आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सारगर्भित दुआओं को पसंद करते थे और इससे इतर दुआओं को छोड़ देते थे।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ऐसी सारगर्भित दुआएँ पसंद करते थे, जो दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयों पर सम्मिलित हों, कम शब्दों में अधिक अर्थों को समेटे हुए हों तथा उनके अंदर अल्लाह की प्रेशंसा और सही उद्देश्य निहित हों। जिन दुआओं के अंदर ये विशेषताएँ न हों, उनसे आप गुरेज़ करते थे।
फ़ायदे
दुआएँ छोटी लेकिन व्यापक और अच्छे अर्थ वाले शब्दों में करना मुसतहब है। इसमें बनावट से काम लेना मकरूह है। यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े के विरुद्ध भी है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सारगर्भित शब्दों में बात रखने की क्षमता प्रदान की गई थी।
कोशिश यह हो कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित दुआओं को पढ़ा जाए, चाहे लम्बी और अधिक शब्दों वाली ही क्यों न हो। इस प्रकार सारी दुआएँ सारगर्भित दुआओं के दायरे में आती हैं।
हवाला
سنن أبي داود (2/ 605) (1482).
مسند أحمد (42/ 76) (25151).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 542).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1003).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 15).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 349).
यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com