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तशरीह के साथ हदीसें

इमाम (शासनाध्यक्ष) के विरुद्ध विद्रोह

6 हदीसें

हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कठिनाई और आसानी में, चुस्ती और सुस्ती में और हमारे ऊपर तरजीह दिए जाने की अवस्था में भी सुनेंगे और अनुसरण करेंगे

عن عُبَادَةَ بن الصَّامتِ رضي الله عنه قال: بَايَعْنَا رسولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم على السَّمْعِ وَالطَّاعَةِ فِي الْعُسْرِ وَالْيُسْرِ، وَالْمَنْشَطِ وَالْمَكْرَهِ، وعلى أَثَرَةٍ علينا، وعلى أَلَّا نُنَازِعَ الْأَمْرَ أهلَه، وعلى أَنْ نَقُولَ بِالْحَقِّ أينما كُنَّا، لا نَخَافُ في الله لَوْمَةَ لَائِمٍ.
उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कठिनाई और आसानी में, चुस्ती और सुस्ती में और हमारे ऊपर तरजीह दिए जाने की अवस्था में भी सुनेंगे और अनुसरण करेंगे। और इस बात पर बैअत की कि हम शासकों से शासन के मामले में नहीं झगड़ेंगे और जहाँ कहीं भी होंगे, हक़ बात कहेंगे और इस विषय में किसी निंदा करने वाले की निंदा की परवाह नहीं करेंगे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से इस बात की प्रतिज्ञा ली कि वे आसान तथा कठिन हालत और धनवान् तथा निर्धन होने की अवस्था में, शासकों के आदेश उनको पसंद हों या न हों, यहाँ तक कि शासक सार्वजनिक धन एवं पदों आदि के मामले में उनपर किसी और को तरजीह ही क्यों न देते हों, उनकी बात मानकर चलेंगे और उनके विरुद्ध बग़ावत नहीं करेंगे। क्योंकि उनसे लड़ने के नेतीजे में जो फ़ितना व फ़साद मचेगा, वह उनके अत्याचार के नतीजे में होने वाले फ़ितना व फ़साद से अधिक बड़ा है। आपने उनसे इस बात की भी प्रतिज्ञा ली कि जहाँ भी रहेंगे अल्लाह के लिए सत्य ही कहेंगे और किसी की निंदा की परवाह नहीं करेंगे।

फ़ायदे
  1. शासकों की सुनने और उनका अनुसरण का परिणाम यह होगा कि मुसलमान एकजुट रहेंगे और उनके बीच फूट नहीं पड़ेगी।
  2. शासकों की बातों को, जब तक वे अल्लाह की नाफ़रमानी का आदेश न दें, सुनना और मानना ज़रूरी है। आसान परिस्थिति में भी और कठिन परिस्थिति में भी। पसंद हो तब भी और नापसंद हो तब भी तथा किसी और को तरजीह दी जाए, तब भी।
  3. हम जहाँ भी रहें, किसी की निंदा की परवाह किए बिना सत्य कहना वाजिब है।
हवाला

صحيح البخاري (9/ 47) (7055-7056)، (9/ 77) (7199، 7200). صحيح مسلم (3/ 1470) (1709). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 277). رياض الصالحين، للنووي (ص83) (186). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 419). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 202).

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तुमपर ऐसे शासक नियुक्त हो जाएँगे, जिनके कुछ काम तुम्हें अच्छे लगेंगे और कुछ बुरे। ऐसे में जो (उनके बुरे कामों को) बुरा जानेंगे, वह बरी हो जाएँगे और जो खंडन करेंगे, वह सुरक्षित रहेंगे। परन्तु जो उनको ठीक जानेंगे और शासकों की हाँ में हाँ मिलाएँगे (वह विनाश के शिकार होंगे)।

عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ أُمِّ المُؤمنين رضي الله عنها: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «سَتَكُونُ أُمَرَاءُ فَتَعْرِفُونَ وَتُنْكِرُونَ، فَمَنْ عَرَفَ بَرِئَ، وَمَنْ أَنْكَرَ سَلِمَ، وَلَكِنْ مَنْ رَضِيَ وَتَابَعَ» قَالُوا: أَفَلَا نُقَاتِلُهُمْ؟ قَالَ: «لَا، مَا صَلَّوْا».
मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "तुमपर ऐसे शासक नियुक्त हो जाएँगे, जिनके कुछ काम तुम्हें अच्छे लगेंगे और कुछ बुरे। ऐसे में जो (उनके बुरे कामों को) बुरा जानेंगे, वह बरी हो जाएँगे और जो खंडन करेंगे, वह सुरक्षित रहेंगे। परन्तु जो उनको ठीक जानेंगे और शासकों की हाँ में हाँ मिलाएँगे (वह विनाश के शिकार होंगे)।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हम उनसे युद्ध न करें? फ़रमाया : "नहीं! जब तक वे नमाज़ पढ़ते रहें।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि हमारे शासक ऐसे लोग बन जाएँगे, जिनके कुछ काम शरीयत के अनुसार होने के कारण हमको सही लगेंगे और कुछ शरीयत विरोधी होने के कारण हमकों ग़लत लगेंगे। ऐसे में जो उनके ग़लत कामों को अपने दिल से बुरा जानेगा और इस स्थिति में नहीं होगा कि उनका खंडन कर सके, तो वह गुनाह एवं मुनाफ़िकत से बरी माने जाएगा। इसी तरह जिसके पास हाथ से रोकने या ज़बान से खंडन करने की शक्ति होगी और वह इस शक्ति का उपयोग करेगा, वह गुनाह तथा उसमें शरीक होने से सुरक्षित रहेगा। इसके विपरीत जो उनके इन बुरे कामों को अच्छा जानेगा और उनके पद्चिह्नों पर चलेगा, वह उनकी ही तरह विनाश का शिकार हो जाएगा। फिर सहाबा ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा किया क्या हम इस तरह के शासकों से युद्ध न करें, तो आपने उनको इससे मना किया और फ़रमाया कि नहीं, ऐसा उस समय तक न करना, जब तक वे नमाज़ क़ायम करते रहें।

फ़ायदे
  1. मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अल्लाह के नबी होने का एक प्रमाण यह है कि आपने आने वाले समय में घटने वाली कुछ घटनाओं की भविष्यवाणी की और वह घटनाएँ उसी तरह सामने भी आ गईं, जिस तरह आपने भविष्यवाणी की थी।
  2. ग़लत काम के प्रति सहमति व्यक्त करना और उसमें शरीक होना जायज़ नहीं, बल्कि उसका खंडन ज़रूरी है।
  3. जब शासक शरीयत विरोधी काम करने लगें, तो इन कामों में उनका अनुसरण जायज़ नहीं है।
  4. मुस्लिम शासकों के विरुद्ध बग़ावत करना जायज़ नहीं है। क्योंकि इसके नतीजे में फ़साद बरपा होगा, रक्तपात होगा और शांति भंग होगी। इसलिए नाफ़रमान शासकों के निंदनीय व्यवहार को सहना और उनके दुर्व्यवहार पर सब्र करना इससे आसान है।
  5. नमाज़ बड़े महत्व वाली चीज़ है। नमाज़ ही कुफ़्र एवं इस्लाम के बीच अंतर करने वाली चीज़ है।
हवाला

صحيح مسلم (3/ 1480) (1854). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (4/ 64). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (32/ 206). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 279). تطريز رياض الصالحين، لفيصل بن عبد العزيز المبارك (ص150). الشرح الممتع على زاد المستقنع، لابن عثيمين (11/ 323). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 435). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين (1/ 211).

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सब्र से काम लो। क्योंकि हर बाद में आने वाला समय पहले वाले के मुक़ाबले में बुरा होगा, यहाँ तक कि तुम अपने रब से जा मिलो।

عن الزبير بن عدي، قال: أَتَيْنَا أنسَ بنَ مَالِكٍ رضي الله عنه فَشَكَوْنَا إليه ما نَلْقَى من الحَجَّاجِ، فقال: «اصْبِرُوا، فإنه لا يأتي زمانٌ إلا والذي بعده شَرٌّ منه حَتَّى تَلْقَوا رَبَّكُم» سمعتُه من نَبِيِّكُم صلى الله عليه وسلم .
ज़ुबैर बिन अदी कहते हैं कि हम लोग अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास आए और उनसे हज्जाज के अत्याचार की शिकायत की, तो फ़रमायाः "सब्र से काम लो। क्योंकि हर बाद में आने वाला समय पहले वाले के मुक़ाबले में बुरा होगा, यहाँ तक कि तुम अपने रब से जा मिलो।" यह बात मैंने ख़ुद तुम्हारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से सुनी है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

ज़ुबैर बिन अदी कुछ लोगों के साथ अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सेवक अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- के पास आए और उमवी काल के एक क्रूर गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ़ के अत्याचार की शिकायत की, जो अत्याचार एवं रक्तपात के लिए जाना जाता था, तो अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने उनको शासकों के अत्याचार पर धैर्य रखने का आदेश दिया और बताया कि लोगों पर गुज़रने वाले किसी भी समय से उसके बाद का समय अधिक बुरा होगा, यहाँ तक वे अपने रब से जा मिलें। साथ ही यह भी बताया कि उन्होंने यह बात अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सुनी है। याद रहे कि यहाँ बुरा से मुराद सामान्य एवं आम बुरा नहीं है, क्योंकि कभी ऐसा भी होता है कि कुछ स्थानों में बुरा हो और कुछ अन्य स्थानों में अच्छा।

हवाला

- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، نشر دار الكتاب العربي. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407هـ - 1987م. - شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426هـ. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي. - صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ.

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“जो मुसलिम शासक के आज्ञापालन से इनकार करे और (मुसलमानों की) जमात से निकल जाए, फिर उसकी मृत्यु हो जाए तो ऐसी मृत्यु जाहिलियत वाली मृत्यु है

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: «مَنْ ‌خَرَجَ ‌مِنَ ‌الطَّاعَةِ، وَفَارَقَ الْجَمَاعَةَ فَمَاتَ، مَاتَ مِيتَةً جَاهِلِيَّةً، وَمَنْ قَاتَلَ تَحْتَ رَايَةٍ عِمِّيَّةٍ، يَغْضَبُ لِعَصَبَةٍ، أَوْ يَدْعُو إِلَى عَصَبَةٍ، أَوْ يَنْصُرُ عَصَبَةً، فَقُتِلَ، فَقِتْلَةٌ جَاهِلِيَّةٌ، وَمَنْ خَرَجَ عَلَى أُمَّتِي، يَضْرِبُ بَرَّهَا وَفَاجِرَهَا، وَلَا يَتَحَاشَى مِنْ مُؤْمِنِهَا، وَلَا يَفِي لِذِي عَهْدٍ عَهْدَهُ، فَلَيْسَ مِنِّي وَلَسْتُ مِنْهُ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो मुसलिम शासक के आज्ञापालन से इनकार करे और (मुसलमानों की) जमात से निकल जाए, फिर उसकी मृत्यु हो जाए तो ऐसी मृत्यु जाहिलियत वाली मृत्यु है। जो ऐसे झंडे के नीचे लड़ाई लड़े जिसका उद्देश्य स्पष्ट न हो, अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा के लिए क्रोधित होता हो, अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा के लिए युद्ध करने का आह्वान करता हो, या अपने गोत्र के अभिमान की रक्षा को समर्थन देता हो, फिर इसी अवस्था में मारा जाए, तो यह जाहिलियत वाली मृत्यु है। जो मेरी उम्मत के विरुद्ध लड़ाई के लिए निकले तथा उम्मत के नेक व बुरे लोग सभी को मारे, न मोमिन को छोड़े और न अह्द (संधि) वाले के अह्द (संधि) का ख़याल करे, ऐसा व्यक्ति मुझसे नहीं और न मैं उससे हूँ।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जो व्यक्ति शासकों के अनुसरण के दायरे से बाहर निकल गया और शासक के हाथ पर एकमत होकर बैअत करने वाली मुसलमानों की जमात को छोड़कर अलग हो गया तथा इसी अलगाव की अवस्था में मर गया, वह जाहिलियत की मौत मरा, जो न किसी अमीर का अनुसरण करते थे और न किसी एक जमात से जुड़े रहते थे। अलग-अलग टोलियों में बटकर एक-दूसरे से युद्ध किया करते थे। आपने आगे बताया है कि जिसने किसी ऐसे झंडे के नीचे युद्ध किया, जिसके बारे में यह स्पष्ट न हो कि उसे सत्य के लिए उठाया गया है या असत्य के लिए, वह दीन या सत्य की बजाय अपने समुदाय या अपने क़बीले के प्रति पक्षपातपूर्ण रवय्या के कारण क्रोध में आता हो और इसी पक्षपात को चरितार्थ करने के लिए युद्ध करता हो, ऐसा व्यक्ति जब इसी हालत में मारा जाए, तो उसका मारा जाना जाहिलियत के मारे जाने की तरह होगा। इसी तरह जो व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत से बग़ावत (विद्रोह) कर बैठे, उसके अच्छे और बुरे हर आदमी की गर्दन उड़ाने लगे, वह अपने इन ग़लत कामों की कोई परवाह न करता हो और उनके अंजाम से डरता न हो, ग़ैर-मुस्लिमों तथा शासकों को दिए गए वचनों का पालन करने की बजाय खुले आम उनका उल्लंघन करता हो, तो यह कबीरा (बड़ा) गुनाह है और ऐसा करने वाला इस बड़ी सख़्त चेतावनी का हक़दार है।

फ़ायदे
  1. शासक जब तक किसी ऐसे कार्य का आदेश न दें, जिससे अल्लाह की नाफ़रमानी न होती हो, तो उनके आदेश का पालन करना वाजिब है।
  2. इस हदीस में इमाम (शासक) के अनुसरण से बाहर निकलने और मुसलमानों की जमात से अलग हो जाने से बहुत ज़्यादा सावधान किया गया है। अगर कोई व्यक्ति इस तरह की हालत में मर जाता है, तो जाहिलीयत काल के लोगों की मौत मरता है।
  3. इस हदीस में पक्षपात पर आधारित युद्ध से मना किया गया है।
  4. वचन पूरा करना वाजिब है।
  5. इमाम (शासक) और जमात से जुड़े रहने के बहुत-से फ़ायदे हैं। इससे शांति एवं सद्भाव का माहौल रहता है और सब कुछ ठीक रहता है।
  6. जाहिलीयत काल के लोगों के हालात की मुशाबहत (समरुपता) अपनाने की मनाही।
  7. मुसलमानों की जमात से अनिवार्य रूप से जुड़े रहने का आदेश।
हवाला

صحيح مسلم. شرح النووي على مسلم (12/ 238). توضيح الأحكام من بلوغ المرام، للبسام (6/ 179). سبل السلام، لمحمد الصنعاني (2/ 374). منحة العلام شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (8/ 338). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (6/ 2395).

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“जो तुम्हारे पास इस हाल में आए कि तुम लोग किसी को ख़लीफ़ा मानकर उसका अनुसरण कर रहे हो तथा वह तुम्हारी एकता को भंग करना चाहे या तुम्हारी जमात में बिखराव पैदा करना चाहे, तो ऐसे व्यक्ति को कत्ल कर दो।”

عن عرفجة رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «مَنْ أَتَاكُمْ وَأَمْرُكُمْ جَمِيعٌ عَلَى رَجُلٍ وَاحِدٍ، يُرِيدُ أَنْ يَشُقَّ عَصَاكُمْ، أَوْ يُفَرِّقَ جَمَاعَتَكُمْ، فَاقْتُلُوهُ».
अरफ़जा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना है : “जो तुम्हारे पास इस हाल में आए कि तुम लोग किसी को ख़लीफ़ा मानकर उसका अनुसरण कर रहे हो तथा वह तुम्हारी एकता को भंग करना चाहे या तुम्हारी जमात में बिखराव पैदा करना चाहे, तो ऐसे व्यक्ति को कत्ल कर दो।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब मुसलमान एकमत होकर किसी को शासक मान चुके हों और एक जमात के रूप में रह रहे हों और फिर कोई आकर शासन के मामले में उससे उलझने लगे और मुसलमानों की जमात में फूट डालना चाहे, तो उसकी बुराई से बचने और मुसलमानों को रक्तपात से सुरक्षित रखने के लिए उसे रोकना और उससे युद्ध करना वाजबि होगा।

फ़ायदे
  1. मुसलमान शासक जब तक किसी गुनाह के काम का आदेश न दे, तो उसकी बात सुनना तथा उसके आदेश का पालन करना वाजिब और उसके ख़िलाफ़ बग़ावत करना हराम होगा।
  2. जो मुसलमानों के शासक और उनकी जमात के ख़िलाफ़ विद्रोह करे, उससे युद्ध करना वाजिब होगा, चाहे वह पद मान-सम्मान और हसब-नसब के मामले में कितना ही ऊँचा क्यों न हो।
  3. एकजुट रहने तथा विभेद का शिकार न होने की प्रेरणा।
हवाला

صحيح مسلم (3/ 1480) (1852). منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (8/ 349). توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، للبسام (6/ 329). فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام، لابن عثيمين (5/ 302). المفاتيح في شرح المصابيح، الحسين المُظْهِري (4/ 295).

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निश्चय ही बहुत-से फ़ितने सामने आएँगे। सुन लो, फिर एक फ़ितना ऐसा सामने आएगा कि उसके प्रकट होने के बाद बैठा हुआ व्यक्ति उसमें चलने वाले से बेहतर होगा और चलने वाला व्यक्ति उसकी ओर दौड़ने वाले से बेहतर होगा।

عَنْ عُثْمَانَ الشَّحَّامِ، قَالَ: انْطَلَقْتُ أَنَا وَفَرْقَدٌ السَّبَخِيُّ إِلَى مُسْلِمِ بْنِ أَبِي بَكْرَةَ وَهُوَ فِي أَرْضِهِ، فَدَخَلْنَا عَلَيْهِ فَقُلْنَا: هَلْ سَمِعْتَ أَبَاكَ يُحَدِّثُ فِي الْفِتَنِ حَدِيثًا؟ قَالَ: نَعَمْ، سَمِعْتُ أَبَا بَكْرَةَ رضي الله عنه يُحَدِّثُ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنَّهَا سَتَكُونُ فِتَنٌ، أَلَا ثُمَّ تَكُونُ فِتْنَةٌ الْقَاعِدُ فِيهَا خَيْرٌ مِنَ الْمَاشِي فِيهَا، وَالْمَاشِي فِيهَا خَيْرٌ مِنَ السَّاعِي إِلَيْهَا، أَلَا فَإِذَا نَزَلَتْ أَوْ وَقَعَتْ فَمَنْ كَانَ لَهُ إِبِلٌ فَلْيَلْحَقْ بِإِبِلِهِ، وَمَنْ كَانَتْ لَهُ غَنَمٌ فَلْيَلْحَقْ بِغَنَمِهِ، وَمَنْ كَانَتْ لَهُ أَرْضٌ فَلْيَلْحَقْ بِأَرْضِهِ»، قَالَ فَقَالَ رَجُلٌ: يَا رَسُولَ اللهِ أَرَأَيْتَ مَنْ لَمْ يَكُنْ لَهُ إِبِلٌ وَلَا غَنَمٌ وَلَا أَرْضٌ؟ قَالَ: «يَعْمِدُ إِلَى سَيْفِهِ فَيَدُقُّ عَلَى حَدِّهِ بِحَجَرٍ، ثُمَّ لِيَنْجُ إِنِ اسْتَطَاعَ النَّجَاءَ، اللهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ؟ اللهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ؟ اللهُمَّ هَلْ بَلَّغْتُ؟»، قَالَ: فَقَالَ رَجُلٌ: يَا رَسُولَ اللهِ أَرَأَيْتَ إِنْ أُكْرِهْتُ حَتَّى يُنْطَلَقَ بِي إِلَى أَحَدِ الصَّفَّيْنِ، أَوْ إِحْدَى الْفِئَتَيْنِ، فَضَرَبَنِي رَجُلٌ بِسَيْفِهِ، أَوْ يَجِيءُ سَهْمٌ فَيَقْتُلُنِي؟ قَالَ: «يَبُوءُ بِإِثْمِهِ وَإِثْمِكَ، وَيَكُونُ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ».
उस्मान शह्हाम का वर्णन है, वह कहते हैं : मैं और फ़रक़द सबख़ी, मुस्लिम बिन अबू बकरा के पास उनके देश गए। हमने उनके यहाँ प्रवेश किया और उनसे पूछा : क्या आपने अपने पिता को फ़ितनों के बारे में कोई हदीस बयान करते हुए सुना है? उन्होंने उत्तर दिया : हाँ, मैंने अबू बकरा को यह हदीस बयान करते हुए सुना है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "निश्चय ही बहुत-से फ़ितने सामने आएँगे। सुन लो, फिर एक फ़ितना ऐसा सामने आएगा कि उसके प्रकट होने के बाद बैठा हुआ व्यक्ति उसमें चलने वाले से बेहतर होगा और चलने वाला व्यक्ति उसकी ओर दौड़ने वाले से बेहतर होगा। सुन लो, जब वह फ़ितना सामने आ जाए, तो जिसके पास ऊँट हों, वह अपने ऊँटों में व्यस्त हो जाए, जिसके पास बकरियाँ हों, वह अपनी बकरियों में व्यस्त हो जाए और जिसके पास खेत हो, वह अपने खेत में व्यस्त हो जाए।" वर्णनकर्ता का कहना है कि यह सुन एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! आप ऐसे व्यक्ति को क्या निर्देश देंगे, जिसके पास न ऊँट हों, न बकरियाँ हों और न खेत? आपने उसके उत्तर में कहा : "वह अपनी तलवार ले, किसी पत्थर से उसकी धार को नष्ट कर दे और हो सके, तो वहाँ से निकल जाए। ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया? ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया? ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया?" वर्णनकर्ता का कहना है कि एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर मुझको मजबूर करके दोनों पंक्तियों में से किसी एक पंक्ति या दोनों दलों में से किसी एक दल में शामिल कर लिया गया और किसी ने मुझे तलवार मार दी या कोई तीर आकर मेरा वध कर दे, तो मेरा क्या होगा? आपने उत्तर दिया : "वह अपने और तेरे गुनाह का बोझ उठाएगा और जहन्नम जाएगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उस्मान शह्हाम एवं फ़रक़द सबख़ी ने एक बड़े सहाबी अबू बकरा -रज़ियल्लाहु अनहु- के बेट मुस्लिम से पूछा कि क्या उन्होंने अपने पिता से फ़ितनों एवं मुसलमानों के बीच होने वाले युद्ध के बारे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की कोई हदीस सुनी है? उन्होंने उत्तर दिया कि हाँ, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि आपकी मृत्यु के बाद बहुत-से फ़ितने सामने आएँगे। इन फ़ितनों के समय इनसे बेख़बर होकर बैठा रहने वाला व्यक्ति चलने वाले व्यक्ति से अच्छा होगा, जो उनकी ख़बर लेने का प्रयास न करे और पैदल चलने वाला व्यक्ति उनकी ओर दौड़ने वाले व्यक्ति से बेहतर होगा, जो उसकी ख़बर भी ले और उसमें शामिल भी हो। उसके बाद अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि जिस व्यक्ति के ज़माने में फ़ितना सामने आ जाए, अगर उसके पास कोई शरण लेने का स्थान हो, तो वहाँ शरण ले ले। जैसे चराने के लिए ऊँट हों, तो ऊँट चराने लगे। बकरियाँ हों, तो बकरियाँ चराने लगे। खेती करने के लिए खेत हो, तो खेती करने लगे। यह सुन एक व्यक्ति ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर किसी के पास इस प्रकार की कोई व्यस्तता न हो, जैसे ऊँट, बकरियाँ या खेत न हो, तो वह क्या करे? आपने उत्तर दिया : वह अपना हथियार तोड़ दे और हो सके तो अपने बाल-बच्चों को लेकर वहाँ से भाग निकले। उसके बाद अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने तीन बार गवाह बनाते हुए फ़रमाया : ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया है? ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया है? ऐ अल्लाह! क्या मैंने पहुँचा दिया है? इन सब के बाद एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर मुझको मजबूर करके किसी एक पंक्ति या दल में शामिल कर लिया गया और फिर किसी ने मुझपर तलवार चला दी या कोई तीर आकर मुझे लग गया और मेरी मृत्यु हो गई, तो मेरा क्या होगा? आपने उत्तर दिया : अपने गुनाह का बोझ और जिसका वध किया है उसके गुनाह का बोझ उठाएगा और कयामत के दिन जहन्नम जाने वालों में शामिल हो जाएगा।

फ़ायदे
  1. इस हदीस में फ़ितने प्रकट होने की सूचना दी गई है, ताकि लोग सावधान एवं मानसिक रूप से तैयार रहें, फ़ितनों में शामिल न हों और अल्लाह से सत्य के मार्ग पर मज़बूती से क़ायम रहने और मुक्ति के मार्ग पर चलते रहने की दुआ माँगें।
  2. नववी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्द "फितने के युग में बैठा हुआ व्यक्ति खड़े व्यक्ति से उत्तम होगा।" उपर्युक्त फ़ितने के ख़तरे का वर्णन करते हैं, उससे दूर रहने एवं भागने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और यह बताते हैं कि हर व्यक्ति का दामन उस फ़ितने में उसकी संलिप्तता के अनुसार दाग़दार होगा।
  3. नववी कहते हैं : यदि किसी को युद्ध के मैदान में उपस्थित होने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसपर कोई गुनाह नहीं है, लेकिन उसके लिए लड़ाई में शामिल होना जायज़ नहीं है। यदि वह शामिल होता है, तो यह गुनाह है, इसपर सारे उलेमा एकमत हैं।
  4. इब्न-ए-हजर कहते हैं : दूसरे लोगों ने कहा है : जब कोई गिरोह इमाम (शासक) के विरुद्ध बग़ावत कर दे, अपनी ज़िम्मवारियाँ अदा न करे और युद्ध का ऐलान कर दे, तो उससे युद्ध करना अनिवार्य होगा। इसी प्रकार जब दो गिरोह आपस में युद्ध कर रहे हों, तो हर सक्षम व्यक्ति पर ग़लत पक्ष का हाथ पकड़ना और सही पक्ष का साथ देना अनिवार्य होगा। यह जमहूर का मत है। जबकि अन्य लोगों ने विस्तार से काम लिया है। उनका कहना है कि जहाँ कोई इमाम (शासक) न हो, वहाँ दो मुस्लिम समूहों के बीच होने वाला हर युद्ध निषिद्ध है और इस अध्याय तथा अन्य अध्याय में आई हुई हदीसें इसी बात को सामने रखकर समझी जाएँगी।
  5. नववी कहते हैं : फ़ितने के समय युद्ध में शामिल होना जायज़ है या नहीं, इस मसले में उलेमा का मतभेद है। उलेमा के एक गिरोह ने कहा है : मुसलमान जब फ़ितने के दौर से गुज़र रहे हों, तो युद्ध में भाग नहीं लिया जाएगा। फ़ितने में शामिल लोग घर में प्रवेश कर जाएँ और हत्या करना चाहें, तब भी अपनी रक्षा के लिए हथियार नहीं उठाया जा सकता। क्योंकि यहाँ ख़ून बहाने का प्रयास करने वाला व्यक्ति शरई उद्धरणों का अपने अनुसार अर्थ निकालकर यह काम कर रहा है। यह अबू बकरा रज़ियल्लाहु अनहु आदि का मत है। जबकि अब्दुल्लाह बिन उमर एवं इमरान बिन हुसैन का मत यह है कि जंग में शामिल होना तो जायज़ नहीं है, लेकिन अपनी रक्षा की जाएगी। ये दोनों मत इस्लाम के नाम पर प्रकट होने वाले सभी फ़ितनों में शामिल न होने पर सहमत हैं। जबकि इसके विपरीत अधिकतर सहाबा, ताबेईन और इस्लामी विद्वानों का मत यह है कि फ़ितनों के दौर में सत्यवादी गिरोह का सहयोग किया जाएगा और बाग़ियों से जंग में उसका साथ दिया जाएगा। क्योंकि, उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है, जिसका अर्थ है: (तुम अत्याचार कर रहे गिरोह से लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर लौट आए।) यही मत सही है और शामिल न होने का इशारा देने वाली हदीसों को ऐसे व्यक्ति के बारे में रखकर देखा जाएगा, जिसे पता न चल पा रहा हो कि कौन-सा गिरोह सत्यवादी है, या फिर दोनों गिरोह अत्याचारी हों और किसी के पास कोई शरई प्रमाण न हो।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2212) (2887). النهاية في غريب الحديث والأثر (91). شرح سنن أبي داود للعباد (478/ 3).

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