عن أنس رضي الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُفْطِرُ من الشهر حتى نظن أن لا يصوم منه، ويصوم حتى نظن أن لا يُفْطِرَ منه شيئا، وكان لا تَشَاءُ أن تراه من الليل مُصَلِيًا إلا رأيتَه، ولا نائما إلا رأيتَه.
अनस- रज़ियललाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किसी महीने में रोज़ा न रखते, यहाँ तक कि हमें लगने लगता कि इस महीने में रोज़ा रखेंगे ही नहीं और किसी महीने में रोज़ा रखते जाते, यहाँ तक कि हमें लगने लगता कि इस महीने में रोज़ा छोड़ेंगे ही नहीं। तथा तुम उनको रात में नमाज़ पढ़ते हुए देखना चाहते तो देख लेते और सोते हुए देखना चाहते तो भी देख लेते।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى 1415هـ.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر 1407هـ.
- صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «مَنْ صَامَ يَوْمًا فِي سَبِيلِ اللهِ بَاعَدَ اللهُ وَجْهَهُ عَنِ النَّارِ سَبْعِينَ خَرِيفًا».
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "जो अल्लाह के पथ में एक दिन रोज़ा रखेगा, उसके चेहरे को अल्लाह (जहन्नम की) आग से सत्तर साल दूर कर देगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जो व्यक्ति जिहाद के दौरान या फिर कुछ लोगों के अनुसार दूसरे दिनों में भी केवल अल्लाह की प्रसन्नता एवं प्रतिफल की प्राप्ति के लिए एक दिन का रोज़ा रखेगा, अल्लाह अपने अनुग्रह से उसके और जहन्नम के बीच सत्तर साल की दूरी पैदा फ़रमा देगा।
फ़ायदे
- नववी कहते हैं : इस हदीस से जिहाद के दौरान रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत साबित होती है। लेकिन इससे अभिप्राय वह व्यक्ति है, जो रोज़ा रखने के कारण कमज़ोर न हो जाए, किसी ज़िम्मेवारी की अदायगी में रुकावट न खड़ी हो और युद्ध एवं उसे सोंपा गया युद्ध का कोई दूसरा काम बाधित न हो।
- नफ़ल रोज़ा रखने की प्रेरणा।
- रोज़े में केवल एक अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति की नीयत होना ज़रूरी है। दिखावा, शोहरत तथा दूसरे उद्देश्य न हों।
- सिंधी कहते हैं : "फ़ी सबीलिल्लाह" का एक अर्थ यह हो सकता है कि नीयत की शुद्धि हो, जबकि दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि रोज़ा युद्ध के दौरान रखा गया हो। दूसरा अर्थ ही फ़ौरन समझ में आता है।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : जहाँ तक हदीस के शब्दों "सबईन ख़रीफंन" की बात है, तो वैसे तो ख़रीफ़ साल का एक ख़ास मौसम है, लेकिन यहाँ मुराद साल ही है। यहाँ साल के अन्य मौसमों, जैसे गर्मी, जाड़ा और बहार आदि को छोड़कर विशेष रूप से ख़रीफ़ का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि ख़रीफ़ इस दृष्टिकोण से सबसे उत्कृष्ट मौसम है कि उसमें फल तोड़े जाते हैं।
हवाला
صحيح البخاري (4/ 26) (2840).
صحيح مسلم (2/ 808) (1153).
تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص346).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 465).
الإفهام في شرح عمدة الأحكام، لابن باز (ص426).
خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص162).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «لا يَصُومَنَّ أحدكم يوم الجمعة، إلا أن يصومَ يومًا قبله أو بعده».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैह व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुनाः तुममें से कोई व्यक्ति जुमा के दिन हरगिज़ रोज़ा न रखे, मगर यह कि उससे पहले या उसके बाद भी एक दिन रोज़ा रख ले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जुमा के दिन रोज़ा रखने से मना किया है। लेकिन, यदि उससे पहले या उसके बाद एक दिन रोज़ा रख ले अथवा किसी का नियमित नफ़ली रोज़ा उसी दिन पड़ जाए, तो रख सकता है।
हवाला
تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه.
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426 هـ
تنبيه الأفهام شرح عمدة لأحكام لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426ه
عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408 هـ
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: أَوْصَانِي خَلِيلِي صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِثَلاَثٍ: صِيَامِ ثَلاَثَةِ أَيَّامٍ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ، وَرَكْعَتَيِ الضُّحَى، وَأَنْ أُوتِرَ قَبْلَ أَنْ أَنَامَ.
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मुझे मेरे दोस्त (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तीन चीज़ों की वसीयत की है : हर महीना तीन दिन रोज़ा रखने, चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने और सोने से पहले वित्र पढ़ने की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि उनके दोस्त और साथी यानी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको तीन बातों की वसीयत की है :
1- हर महीने तीन दिन रोज़ा रखने की।
2- हर रोज़ चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने की।
3- सोने से पहले वित्र की नमाज़ पढ़ने की। यह वसीयत विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए है, जिसे अंदेशा हो कि रात के अंतिम भाग में जाग नहीं सकेगा.
फ़ायदे
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने अलग-अलग साथियों को अलग-अलग तरह की वसीयतें इसलिए की थीं कि आप उनके हालात से अवगत थे और जानते थे कि किसके लिए क्या मुनासिब है। मसलन शारीरिक रूप से मज़बूत के लिए जिहाद, इबादतगुज़ार के लिए इबादत और आलिम के लिए इल्म मुनासिब है।
- इब्न-ए-हजर अस्क़लानी हर महीने तीन दिन के रोज़े की वसीयत के बारे में कहते हैं : बज़ाहिर ऐसा लगता है कि इन रोज़ों से मुराद हिजरी महीने के तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रवीं दिन के रोज़ें हैं।
- इब्न-ए-हजर अस्क़लानी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि वित्र की नमाज़ सोने से पहले पढ़ लेना मुसतहब है। लेकिन यह उसके हक़ में है, जिसे जाग पाने का भरोसा न हो।
- इन तीनों कार्यों का महत्व। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने कई साथियों को इनकी वसीयत की है।
- इब्न-ए- दक़ीक अल-ईद चाश्त की दो रकातों के बारे में कहते हैं : यहाँ शायद आपने कम से कम रकातों का ज़िक्र किया है, जिन्हें पढ़ने की ताकीद आई है। इस हदीस से मालूम होता है कि चाश्त की नमाज़ मुसतहब है और उसकी कम से कम रकात दो हैं।
- चाश्त की नमाज़ का समय : चाश्त की नमाज़ का समय सूरज निकलने के लगभग पंद्रह मिनट बाद से शुरू होता है और ज़ुहर की नमाज़ से लगभग दस मिनट पहले तक रहता है। यह नमाज़ कम से कम दो रकात है। जबकि ज़्यादा से ज़्यादा कितनी पढ़ी जा सकती है, इसके बारे में मतभेद है। कुछ लोगों ने आठ रकात कहा है और कुछ लोगों ने कहा है कि ज़्यादा की कोई सीमा नहीं है।
- वित्र की नमाज़ का समय : वित्र की नमाज़ का समय इशा की नमाज़ के बाद से फ़ज्र होने तक रहता है। यह नमाज़ कम से कम एक रकात और ज़्यादा से ज़्यादा ग्यारह रकात है।
हवाला
صحيح البخاري (3/ 41) (1981).
صحيح مسلم (1/ 499) (721).
تيسير العلام، للبسام (ص342).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (3/ 456).
خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص159).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن عمرو بن العاص رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إن أَحَبَّ الصيام إلى الله صِيَامُ داود، وأحب الصلاة إلى الله صلاة داود، كان يَنَامُ نِصْفَ اللَّيْلِ، وَيَقُومُ ثُلُثَهُ، وَيَنَامُ سُدُسَهُ، وكان يصوم يومًا ويُفطِرُ يومًا».
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस- रज़ियल्लाहु अन्हुमा-कहते हैं कि अल्लल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह के निकट सबसे प्रिय रोज़ा दाऊद- अलैहिस्सलाम- का रोज़ा और सबसे प्रिय नमाज़ दाऊद- अलैहिस्सलाम- की नमाज़ है। वह आधी रात सोते, फिर एक तिहाई रात नमाज़ पढ़ते और शेष छठा भाग सोते थे। इसी तरह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हवाले से बयान करते हैं कि अल्लाह के निकट सबसे प्रिय रोज़ा और सबसे प्रिय रात की नमाज़, उसके नबी दाऊद -अलैहिस्सलाम- का रोज़ा और उनकी रात की नमाज़ है। क्योंकि वह एक दिन रोज़ा रखते थे और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे, जिससे इबादत भी हो जाती और शरीर को आराम भी मिल जाता था। इसी तरह, वह रात के पहले आधे भाग में सो जाते, ताकि इबादत के लिए पूरी चुस्ती के साथ खड़े हो सकें, फिर एक तिहाई भाग नमाज़ पढ़ते और अंतिम छठा भाग सोते थे, ताकि दिन के प्रथम भाग की इबादत के लिए चुस्ती प्राप्त कर लें। यही वह कैफ़ियत है, जिसकी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने प्रेरणा दी है।
हवाला
عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ.
تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ.
تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ.
خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، تأليف: فيصل بن عبد العزيز آل مبارك، الطبعة الثانية، 1412هـ.
صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى 1422هـ.
صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن عَمْرِو بن العاص رضي الله عنهما قال: «أُخبِر رسول الله صلى الله عليه وسلم أني أقول: والله لَأَصُومَنَّ النهار، وَلَأَقُومَنَّ الليل مَا عِشْتُ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : أنت الذي قلتَ ذلك؟ فقلتُ له: قد قُلتُه -بأبي أنت وأمي-. فقال: فإنك لا تستطيع ذلك، فصُم وأفطِر، وَقُمْ وَنَمْ ، الشَّهْرِ ثَلاَثَةَ أَيَّامٍ، فَإِنَّ الحَسَنَةَ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا، وذلك مثل صيام الدَّهْرِ. قلت: فإني أُطِيقُ أفضل من ذلك. قال: فصم يوما وأَفطر يومين. قلت: أُطِيقُ أفضل من ذلك. قال: فصم يوما وأفطر يوما، فذلك مثل صيام داود، وهو أفضل الصيام. فقلت: إني أُطِيقُ أفضل من ذلك. قال: لا أفضل من ذلك»، وفي رواية: «لا صوم فوق صوم أخي داود -شَطْرَ الدَّهَرِ-، صم يوما وأفطر يوما».
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैंः किसी ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बताया कि मैं कहता हूँः अल्लाह की क़सम! जब तक जीवित रहूँगा, हमेशा दिन में रोज़ा रखूँगा और रात को नमाज़ पढ़ूँगा। अतः, आपने मुझसे कहाः क्या तुमने ही यह बात कही है? मैंने कहाः हाँ, - मेरे माता-पिता आप पर क़ुरबान हों- मैंने सचमुच यह बात कही है। आपने कहाः तुम ऐसा कर नहीं पाओगे। इसलिए रोज़ा भी रखो और बिना रोज़े के भी रहो। रात को नमाज़ भी पढ़ो और सो भी लिया करो। महीने में तीन रोज़े रखो, क्योंकि नेकी का बदला दस गुना मिलता है और इस तरह यह हमेशा रोज़ा रखने ही की तरह हुआ। मैंने कहाः लेकिन, मैं इससे अधिक की क्षमता रखता हूँ। आपने फ़रमायाः फिर एक दिन रोज़ा रखो और दो दिन बिना रोज़े के रहो। मैंने कहाः मैं इससे बेहतर कर सकता हूँ। फ़रमायाः फिर एक दिन रोज़ा रखो और एक दिन बिना रोज़े के रहो। यह दाऊद- अलैहिस्सलाम- की तरह रोज़ा हुआ और यह सर्वश्रेष्ठ रोज़ा है। मैंने कहाः मैं इससे भी अधिक कर सकता हूँ। तो आपने फ़रमायाः इससे बेहतर कुछ नहीं है। एक अन्य रिवायत में हैः मेरे भाई दाऊद के रोज़े (आधे साल के रोज़े) से बढ़कर कोई रोज़ा नहीं है। एक दिन रोज़ा रखो और एक दिन बिना रोज़े के रहो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को बताया गया कि अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहुमा- ने क़सम खाई है कि वह उम्र भर लगातार रोज़ा रखेंगे एवं कभी रोज़ा नहीं छोड़ेंगे और हमेशा रात को नमाज़ पढ़ेंगे एवं कभी सोएँगे नहीं। आपने उनसे पूछा कि सचमुच उन्होंने ऐसा कहा है? तो उत्तर दिया कि हाँ। इसपर आपने कहा कि यह तुम्हारे लिए कठिन होगा और तुम इस क़सम को निभा नहीं पाओगे। फिर उनका मार्गदर्शन किया कि वह रोज़ा भी रखें और छोड़ें भी और रात की नमाज़ भी पढ़ें तथा सोएँ भी। बस, हर महीने में तीन रोज़े रख लिया करें, ताकि उन्हें हमेशा रोज़ा रखने का सवाब मिल जाए। लेकिन उन्होंने बताया कि वह इससे अधिक रोज़े रख सकते हैं। फिर, इसी तरह वह लगातार अधिक रोज़े रखने की अनुमति माँगते गए, यहाँ तक सर्वश्रेष्ठ रोज़े यानी दाऊद अलैहिस्सलाम के रोज़े तक पहुँच गए, जिसके अनुसार एक दिन रोज़ा रखना और एक बिना रोज़े के रहना होता है। चूँकि वह नेकी के कामों की बड़ी चाहत रखते थे, इसलिए इससे भी अधिक रोज़े रखने की अनुमित माँगी, लेकिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया कि इससे उत्तम कोई रोज़ा नहीं है।
हवाला
عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ.
تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ.
تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ.
الإفهام في شرح عمدة الأحكام، للشيخ عبد العزيز بن عبد الله بن باز، تحقيق: سعيد بن علي بن وهف القحطاني، الطبعة الأولى، 1435 هـ.
خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، تأليف: فيصل بن عبد العزيز آل مبارك، الطبعة الثانية، 1412 هـ .
صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري ، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ.
صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعًا: «تُعْرَضُ الأعمالُ يومَ الاثنين والخميس، فَأُحِبُّ أَنْ يُعْرَضَ عَملي وأنا صائم».
وفي رواية: «تُفْتَحُ أبوابُ الجَنَّةِ يومَ الاثنين والخميس، فَيُغْفَرُ لكلِّ عبد لا يُشْرِكُ بالله شيئا، إِلا رجلا كان بينه وبين أخيه شَحْنَاءُ، فَيُقَالُ: أَنظِروا هذيْن حتى يَصْطَلِحَا، أنظروا هذين حتى يصطلحا».
وفي رواية: «تُعْرَضُ الأَعْمَالُ في كلِّ اثْنَيْنِ وَخَميسٍ، فَيَغْفِرُ اللهُ لِكُلِّ امْرِئٍ لا يُشْرِكُ بالله شيئاً، إِلاَّ امْرَءاً كانت بينه وبين أخِيهِ شَحْنَاءُ، فيقول: اتْرُكُوا هذَيْنِ حتى يَصْطَلِحَا».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः मैं पसंद करता हूँ कि मेरे कार्य इस दशा में पेश हों कि मैं रोज़े से रहूँ।"
एक रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को जन्नत के द्वार खोले जाते हैं और प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उस व्यक्ति के जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में कहा जाता है : इन दोनों ज़रा मोहलत दो, ताकि आपस में समझौता कर लें।"
एक और रिवायत में है : "सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः, प्रत्येक उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया जाता है, जो अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाता, सिवाय उसके जिसके तथा उसके भाई के बीच में ईर्ष्या हो। ऐसे में वह कहता है : इन दोनों को छोड़ दो, यहाँ तक कि आपस मे समझौता कर लें।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426هـ.
رياض الصالحين، للنووي، تحقيق: ماهر الفحل، دار ابن كثير - بيروت، الطبعة الأولى 1428هـ - 2007م.
صحيح مسلم, ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي, دار إحياء التراث العربي, بيروت.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين, مؤسسة الرسالة, الطبعة الرابعة عشر, 1407هـ.
إرواء الغليل في تخريج أحاديث منار السبيل، للشيخ الألباني، الناشر: المكتب الإسلامي – بيروت، الطبعة الثانية 1405 هـ - 1985م.
كنوز رياض الصالحين، نشر: دار كنوز إشبيليا، الطبعة الأولى، 1430هـ - 2009م.
سنن الترمذي، تحقيق بشار عواد، دار الغرب الإسلامي – بيروت، 1998م.
تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذي، للمباركفورى، الناشر: دار الكتب العلمية – بيروت.
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري، الناشر:دار الفكر، بيروت - لبنان، الطبعة الأولى، 1422هـ - 2002م.
فيض القدير شرح الجامع الصغير، للمناوي، الناشر: المكتبة التجارية الكبرى - مصر، الطبعة الأولى، 1356.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدَ اللَّهِ بْنِ عَمْرِو بْنِ العَاصِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنَّكَ لَتَصُومُ الدَّهْرَ، وَتَقُومُ اللَّيْلَ؟»، فَقُلْتُ: نَعَمْ، قَالَ: «إِنَّكَ إِذَا فَعَلْتَ ذَلِكَ هَجَمَتْ لَهُ العَيْنُ، وَنَفِهَتْ لَهُ النَّفْسُ، لاَ صَامَ مَنْ صَامَ الدَّهْرَ، صَوْمُ ثَلاَثَةِ أَيَّامٍ صَوْمُ الدَّهْرِ كُلِّهِ»، قُلْتُ: فَإِنِّي أُطِيقُ أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ، قَالَ: «فَصُمْ صَوْمَ دَاوُدَ عَلَيْهِ السَّلاَمُ، كَانَ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمًا، وَلاَ يَفِرُّ إِذَا لاَقَى».
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "क्या तुम दिन में हमेशा रोज़ा रखते हो और रात में हमेशा जागकर इबादत करते हो?" मैंने हाँ में उत्तर दिया, तो फ़रमाया : "ऐसा करने से आँख थक जाएगी और शरीर दुर्बल हो जाएगा। जिसने हमेशा रोज़ा रखा, उसने दरअसल रोज़ा रखा ही नहीं। महीने के तीन रोज़े साल भर रोज़ा रखने की तरह हैं।" मैंने कहा : मेरे पास इससे अधिक रोज़ा रखने की शक्ति है। आपने कहा : "तब दाऊद -अलैहिस्सलाम- का रोज़ा रखो। वह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन बिना रोज़ा के रहते थे और दुश्मन से मुक़ाबले के समय भागते नहीं थे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह सूचना मिली कि अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- साल भर लगातार रोज़ा रखते हैं और एक दिन भी रोज़ा छोड़ते नहीं हैं। इसी तरह रात-रात भर नमाज़ पढ़ते रहते हैं और सोते ही नहीं हैं। अतः उन्हें इससे मना कर दिया और फ़रमाया : रोज़ा भी रखो और बिना रोज़े के भी रहो। रात में तहज्जुद की नमाज़ भी पढ़ो और सो भी लिया करो। इसी तरह उनको लगातार रोज़ा रखने और रात-रात भर तहज्जुद की नमाज़ पढ़ने से मना किया और फ़रमाया : ऐसा करोगे, तो तुम्हारी आँख कमज़ोर हो जाएगी और अंदर धंस जाएगी। तुम्हारा शरीर जवाब दे जाएगा। जिसने साल भर रोज़ा रखा, उसने रोज़ा ही नहीं रखा। क्योंकि मनाही के विरोध के कारण सवाब से वंचित रहा और रोज़ा रखने के कारण कुछ खाया-पिया भी नहीं। इसके बाद उनको महीने में तीन दिन रोज़ा रखने का निर्देश दिया कि यह साल भर रोज़ा रखने के समान है। क्योंकि एक दिन का सवाब दस दिन के बराबर मिलेगा, जो कि नेकियों में वृद्धि की निम्नतम संख्या है। आपके इस निर्देश के बाद अब्दुल्लाह ने कहा : मेरे अंदर इससे ज़्यादा करने की शक्ति है। उत्तर में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : अगर ऐसा है तो तुम दाऊद अलैहिस्सलाम का रोज़ा रखो, जो सबसे उत्तम रोज़ा है। वह एक दिन रोज़ा रखते थे और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे और दुश्मन से मुक़ाबले के समय भागते नहीं थे, क्योंकि उनके रोज़ा रखने का तरीक़ा उनको दुर्बल होने नहीं देता था।
फ़ायदे
- हर महीने के तीन रोज़े साल भर के रोज़े की तरह हैं। क्योंकि हर नेकी का सवाब दस गुना दिया जाता है। इस तरह तीन रोज़े तीस दिन के रोज़े हुए। इसलिए जिसने हर महीने तीन रोज़े रखे, उसने गोया साल भर रोज़ा रखा।
- अल्लाह की ओर बुलाने का एक तरीक़ा यह है कि अमल की प्रेरणा दी जाए और पाबंदी के साथ अमल करने का सवाब बयान किया जाए।
- ख़त्ताबी कहते हैं : अब्दुल्लाह बिन अम्र के क़िस्से का सारांश यह है कि अल्लाह की इबादत केवल रोज़े तक सीमित नहीं है, बल्कि और भी कई प्रकार की इबादतें हैं। ऐसे में, यदि कोई व्यक्ति अपनी सारी ऊर्जा रोज़े में लगा दे, तो वह अन्य इबादतों में कोताही करेगा। इसलिए, यहाँ संतुलन बनाए रखना चाहिए, ताकि अन्य इबादतों के लिए शक्ति बची रहे। अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम द्वारा दाऊद अलैहिस्सलाम के बारे में कहे गए शब्दों से यही बात स्पष्ट होती है: "वह शत्रु का सामना करते समय भागते नहीं थे।" क्योंकि वह रोज़ा न रखकर जिहाद के लिए शक्ति प्राप्त करते थे।
- अपने ऊपर शक्ति से अधिक इबादत का बोझ डालने की मनाही। सुन्नत का अनुपालन ही सही तरीक़ा है।
- जमहूर उलेमा के यहाँ नाग़ा किए बना हमेशा रोज़ा रखना मकरूह है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति स्वयं को कष्ट दे, अपनी हानि करे और अपने ऊपर सामर्थ्य से अधिक बोझ डाले, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से मुँह फेरे और ग़ैर-सुन्नत को सुन्नत से बेहतर जाने, हराम होगा।
हवाला
صحيح البخاري (3/ 40) (1979).
صحيح مسلم (2/ 812) (1159).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 214).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (3/ 297).
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