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तशरीह के साथ हदीसें

लालसा तथा शहवतों की मज़म्मत

9 हदीसें

‎“‎किसी आदमी ने अपने पेट से बुरा बर्तन कोई नहीं भरा। आदम की संतान के लिए खाने के कुछेक लुक़मे काफ़ी हैं, जो उसकी पीठ खड़ी रखें। अगर अधिक खाना ज़रूरी हो तो पेट का एक तिहाई भाग खाने के लिए, एक तिहाई भाग पीने के लिए और एक तिहाई भाग सांस लेने के लिए हो।‎”‎

عَنْ المِقْدَامِ بْنِ مَعْدِي كَرِبَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «مَا مَلأَ آدَمِيٌّ وِعَاءً شَرًّا مِنْ بَطْنٍ، بِحَسْبِ ابْنِ آدَمَ أَكَلاَتٌ يُقِمْنَ صُلْبَهُ، فَإِنْ كَانَ لَا مَحَالَةَ، فَثُلُثٌ لِطَعَامِهِ، وَثُلُثٌ لِشَرَابِهِ، وَثُلُثٌ لِنَفَسِهِ».
मिक़दाम बिन मादीकरिब -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : ‎“‎किसी आदमी ने अपने पेट से बुरा बर्तन कोई नहीं भरा। आदम की संतान के लिए खाने के कुछेक लुक़मे काफ़ी हैं, जो उसकी पीठ खड़ी रखें। अगर अधिक खाना ज़रूरी हो तो पेट का एक तिहाई भाग खाने के लिए, एक तिहाई भाग पीने के लिए और एक तिहाई भाग सांस लेने के लिए हो।‎”‎
इसे इमाम अह़मद, तिर्मिज़ी, नसई और इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमारा मार्गदर्शन चिकित्सा से संबंधित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यानी परहेज़ की ओर कर रहे हैं, जिसके द्वारा इन्सान अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकता है। इससे मुराद अधिक भोजन करने से बचने बल्कि केवल उतना ही खाने की सलाह है, जो हमारी भूख को मिटा सके और आवश्यक कार्यों के लिए हमें ताकत दे सके। और सबसे खराब बरतन जिसे भरा गया हो पेट है, क्योंकि तृप्ति के कारण, देर-सवेर, आंतरिक या बाह्य रूप से, अनगिनत घातक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। फिर रसूलुल्लाह -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : यदि किसी व्यक्ति को भरपेट खाना ही है, तो उसे चाहिए कि पेट का एक तिहाई हिस्सा खाने के लिए, एक तिहाई पीने के लिए और एक तिहाई सांस लेने के लिए छोड़ दे, ताकि उसे किसी भी तरह की तकलीफ़ एवं हानि न हो, या धर्म और दुनिया के अनिवार्य कार्यों की अदायगी में सुस्ती न हो।

फ़ायदे
  1. अधिक खाने पीने से बचना चाहिए। यह चिकित्सा के सभी मूल सिद्धांतों का एक समग्र आधार है, क्योंकि भरपेट खाने से विभिन्न रोग और बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं।
  2. भोजन का उद्देश्य स्वास्थ्य और शक्ति को बनाए रखना है, जो कि जीवन के आधार हैं।
  3. भरपेट खाने के बहुत-से शारीरिक और धार्मिक नुकसान हैं। उमर -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने कहा है : "भरपेट खाने से बचो, क्योंकि यह शरीर को ख़राब करता है और नमाज़ के प्रति सुस्त बना देता है।"
  4. शरई अहकाम के दृष्टिकोण से खाने के कई प्रकार हुआ करते हैं; इतना खाना वाजिब है, जिससे जान बची रहे और जिसे छोड़ना हानिकारक हो। अनिवार्य परिमाण से अधिक इतना खाना जायज़ है कि नुक़सान का अंदेशा न हो। इतना खाना मकरूह है कि उससे हानि होने का भय हो। इतना खाना हराम है कि उससे नुक़सान हो जाने का यक़ीन हो। इतना खाना मुसतहब है कि उससे अल्लाह की इबादत और नेकी के कामों में सहयोग मिले। उल्लिखित हदीस में इन तमाम बातों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बयान कर दिया गया है : 1-पेट भरकर खाना खाना। 2- इतना खाना खाना कि पीठ खड़ी रह सके। 3- तीसरी श्रेणी को इन शब्दों में बयान किया गया है : "पेट का एक तिहाई भाग खाने के लिए, एक तिहाई भाग पीने के लिए और एक तिहाई भाग सांस लेने के लिए हो।‎" लेकिन यह सारी बातें उस समय हैं, जब भोजन हलाल हो।
  5. यह हदीस चिकित्सा का एक बुनियादी सिद्धांत है। क्योंकि चिकित्सा के तीन बुनियादी सिद्धांत हैं : शक्ति की रक्षा, सावधानी बरतना और इलाज करना। जबकि इस हदीस में पहले दो सिद्धांत शामिल हैं। इसी प्रकार उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "खाओ, पियो और फ़िज़ूलखर्ची न करो। बेशक अल्लाह फ़िज़ूलखर्ची करने वाले को पसंद नहीं करता है।" [सूरा आराफ़ : 31]
  6. इस्लामी शरियत एक संपूर्ण शरीयत है, जिसमें इन्सान के सांसारिक एवं धार्मिक दोनों तरह के हितों का ख़्याल रखा गया है।
  7. चिकित्सा विज्ञान से संंबंधित मूल बातें शरई ज्ञान-विज्ञान का ही एक हिस्सा हैं। यही कारण है कि शहद एवं कलौंजी के बारे में कई बातें कही गई हैं।
  8. शरई आदेशों एवं निर्देशों के अंदर बड़ी हिकमतें मौजूद हैं।तथा सभी शरई आदेश एवं निर्देश नुक़सान रोकने एवं लाभ प्राप्त करने पर आधारित हैं।
हवाला

سنن الترمذي (4/ 188) (2380). سنن ابن ماجه (4/ 448) (3349). مسند أحمد (28/ 422) (17186). فتح الباري لابن حجر (9/ 528). جامع العلوم والحكم في شرح خمسين حديثا من جوامع الكلم، لابن رجب (2/ 467). التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، لإسماعيل الأنصاري (ص100). فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، لعبد المحسن العباد (ص148).

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मैंने अपने बाद कोई ऐसा फ़ितना नहीं छोड़ा, जो पुरुषों के हक़ में स्त्रियों से अधिक हानिकारक हो।

عن أسامة بن زيد رضي الله عنهما عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «مَا تَرَكْتُ بَعْدِي فِتْنَةً أَضَرَّ عَلَى الرِّجَالِ مِنَ النِّسَاءِ».
उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मैंने अपने बाद कोई ऐसा फ़ितना नहीं छोड़ा, जो पुरुषों के हक़ में स्त्रियों से अधिक हानिकारक हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि आपने अपने बाद ऐसी कोई आज़माइश नहीं छोड़ी, जो पुरुषों के हित में स्त्रियों से अधिक हानिकारक हो। स्त्री अगर उसके घर की है, तो उसके द्वारा की जाने वाली शरीयत की अवहेलना के कारण पुरुष को हानि होती है और अगर उसके परिवार की न हो, तो उसके साथ मिलने-जुलने और एकांत में रहने तथा इसके नतीजे में पैदा होने वाली बुराइयों के कारण पुरुष को हानि होती है।

फ़ायदे
  1. मुसलमान को औरत के फ़ितने से सावधान रहना चाहिए और इस फ़ितने की ओर ले जाने वाले हर रास्ते को बंद करना चाहिए।
  2. फ़ितनों से सुरक्षा के लिए मोमिन को अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत रखना चाहिए और अल्लाह में दिल लगाना चाहिए।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 8) (5096). صحيح مسلم (4/ 2097) (2740). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (373). فتح الباري لابن حجر (9/ 138).

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मानव के भाग्य में ज़िना लिख दिया गया है, जिसे वह करके रहेगा: आँखों का ज़िना देखना है। कानों का ज़िना सुनना है और ज़बान का ज़िना गंदी बात करनी है। हाथों का ज़िना पकड़ना है और पैर का ज़िना चलकर जाना है। और दिल चाहता व तमन्ना करता है और गुप्तांग उसे सच कर दिखाता है अथवा उसे झुठला देता है

عن أبي هريرة رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «كُتب على ابن آدم نَصِيبُه من الزِنا مُدْرِكُ ذلك لا مَحَالة: العينان زِناهما النَظر، والأُذنان زِناهما الاستماع، واللسان زِناه الكلام، واليَدُ زِناها البَطْش، والرِّجل زِناها الخُطَا، والقلب يَهْوَى ويتمنى، ويُصَدِّق ذلك الفَرْج أو يُكذِّبُه».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) वर्णन करते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मानव के भाग्य में ज़िना (व्याभिचार) लिख दिया गया है, जिसे वह करके रहेगा: आँखों का ज़िना देखना है। कानों का ज़िना सुनना है और ज़बान का ज़िना गंदी बात करनी है। हाथों का ज़िना पकड़ना है और पैर का ज़िना, चलकर जाना है। दिल चाहता और तमन्ना करता है और गुप्तांग, उसे सच कर दिखाता है अथवा उसे झुठला देता है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस का अर्थ यह है कि इन्सान निश्चित रूप से व्यभिचार में संलिप्त हो ही जाता है। हाँ, यदि किसी को अल्लाह ही सुरक्षित रखे, तो बात अलग है। फिर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इसके कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए हैं : "आँख का व्यभिचार देखना है" यानी जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी स्त्री को देखता है, जो उन स्त्रियों में से न हो जिनके साथ उसका निकाह हराम है, चाहे वह काम वासना के साथ न भी देखता हो, तो उसका यह देखना एक प्रकार का व्यभिचार यानी आँख का व्यभिचार है। "दोनों कानों का व्यभिचार सुनना है" यानी इन्सान किसी स्त्री की बात सुनता हो और उसकी आवाज़ से लज़्ज़त लेता हो, तो यह कान का व्यभिचार है। "हाथ का व्यभिचार पकड़ना है" यानी हाथ का काम जैसे छूना आदि। "और पैर का व्यभिचार चलकर जाना है।" यानी इन्सान उदाहरण के तौर पर बुराइयों के स्थानों की ओर चलकर जाता है, किसी स्त्री की आवाज़ सुनकर उसके पास जाता है या किसी स्त्री को देखकर उसका पीछा करता है, तो यह भी एक प्रकार का व्यभिचार है। "दिल चाहता और तमन्ना करता है" यानी दिल स्त्री से संबंध की ओर झुकता है, तो यह दिल का व्यभिचार है। "और गुप्तांग उसे सच कर दिखाता है या उसे झुठला देता है।" यानी जब इन्सान गुप्तांग से व्यभिचार करता है, तो शरीर के इन अंगों के व्यभिचार को सच कर दिखाता है। लेकिन अगर गुप्तांग से व्यभिचार नहीं करता और स्वयं को सुरक्षित रखता है, तो वह शरीर के इन अंगों के व्यभिचार को झुठला देता है। यह हदीस इन्सान को स्त्री से किसी भी प्रकार का संबंध रखने से सावधान करती है। चाहे वह उसकी आवाज़ सुने, उसे देखे, उसे छूए, उसके पास जाए या दिल में उसकी चाहत रखे। यह सारे कार्य अलग-अलग प्रकार के व्यभिचार हैं। अतः एक विवेकी एवं निष्कलंक चरित्र वाले इन्सान को अपने शरीर के किसी भी अंग द्वारा स्त्री से संबंध रखने से बचना चाहिए।

हवाला

نزهة المتقين، تأليف: مصطفى الخن، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى: 1397 هـ الطبعة الرابعة عشر 1407 هـ. كنوز رياض الصالحين، تأليف: حمد بن ناصر العمار ، الناشر: دار كنوز أشبيليا، الطبعة الأولى: 1430 هـ. بهجة الناظرين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997م. صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. رياض الصالحين، تأليف: محيي الدين يحيى بن شرف النووي ، تحقيق: د. ماهر بن ياسين الفحل ، الطبعة: الأولى، 1428 هـ. صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ. شرح رياض الصالحين، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، 1426 هـ.

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मैं अपनी उम्मत पर दो चीजों से डरता हूँः क़ुरआन और दूध। जहाँ तक दूध की बात है, तो लोग उसके कारण देहातों की ओर चले जाएँगे और अपनी इच्छाओं के पीछे भागेंगे तथा नमाज़ छोड़ेंगे। रही बात क़ुरआन की, तो मुनाफ़िक़ भी उसे सीख लेंगे और उसके आधार पर मोमिनों से बहस करेंगे।

عن عقبة بن عامر، يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «إنِّي أخاف على أُمَّتي اثنَتَيْن: القرآنَ واللَّبَن، أما اللَّبَن فيَبْتَغُون الرِّيفَ ويتَّبِعون الشَّهَوَاتِ ويَتْركون الصلوات، وأما القرآن فيتعلَّمه المنافقون فيُجادِلون به المؤمنين».
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “मैं अपनी उम्मत पर दो चीजों से डरता हूँः क़ुरआन और दूध। जहाँ तक दूध की बात है, तो लोग उसके कारण देहातों की ओर चले जाएँगे और अपनी इच्छाओं के पीछे भागेंगे तथा नमाज़ छोड़ेंगे। रही बात क़ुरआन की, तो मुनाफ़िक़ भी उसे सीख लेंगे और उसके आधार पर मोमिनों से बहस करेंगे।”
इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

-مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. -سلسلة الأحاديث الصحيحة وشيء من فقهها وفوائدها، تأليف محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مكتبة المعارف للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى، لمكتبة المعارف. -مختار الصحاح، لزين الدين أبو عبد الله محمد بن أبي بكر بن عبد القادر الحنفي الرازي، تحقيق: يوسف الشيخ محمد، نشر: المكتبة العصرية - الدار النموذجية، بيروت – صيدا، لطبعة: الخامسة، 1420هـ / 1999م. -النهاية في غريب الحديث والأثر، لابن الأثير، نشر: المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م، تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي. -الفتح الرباني لترتيب مسند الإمام أحمد بن حنبل الشيباني ومعه بلوغ الأماني من أسرار الفتح الرباني, أحمد بن عبد الرحمن بن محمد البنا الساعاتي, دار إحياء التراث العربي, الطبعة: الثانية.

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ज्ञान इसलिए न अर्जित करो कि उलेमा से बहस कर सको और अज्ञान लोगों से झगड़ सको

عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ رضي الله عنهما أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَا تَعَلَّمُوا الْعِلْمَ لِتُبَاهُوا بِهِ الْعُلَمَاءَ، وَلَا لِتُمَارُوا بِهِ السُّفَهَاءَ، وَلَا تَخَيَّرُوا بِهِ الْمَجَالِسَ، فَمَنْ فَعَلَ ذَلِكَ، فَالنَّارُ النَّارُ».
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "ज्ञान इसलिए न अर्जित करो कि उलेमा से बहस कर सको और अज्ञान लोगों से झगड़ सको। इसके द्वारा सभाओं में श्रेष्ठ स्थानों पर क़ब्ज़ा न करो। जिसने ऐसा किया, उसका ठिकना जहन्नम है, उसका ठिकाना जहन्नम है।"
इसे इब्ने माजह ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस उद्देश्य से ज्ञान अर्जित करने से मना किया है कि उलेमा से बहस की जाए और बताया जाए कि मैं भी तुम्हारे जैसा आलिम हूँ अथवा अज्ञान तथा नादान लोगों से बहस की जाए। इस नीयत से भी ज्ञान अर्जित करने से मना किया है कि सभाओं में आगे बैठने का अवसर मिले। जिसने ऐसा किया वह अपनी रियाकारी (दिखावा) के कारण जहन्नम का हक़दार होगा।

फ़ायदे
  1. उस व्यक्ति को जहन्नम में जाने की चेतावनी दी गई है, जो अभिमान करने, बहस करने और सभाओं में आगे बैठने की नीयत से ज्ञान प्राप्त करे।
  2. ज्ञान सीखने तथा सिखाने का काम अल्लाह के लिए करने का महत्व।
  3. सारे कर्मों का आधार नीयत पर है और उसी के अनुसार प्रतिफल मिलता है।
हवाला

سنن ابن ماجه (1/ 170) (254)، مرشد ذوي الحجا والحاجة (2/378)، مشارق الأنوار الوهاجة ومطالع الأسرار البهاجة في شرح سنن الإمام ابن ماجه (4/ 482).

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अल्लाह ने एक उदाहरण दिया है। एक सीधा रास्ता है

عَنْ النَّوَّاسِ بْنِ سَمْعَانَ الْأَنْصَارِيِّ رضي الله عنه عَنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «ضَرَبَ اللهُ مَثَلًا صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا، وَعَلَى جَنْبَتَيْ الصِّرَاطِ سُورَانِ، فِيهِمَا أَبْوَابٌ مُفَتَّحَةٌ، وَعَلَى الْأَبْوَابِ سُتُورٌ مُرْخَاةٌ، وَعَلَى بَابِ الصِّرَاطِ دَاعٍ يَقُولُ: أَيُّهَا النَّاسُ، ادْخُلُوا الصِّرَاطَ جَمِيعًا، وَلَا تَتَعَرَّجُوا، وَدَاعٍ يَدْعُو مِنْ فَوْقِ الصِّرَاطِ، فَإِذَا أَرَادَ يَفْتَحُ شَيْئًا مِنْ تِلْكَ الْأَبْوَابِ، قَالَ: وَيْحَكَ لَا تَفْتَحْهُ، فَإِنَّكَ إِنْ تَفْتَحْهُ تَلِجْهُ، وَالصِّرَاطُ الْإِسْلَامُ، وَالسُّورَانِ: حُدُودُ اللهِ، وَالْأَبْوَابُ الْمُفَتَّحَةُ: مَحَارِمُ اللهِ، وَذَلِكَ الدَّاعِي عَلَى رَأْسِ الصِّرَاطِ: كِتَابُ اللهِ، وَالدَّاعِي مِنِ فَوْقَ الصِّرَاطِ: وَاعِظُ اللهِ فِي قَلْبِ كُلِّ مُسْلِمٍ».
नव्वास बिन समआन अनसारी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह ने एक उदाहरण दिया है। एक सीधा रास्ता है। रास्ते के दोनों ओर दो दीवारें हैं। दोनों दीवारों में कुछ द्वार खुले हैं। उन द्वारों पर पर्दे लटके हुए हैं। रास्ते के द्वार पर पुकारने वाला कह रहा है : ऐ लोगो! सब के सब इस राह में दाख़िल जाओ और इधर-उधर न भठको। जबकि एक और पुकारने वाला रास्ते के ऊपर से पुकार रहा है। जब कोई बंदा उन द्वारों में से किसी द्वार को खोलना चाहता है, तो कहता है : तेरा बुरा हो, इसे मत खोल। अगर तू इसे खोलेगा, तो इसमें घुस जाएगा। वह रास्त इस्लाम है, दोनों दीवारें अल्लाह की सीमाएँ हैं, खुले हुए द्वार अल्लाह की हराम की हुई चीज़ें हैं, रास्ते के एक सिरे पर उपस्थित पुकारने वाले अल्लाह की किताब है और रास्ते के ऊपर से पुकारने वाला हर मुसलमान के दिल में मौजूद अल्लाह का नसीहत करने वाला है।"
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि अल्लाह ने इस्लाम का उदाहरण एक ऐसे सीधे रास्ते से दिया है, जिसमें कहीं कोई टेढ़ापन नहीं है, इस रास्ते के दोनों तरफ दो दीवारें हैं, जो उसे दोनों तरफ़ से घेरी हुई हैं, इन दोनों दीवारों से मुराद अल्लाह की सीमाएँ हैं, इन दोनों दीवारों पर बीच-बीच में खुले द्वार हैं, जिनसे मुराद अल्लाह की हराम की हुई चीज़ें हैं, उन द्वारों पर पर्दे लटके हुए हैं, जो रास्ते से गुज़रने वाले को पता होने नहीं देते कि अंदर क्या है, रास्ते के आरंभ में एक पुकारने वाला है, जो लोगों का मार्गदर्शन करते हुए कहता है : रास्ते पर सीधे चलते रहो और इधर-उधर न भटको। यह पुकारने वाला अल्लाह की किताब है। एक और पुकारने वाला रास्ते के ऊपर नियुक्त है। रास्ते में चलने वाला जब भी किसी द्वार पर लटके पर्दे को थोड़ा-बहुत हटाना चाहता है, तो यह पुकारने वाला उसे डाँटता है और कहता है : तेरा बुरा हो, इसे न खोल। अगर इसे खोलेगा, तो इसमें घुस जाएगा और इसमें प्रवेश करने से खुद को रोक न सकेगा। यह पुकारने वाला हर मुसलमान के दिल में मौजूद अल्लाह का उपदेश देने वाला है।

फ़ायदे
  1. इस्लाम ही सच्चा धर्म है। यही सही रास्ता है, जो हमें जन्नत की ओर ले जाता है।
  2. अल्लाह की सीमाओं तथा उसकी हलाल एवं हराम की हुई चीज़ों का ख़्याल रखना ज़रूरी है और इनके बारे में कोताही करना विनाश का कारण बनता है।
  3. क़ुरआन की फ़ज़ीलत और उसपर अमल करने की प्रेरणा। इसमें हिदायत, नूर और सफलता है।
  4. अपने बंदों पर अल्लाह की रहमत, यही कारण है कि अल्लाह ने अपने मोमिन बंदों के दिलों में एक ऐसी चीज़ रख दी है, जो उसे विनाश की ओर जाने से रोकती है।
  5. यह अल्लाह की रहमत है कि उसने अपने बंदों के लिए गुनाहों में पड़ने के मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न कर दी हैं।
  6. शिक्षा का एक साधन बात को आसानी से समझाने के लिए उदाहरण देना भी है।
हवाला

سنن الترمذي (4/ 539) (2859)، مسند أحمد (29/ 181، 183) (17634)، جامع العلوم والحكم (2/161)، فيض القدير (4/253)، التنوير شرح الجامع الصغير (7/100)، الفتح الرباني لترتيب مسند الإمام أحمد بن حنبل الشيباني (1/ 83).

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जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की सदृश आयतों का अनुसरण करते हों, तो जान लो कि उन्हीं का नाम अल्लाह ने लिया है। अतः उनसे सावधान रहना

عَنْ ‌عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ: تَلَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَذِهِ الْآيَةَ: {هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ، وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ، وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ} [آل عمران: 7]. قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «فَإِذَا رَأَيْتِ الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ فَأُولَئِكَ الَّذِينَ سَمَّى اللهُ، فَاحْذَرُوهُمْ».
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी (आयतें) मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की ओर से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" [सूरा आल-ए-इमरान : 7] उनका कहना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की सदृश आयतों का अनुसरण करते हों, तो जान लो कि उन्हीं का नाम अल्लाह ने लिया है। अतः उनसे सावधान रहना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी आयतें मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की और से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" इस आयत में अल्लाह पाक ने बताया है कि उसी ने अपने नबी पर क़ुरआन उतारा है, जिसकी कुछ आयतों का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है और यही आयतें क़ुरआन का मूल हैं तथा विभेद के समय इन्हीं की ओर लौटा जाएगा। जबकि उसकी कुछ आयतें एक से अधिक मायनों की संभावना रखती हैं, कुछ लोगों के सामने उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या ऐसा लगता है कि उनके तथा अन्य आयतों के बीच में टकराव है। फिर अल्लाह ने बताया कि इन आयतों के बारे में लोगों का रवैया कैसा रहता है? जिन लोगों के दिल सत्य से हटे हुए हैं, वे स्पष्ट अर्थ वाली आयतों को छोड़ कर एक से अधिक अर्थ की संभावना रखने वाली आयतों को लेते हैं। इससे उनका उद्देश्य संदेह पैदा करना और लोगों को गुमराह करना होता है। वे इन आयतों का अर्थ अपनी इच्छा अनुसार निकालते हैं। इसके विपरीत गहरे ज्ञान वाले लोगों को पता होता है कि यह आयतें एक से अधिक अर्थ की संभावना वाली हैं, इसलिए वे इनकी व्याख्या स्पष्ट अर्थ वाली आयतों के आलोक में करते हैं और इस बात पर विश्वास रखते हैं कि यह सारी आयतें उच्च एवं पवित्र अल्लाह की उतारी हुई हैं, इसलिए इनमें परस्पर टकराव नहीं हो सकता। लेकिन इससे शिक्षा वही लोग प्राप्त कर सकते हैं, जो स्वच्छ विवेक रखते हैं। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईमान वालों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से कहा कि जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की मुतशाबेह आयतों के पीछे पड़ते हों, तो समझ जाओ कि यही वह लोग हैं, जिनका ज़िक्र अल्लाह ने इन शब्दों में किया है : "फिर जिनके दिलों में टेढ़ है।" अतः इन लोगों से सचेत रहो और इनकी बात पर ध्यान न दो।

फ़ायदे
  1. क़ुरआन की मुहकम आयतों से मुराद वह आयतें हैं, जिनका अर्थ स्पष्ट हो। जबकि मुतशाबेह से मुराद वह आयतें हैं, जिनके एक से अधिक मायने होने की संभावना हो और जिनमें ग़ौर व फ़िक्र करने की ज़रूरत हो।
  2. इस हदीस में गुमराहों, बिदअतियों और लोगों को गुमराह करने और संदेह में डालने के लिए उलझनें खड़ी करने वालों के साथ उठने-बैछने से सावधान किया है।
  3. आयत के अंत में "और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं" कहकर गुमराह लोगों की भर्त्सना और मज़बूत ज्ञान वाले लोगों की प्रशंसा की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिसने शिक्षा ग्रहण नहीं की और मनमानी करता रहा, वह बुद्धिमान नहीं है।
  4. मुतशाबेह आयतों का अनुसरण दिल की गुमराही का कारण है।
  5. मुतशाबेह आयतों को मुहकम आयतों के आलोक में देखा एवं समझा जाना ज़रूरी है।
  6. अल्लाह ने क़ुरआन की कुछ आयतों को मुहकम और कुछ आयतों को मुतशाबेह बनाया है, ताकि इस बात की परख हो सके कि कौन ईमान वाला है और कौन ईमान वाला नहीं है।
  7. क़ुरआन के अंदर मुतशाबेह आयतों की उपस्थिति दरअसल उलेमा की ग़ैर-उलेमा पर उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है और मानव विवेक के सीमित होने को इंगित करती है। ताकि मनुष्य अपने पैदा करने वाले के आगे नतमस्तक होजाए, और अपनी अक्षमता को स्वीकार करे।
  8. मज़बूत ज्ञान की फ़ज़ीलत तथा उसपर जमे रहने की आवश्यकता।
  9. अल्लाह के कथन { وما يعلم تأويله إلا الله والراسخون في العلم } में {الله} शब्द पर रुकने के संबंध में मुफ़स्सिरों के दो मत हैं। जो लोग {الله} शब्द पर रुकते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद किसी चीज़ की हक़ीक़त और वास्तविकता तथा ऐसी बातों को जानना है, जिनको जानना इन्सान के लिए संभव नहीं है, जैसे आत्मा और क़यामत आदि चीज़ें, जिनका ज्ञान अल्लाह ने अपने पास रखा है। गहरे ज्ञान वाले लोग इन चीज़ों पर विश्वास रखते हैं और इनकी हक़ीक़त की जानकारी को अल्लाह के हवाले कर देते हैं। दूसरी तरफ़ जो लोग {الله} शब्द पर रुकते नहीं हैं और उसे आगे से मिलाकर पढ़ते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद तफ़सीर एवं व्याख्या है। उनके मुताबिक इन आयतों की व्याख्या अल्लाह के साथ-साथ गहरे ज्ञान वाले लोग भी जानते हैं, जो मुहकम आयतों के आलोक में उनकी व्याख्या करते हैं और उनपर विश्वास रखते हैं।
हवाला

صحيح البخاري (6/ 33) (4547)، صحيح مسلم (4/ 2053) (2665)، فتح الباري (8/211)، شرح النووي على مسلم (16/217)، النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 407، 465)، فتح الودود في شرح سنن أبي داود (4/415)، تحفة الأبرار شرح مصابيح السنّة (1/129)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (41/ 559).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

फ़ितने दिलों पर चटाई की तीलियों की तरह एक के बाद एक आते रहते हैं

عَنْ حُذَيْفَةَ رضي الله عنه قَالَ: كُنَّا عِنْدَ عُمَرَ رضي الله عنه، فَقَالَ: أَيُّكُمْ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَذْكُرُ الْفِتَنَ؟ فَقَالَ قوْمٌ: نَحْنُ سَمِعْنَاهُ، فَقَالَ: لَعَلَّكُمْ تَعْنُونَ فِتْنَةَ الرَّجُلِ فِي أَهْلِهِ وَجَارِهِ؟ قَالُوا: أَجَلْ، قَالَ: تِلْكَ تُكَفِّرُهَا الصَّلَاةُ وَالصِّيَامُ وَالصَّدَقَةُ، وَلَكِنْ أَيُّكُمْ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَذْكُرُ الَّتِي تَمُوجُ مَوْجَ الْبَحْرِ؟ قَالَ حُذَيْفَةُ: فَأَسْكَتَ الْقَوْمُ، فَقُلْتُ: أَنَا، قَالَ: أَنْتَ لِلَّهِ أَبُوكَ، قَالَ حُذَيْفَةُ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «تُعْرَضُ الْفِتَنُ عَلَى الْقُلُوبِ كَالْحَصِيرِ عُودًا عُودًا، فَأَيُّ قَلْبٍ أُشْرِبَهَا نُكِتَ فِيهِ نُكْتَةٌ سَوْدَاءُ، وَأَيُّ قَلْبٍ أَنْكَرَهَا نُكِتَ فِيهِ نُكْتَةٌ بَيْضَاءُ، حَتَّى تَصِيرَ عَلَى قَلْبَيْنِ، عَلَى أَبْيَضَ مِثْلِ الصَّفَا فَلَا تَضُرُّهُ فِتْنَةٌ مَا دَامَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ، وَالْآخَرُ أَسْوَدُ مُرْبَادًّا كَالْكُوزِ، مُجَخِّيًا لَا يَعْرِفُ مَعْرُوفًا، وَلَا يُنْكِرُ مُنْكَرًا، إِلَّا مَا أُشْرِبَ مِنْ هَوَاهُ»، قَالَ حُذَيْفَةُ: وَحَدَّثْتُهُ، أَنَّ بَيْنَكَ وَبَيْنَهَا بَابًا مُغْلَقًا يُوشِكُ أَنْ يُكْسَرَ، قَالَ عُمَرُ: أَكَسْرًا لَا أَبَا لَكَ؟ فَلَوْ أَنَّهُ فُتِحَ لَعَلَّهُ كَانَ يُعَادُ، قُلْتُ: لَا بَلْ يُكْسَرُ، وَحَدَّثْتُهُ أَنَّ ذَلِكَ الْبَابَ رَجُلٌ يُقْتَلُ أَوْ يَمُوتُ حَدِيثًا لَيْسَ بِالْأَغَالِيطِ. قَالَ أَبُو خَالِدٍ: فَقُلْتُ لِسَعْدٍ: يَا أَبَا مَالِكٍ، مَا أَسْوَدُ مُرْبَادٌّ؟ قَالَ: شِدَّةُ الْبَيَاضِ فِي سَوَادٍ، قَالَ: قُلْتُ: فَمَا الْكُوزُ مُجَخِّيًا؟ قَالَ: مَنْكُوسًا.
हुज़ैफ़ा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं : हम लोग उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- के पास मौजूद थे कि इसी दौरान उन्होंने पूछा : आपमें से किसने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़ितनों का ज़िक्र करते हुए सुना है? कई लोगों ने कहा : हमने आपको ऐसा कहते हुए सुना है। उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : शायद आप लोग परिवार और पड़ोसी का फ़ितना समझ रहे हैं? सहाबा ने कहा : जी हाँ। उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : इस तरह के फ़ितने को नमाज़, रोज़ा और सदक़ा मिटा देता है। आपमें से किसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उस फ़ितने का ज़िक्र करते हुए सुना है, जो समुद्र की लहरों की तरह उठेगा? हुज़ैफ़ा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : उनकी यह बात सुन सब लोग ख़ामोश रह गए। तब मैंने कहा : मैंने सुना है। उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : शाबाश, बुहत खूब। अब हुज़ैफ़ा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "फ़ितने दिलों पर चटाई की तीलियों की तरह एक के बाद एक आते रहते हैं। ऐसे में जो दिल उन्हें अवशोषित कर लेता है उसमें एक काला निशान डाल दिया जाता है और जो दिल उन्हें अस्वीकार कर देता है, उसमें एक सफ़ेद निशान डाल दिया जाता है। इस तरह दिल दो प्रकार के हो जाते हैं। एक चिकने पत्थर की तरह सफ़ेद दिल, जिसे आकाशों तथा धरती के रहते तक कोई फ़ितना हानि नहीं पहुँचा सकता और दूसरा काला और बदरंग दिल, जो उलटा रखे हुए लोटे की भांति हो, वह न तो अच्छाई को पहचानता है और न ही बुराई का खंडन करता है, सिवाय उसके जो उसने अपनी इच्छाओं से ग्रहण किया है।" हुज़ैफ़ा कहते हैं : तथा मैंने उमर रज़ियल्लाहु अनहु को बताया कि आपके और उन फ़ितनों के बीच एक बंद द्वार है, जो तोड़ दिया जाने ही वाला है। उमर ने पूछा : क्या तोड़ दिया जाएगा, तेरा पिता न हो? क्योंकि अगर खोल दिया गया तो हो सकता है कि दोबारा बंद हो जाए। मैंने कहा : खोला नहीं बल्कि तोड़ दिया जाएगा। तथा मैंने उनको बताया कि वह द्वार एक व्यक्ति है, जो जल्द ही मार दिया जाएगा या मर जाएगा। यह कोई भ्रांति नहीं है। अबू ख़ालिद कहते हैं : मैंने साद से पूछा : ऐ अबू मालिक! (इस हदीस में आए हुए शब्द) 'असवद मुरबाद्द' का क्या अर्थ है? उन्होंने उत्तर दिया : काले रंग में सख़्त सफ़ेद रंग। मैंने पूछा : 'अल-कूज़ु मुख़ज्जियन' का क्या अर्थ है? उन्होंने उत्तर दिया : उलटा रखा हुआ।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

ख़लीफ़ा उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- अपनी सभा में थे और उनके साथ कुछ सहाबा मौजूद थे। इसी बीच उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- ने उनसे पूछा : आपमें से किसने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़ितनों का ज़िक्र करते हुए सुना है? कुछ सहाबा ने कहा : हमने आपको फ़ितनों का ज़िक्र करते हुए सुना है। यह सुन उमर रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : शायद तुम बीवी-बच्चों के कारण सामने आने वाली परीक्षा तथा फ़ितना मुराद ले रहे हो। जैसे उनका अत्यधिक प्रेम, उनके हितों की रक्षा की तीव्र इच्छा, उनमें व्यस्तता के कारण बहुत-सी भलाइयों को नज़र अंदाज़ कर देना या उनके अधिकारों को अदा करने, उन्हें संस्कार एवं शिक्षा देने में कोताही करना तथा इसी तरह अपने पड़ोसी आदि का फ़ितना। क्या तुम्हारी मुराद ये फ़ितने हैं? उन्होंने उत्तर दिया : निश्चित रूप से हमारी मुराद यही है। उमर रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : ये ऐसे फ़ितने हैं, जो आत्मचिंतन का तक़ाज़ा करते हैं। इनमें से कुछ गुनाह ऐसे भी हैं, जिन्हें नेकियों, जैसे नमाज़, रोज़े और सदक़े से मिटा दिए जाने की आशा है। लेकिन यह बताओ कि तुममें से किसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ऐसे फ़ितनों का ज़िक्र करते हुए सुना है, जो इतने भयावह एवं व्यापक होंगे कि लोगों को समुद्र की लहरों की तरह हिलाकर रख देंगे। उनका प्रश्न सुनकर सब लोग ख़ामोश हो गए, लेकिन हुज़ैफ़ा बिन यमान रज़ियल्लाहु अनहु ने फ़रमाया : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इस तरह के फ़ितनों का ज़िक्र करते हुए सुना है। इससे उमर रज़ियल्लाहु अनहु ख़ुश हो गए और फ़रमाया : तेरे पिता के क्या कहने कि उसने तुझ जैसे संतान को जन्म दिया। ज़रा बताओ कि तुमने क्या सुना है? हुज़ैफ़ा ने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : फ़ितने प्रकट होते रहते हैं और मानव हृदय से इस तरह चिपक जाते हैं, जिस तरह चटाई सोने वाले के पहलू में चिपक जाती है। फ़ितनों का इस तरह चिपकना हृदय को प्रभावित करता है। ये फ़ितने एक के बाद होते रहते हैं। ऐसे में फ़ितने जिस हृदय के अंदर प्रवेश कर गए और पानी की तरह अवशोषित हो गए, उसमें एक काला निशान पड़ जाता है और जिस हृदय ने उन्हें ठुकरा दिया, उसमें एक सफ़ेद निशान पड़ जाता है। फलस्वरूप हृदय दो प्रकार के हो जाते हैं : ऐसा हृदय जो ईमान का लिहाज़ रखने, हर प्रकार के दोष से सुरक्षित रहने और फ़ितनों की चपेट में न आने के कारण बिल्कुल सफ़ेद होता है, मानो जैसे एक चिकना पत्थर हो जिसमें कुछ लगा हुआ न हो। ऐसे हृदय को फ़ितने नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, यहाँ तक कि अल्लाह से जा मिले। दूसरा ऐसा हृदय कि फ़ितनों के कारण उसका रंग बदलकर काला हो गया हो और वह झुके हुए या उलटे रखे हुए लोटे की तरह हो कि उसमें कुछ टिकता न हो। उसपर न कोई अच्छी बात असर करती हो और न हिकमत अपना प्रभाव छोड़ती हो। वह न सही का समर्थन करे और न ग़लत का खंडन करे। सिवाय उसके जिसे उसकी आत्मा पसंद करे और चाहे। हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु ने उमर रज़ियल्लाहु अनहु से कहा : ये फ़ितने आपके जीवन काल में प्रकट नहीं होंगे। इनके तथा आपके बीच एक बंद द्वार है, जो बहुत जल्द तोड़ दिया जाएगा। उमर रज़ियल्लाहु अनहु ने पूछा : क्या उसे तोड़ ही दिया जाएगा? क्योंकि अगर खोल दिया जाता तो बंद कर दिए जाने की संभावना रहती। हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु ने उत्तर दिया : उसे खोला नहीं, बल्कि तोड़ दिया जाएगा। और वह द्वार दरअसल एक व्यक्ति है, जिसे मार दिया जाएगा या जो मर जाएगा। एक बात यह भी याद रहे कि मैंने जो सूचना दी है, वह एक सच्ची एवं पुष्ट सूचना है। यह अह्ल-ए-किताब की किताबों से ली हुई सूचना नहीं और न ही किसी राय रखने वाले की अपनी सोच है, बल्कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस है।

फ़ायदे
  1. सार्वजनिक फ़ितनों की संगीनी, जिनके नतीजे में रक्तपात होता है, धन-सम्पत्तियाँ नष्ट होती हैं तथा शांति भंग होती है।
  2. ख़ास फ़ितने अगर दीन से संबंधित हों, तो फ़ितने का शिकार व्यक्ति दोषी है। क्योंकि, ये फ़ितने या तो बिदअत के रूप में होंगे या फिर गुनाह के रूप में। और अगर ये सांसारिक मामलों से संबंधित हों, तो संबंधित व्यक्ति के लिए परीक्षा हैं और उसे धैर्य रखने की ज़रूरत है।
  3. इन्सान का हृदय जीवन में आने वाले फ़ितनों से प्रभावित होता है। सुरक्षित केवल वही रहता है, जिसे अल्लाह सत्य के मार्ग पर क़ायम रहने की क्षमता प्रदान करता है।
  4. नववी कहते हैं : अल-तहरीर नामी पुस्तक के लेखक ने कहा है : इस हदीस का अर्थ यह है कि इन्सान जब इच्छाओं के पीछे चलता है और गुनाह में संलिप्त होता है, तो उसके द्वारा किए गए हर गुनाह के साथ उसके हृदय में अंधकार प्रवेश कर जाता है और इसके बाद वह फ़ितने का शिकार हो जाता है और उससे ईमान का नूर जाता रहता है। हृदय दरअसल लोटे की तरह है कि जब उसे उलटा रख दिया जाए, तो उसके अंदर की चीज़ें बाहर निकल जाती हैं और कुछ अंदर जा नहीं पाता।
  5. उमर रज़ियल्लाहु अनहु के शब्दों "لا أبا لك" का अर्थ है : इस काम को पूरी लगन के साथ करो, कमर कस लो और उस व्यक्ति की तरह प्रयास करो, जिसका कोई सहयोगी न हो।
  6. उमर रज़ियल्लाहु अनहु की फ़ज़ीलत जो लोगों और फ़ितनों के बीच बंद द्वार थे।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 128-129) (144). النهاية في غريب الحديث والأثر (606) (649) (471) (521) (340) (139). شرح النووي على مسلم (2/ 171).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
9 में से 8
9 हदीसें
  1. ‎“‎किसी आदमी ने अपने पेट से बुरा बर्तन कोई नहीं भरा। आदम की संतान के लिए खाने के कुछेक लुक़मे काफ़ी हैं, जो उसकी पीठ खड़ी रखें। अगर अधिक खाना ज़रूरी हो तो पेट का एक तिहाई भाग खाने के लिए, एक तिहाई भाग पीने के लिए और एक तिहाई भाग सांस लेने के लिए हो।‎”‎
  2. मैंने अपने बाद कोई ऐसा फ़ितना नहीं छोड़ा, जो पुरुषों के हक़ में स्त्रियों से अधिक हानिकारक हो।
  3. मानव के भाग्य में ज़िना लिख दिया गया है, जिसे वह करके रहेगा: आँखों का ज़िना देखना है। कानों का ज़िना सुनना है और ज़बान का ज़िना गंदी बात करनी है। हाथों का ज़िना पकड़ना है और पैर का ज़िना चलकर जाना है। और दिल चाहता व तमन्ना करता है और गुप्तांग उसे सच कर दिखाता है अथवा उसे झुठला देता है
  4. मैं अपनी उम्मत पर दो चीजों से डरता हूँः क़ुरआन और दूध। जहाँ तक दूध की बात है, तो लोग उसके कारण देहातों की ओर चले जाएँगे और अपनी इच्छाओं के पीछे भागेंगे तथा नमाज़ छोड़ेंगे। रही बात क़ुरआन की, तो मुनाफ़िक़ भी उसे सीख लेंगे और उसके आधार पर मोमिनों से बहस करेंगे।
  5. ज्ञान इसलिए न अर्जित करो कि उलेमा से बहस कर सको और अज्ञान लोगों से झगड़ सको
  6. अल्लाह ने एक उदाहरण दिया है। एक सीधा रास्ता है
  7. जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की सदृश आयतों का अनुसरण करते हों, तो जान लो कि उन्हीं का नाम अल्लाह ने लिया है। अतः उनसे सावधान रहना
  8. फ़ितने दिलों पर चटाई की तीलियों की तरह एक के बाद एक आते रहते हैं
  9. तुममें से कोई उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक उसकी इच्छाएँ मेरी लाई हुई शरीयत की अधीन न हो जाएँ।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com