अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर फ़र्ज़ नमाज़ से सलाम फेरने के बाद इन महत्वपूर्ण ज़िक्र द्वारा अल्लाह का गुणगान करते थे। इस ज़िक्र का अर्थ है : अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। उसके पूज्य तथा रब होने और उसके नामों तथा गुणों में उसका कोई साझी नहीं है। उसी की संपूर्ण तथा समग्र बादशाहत है। वही आकाशों, धरती तथा दोनों के बीच की सारी चीज़ों का मालिक है। वह हर एतबार से संपूर्ण है। उसकी संपूर्णता हर हाल में प्रेम तथा सम्मान के साथ बयान की जाएगी। खुशी में भी और ग़म में भी। उसकी शक्ति एवं सामर्थ्य हर एतबार से संपूर्ण है। कोई काम उसके वश से बाहर का नहीं है। ऐसा कोई काम नहीं है, जो वह कर न सके। एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने और अल्लाह की अवज्ञा की राह को छोड़कर उसके आज्ञापालन की राह अपनाने की शक्ति अल्लाह के सुयोग प्रदान किए बिना किसी के पास नहीं है। वही असल मददगार है और उसी पर सारा भरोसा है। इसके बाद दोबारा "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा उपास्य नहीं है। हम केवल उसी की उपासना करते हैं" कहकर इस बात की ताकीद की गई है कि अल्लाह ही एकमात्र सत्य पूज्य है उसका कोई साझी नही है और उसके अतिरिक्त कोई इबादत का हक़दार नहीं है। वही सब नेमतों को पैदा करता है, वही उनका मालिक है और अपने जिस बंदे को चाहता है, नेमतें प्रदान करता है। उसी की उत्कृष्ट प्रशंसा है, उसकी ज़ात, गुणों, कार्यों, नेमतों तथा हर अवस्था पर। उसके अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है। हम विशुद्ध रूप से उसी की इबादत करते हैं। अपनी इबादत में रियाकारी और दिखावा को दाख़िल होने नहीं देते। हम पूरी दृढता के साथ अल्लाह को एक मानते और उसकी इबादत करते हैं, चाहे यह बात काफ़िरों को बुरी ही क्यों न लगे।
- इस ज़िक्र को हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पाबंदी के साथ पढ़ना मुसतहब है।
- एक मुसलमान अपने दीन पर अभिमान करता है और उसके प्रतीकों का खुलकर पालन करता है, चाहे काफ़िरों को बुरा ही क्यों न लगे।
- हदीस में जब "دُبر الصلاة" (नमाज़ के बाद) के शब्द आएँ और हदीस में जिस चीज़ का उल्लेख हुआ है, वह ज़िक्र हो, तो असलन उससे मुराद सलाम के बाद होगा, इसके बजाय अगर दुआ हो, तो मुराद सलाम से पहले होगा।
صحيح مسلم (1/ 415) (594). سبل السلام شرح بلوغ المرام، للصنعاني (1/ 293). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 61). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخِن وغيره (2/ 973). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 499). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (2/ 762). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 492).