003م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर
10 में से 8
10 हदीसें
  1. इन्हें रहने दो; क्योंकि मैंने इन्हें वज़ू की हालत में पहने थे।
  2. मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मौजूद था। आप एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ लोग कूड़ा-करकट फेंका करते हैं और आपने खड़े होकर पेशाब किया।
  3. आप हमें आदेश देते कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद के बाद अपने मोज़े न उतारें, मगर जनाबत की बात दूसरी है।
  4. मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते हुए देखा है।
  5. अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक सेना भेजी, जिन्हें ठंडी लग गई। जब वे वापस आए, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें पगड़ियों तथा मोज़ों पर मसह करने का आदेश दिया।
  6. जब तुममें से कोई वज़ू करे और उसके बाद मोज़े पहने, तो उनको पहनकर नमाज़ पढ़े और उनपर मसह करे और चाहे तो उन्हें जुनबी हो जाने के सिवा किसी परिस्थिति में न उतारे।
  7. इन्होंने उसे मार डाला है, अल्लाह इनका विनाश करे! जब इन्हें पता नहीं था, तो इन्होंने किसी से पूछ क्यों नहीं लिया? क्योंकि न जानने का इलाज पूछना ही है। उसके लिए तो बस इतना काफ़ी था कि तयम्मुम कर लेता और अपने ज़ख़्म पर एक कपड़े का टुकड़ा (या पट्टी) बाँध लेता और फिर उसपर मसह कर लेता और पूरे शरीर को धो लेता
  8. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यात्री के लिए तीन दिन तीन रात और ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात निर्धारित की है
  9. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुसाफ़िर के लिए तीन दिन तथा तीन रात एवं घर पर रहने वाले के लिए एक दिन एवं एक रात इस बात की छूट दी है कि जब वह वज़ू करके मौज़े पहने, तो उनपर मसह कर सकता है।
  10. मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा है कि आपने पेशाब किया, फिर वज़ू किया और अपने मोज़ों पर मसह किया

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com