अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जो व्यक्ति जिहाद के दौरान या फिर कुछ लोगों के अनुसार दूसरे दिनों में भी केवल अल्लाह की प्रसन्नता एवं प्रतिफल की प्राप्ति के लिए एक दिन का रोज़ा रखेगा, अल्लाह अपने अनुग्रह से उसके और जहन्नम के बीच सत्तर साल की दूरी पैदा फ़रमा देगा।
- नववी कहते हैं : इस हदीस से जिहाद के दौरान रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत साबित होती है। लेकिन इससे अभिप्राय वह व्यक्ति है, जो रोज़ा रखने के कारण कमज़ोर न हो जाए, किसी ज़िम्मेवारी की अदायगी में रुकावट न खड़ी हो और युद्ध एवं उसे सोंपा गया युद्ध का कोई दूसरा काम बाधित न हो।
- नफ़ल रोज़ा रखने की प्रेरणा।
- रोज़े में केवल एक अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति की नीयत होना ज़रूरी है। दिखावा, शोहरत तथा दूसरे उद्देश्य न हों।
- सिंधी कहते हैं : "फ़ी सबीलिल्लाह" का एक अर्थ यह हो सकता है कि नीयत की शुद्धि हो, जबकि दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि रोज़ा युद्ध के दौरान रखा गया हो। दूसरा अर्थ ही फ़ौरन समझ में आता है।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : जहाँ तक हदीस के शब्दों "सबईन ख़रीफंन" की बात है, तो वैसे तो ख़रीफ़ साल का एक ख़ास मौसम है, लेकिन यहाँ मुराद साल ही है। यहाँ साल के अन्य मौसमों, जैसे गर्मी, जाड़ा और बहार आदि को छोड़कर विशेष रूप से ख़रीफ़ का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि ख़रीफ़ इस दृष्टिकोण से सबसे उत्कृष्ट मौसम है कि उसमें फल तोड़े जाते हैं।
صحيح البخاري (4/ 26) (2840). صحيح مسلم (2/ 808) (1153). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص346). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 465). الإفهام في شرح عمدة الأحكام، لابن باز (ص426). خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص162).