عن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعاً: يُستجاب لأحدكم ما لم يَعْجَلْ: يقول: قد دعوت ربي، فلم يستجب لي».
وفي رواية لمسلم: «لا يزال يُستجاب للعبد ما لم يَدْعُ بإثم، أو قطيعة رحم، ما لم يَسْتَعْجِلْ» قيل: يا رسول الله ما الاستعجال؟ قال: «يقول: قد دعوت، وقد دعوت، فلم أر يستجب لي، فَيَسْتَحْسِرُ عند ذلك ويَدَعُ الدعاء».
अबू हुरैरा (रजि़यल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः तुममें से किसी की दुआ उस समय तक क़बूल होती है, जब तक वह जल्दबाजी न करे, अर्थात ऐसा न कहे कि मैंने अपने रब को पुकारा, परन्तु, मेरी दुआ क़बूल ना हुई।
तथा मुस्लिम की रिवायत में हैः "बंदे की दुआ उस समय तक क़बूल होती है, जब तक गुनाह या रिश्ता-नाता तोड़ने की दुआ न करे, जब तक जल्दबाजी न करे।" प्रशन किया गया कि ऐ अल्लाह के रसूल, जल्दबाजी करने का क्या अर्थ है? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "ऐसा कहे कि मैंने दुआ की, फिर दुआ की, परन्तु मेरी दुआ क़बूल नहीं हुई और इसके बाद थक हार कर बैठ जाए और दुआ करना छोड़ दे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि बंदे की दुआ उस समय तक ग्रहण होती है, जब तक वह किसी गुनाह के काम या संबंध विच्छेद की दुआ न करे और जल्दबाज़ी न दिखाए। यह सुन किसी ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! जल्दबाज़ी से क्या मुराद है, जिसके कारण दुआ ग्रहण होने से रह जाती है? तो फ़रमाया : बंदा यह कहे कि मैंने बार-बार दुआ की, लेकिन मेरी दुआ ग्रहण नहीं हुई और फिर जल्दबाज़ी दिखाते हुए दुआ करना बंद कर दे।
हवाला
- صحيح البخاري، للإمام محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق محمد الناصر، دار طوق النجاة.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى، 1418ه.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى سعيد الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة الرابعة عشرة، 1407هـ.
- كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا، الطبعة الأولى، 1430ه.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد علي بن محمد بن علان البكري الصديقي، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة.
- شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي سَعِيدٍ رضي الله عنه أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَدْعُو بِدَعْوَةٍ لَيْسَ فِيهَا إِثْمٌ، وَلَا قَطِيعَةُ رَحِمٍ، إِلَّا أَعْطَاهُ اللهُ بِهَا إِحْدَى ثَلَاثٍ: إِمَّا أَنْ تُعَجَّلَ لَهُ دَعْوَتُهُ، وَإِمَّا أَنْ يَدَّخِرَهَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ، وَإِمَّا أَنْ يَصْرِفَ عَنْهُ مِنَ السُّوءِ مِثْلَهَا» قَالُوا: إِذنْ نُكْثِرُ، قَالَ: «اللهُ أَكْثَرُ».
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो मुसलमान कोई दुआ करता है, जिसमें गुनाह एवं संबंध विच्छेद न हो, उसे अल्लाह तीन में से कोई एक चीज़ ज़रूर देता है। उसकी दुआ इसी दुनिया में क़बूल कर लेता है, या उसे उसकी आख़िरत के लिए जमा रख लेता है या उससे उसके समान बुराई दूर कर देता है।" सहाबा ने कहा : तब तो हम खूब दुआएँ किया करेंगे। आपने कहा : "अल्लाह अधिक देने वाला है।"
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जब एक मुसलमान कोई दुआ करता है और अल्लाह से कोई ऐसी चीज़ माँगता है, जिसमें गुनाह न हो, मसलन वह कोई गुनाह या अत्याचार को आसान करने की दुआ नहीं करता, इसी तरह उसकी माँगी हुई चीज़ में संबंध विच्छेद का पहलू न हो, मसलन वह अपने बाल-बच्चों और रिश्तेदारों के हक़ में बद-दुआ न करता हो, तो अल्लाह उसे तीन चीज़ों में से कोई एक चीज़ ज़रूर प्रदान करता है : या तो उसकी दुआ फ़ौरन क़बूल करते हुए उसे उसकी माँगी हुई चीज़ प्रदान कर देता है। या तो उसे माँगी हुई चीज़ तो नहीं देता, लेकिन आख़िरत में उसका प्रतिफल देते हुए उसके दर्जे ऊँचे करता है, उसपर अपनी दया की चादर तान देता है या उसके गुनाहों को माफ़ कर देता है। या फिर दुनिया में दुआ के परिमाण में उससे कोई बुराई दूर कर देता है। चुनांचे सहाबा ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा : तब तो हम ज़्यादा से ज़्यादा दुआ किया करेंगे, ताकि इनमें से कोई एक वस्तु प्राप्त कर सकें? जवाब में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : तुम जो कुछ माँगोगे, अल्लाह के पास उससे कहीं ज़्यादा और बड़ी-बड़ी चीज़ें मौजूद हैं। उसकी दानशीलता के सोते कभी नहीं सूखेंगे।
फ़ायदे
- मुसलमान की दुआ क़बूल होती है। अस्वीकृत नहीं होती। शर्त यह है कि वह दुआ के आदाबा तथा शर्तों को ध्यान में रखे। इसलिए बंदे को चाहिए कि ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करे और क़बूल हो जाने की जल्दी में न रहे।
- दुआ क़बूल होने का मतलब यह नहीं है कि माँगी हुई चीज़ मिल ही जाए। दुआ के बदले में गुनाहों की माफ़ी भी हो सकती है और उसे आख़िरत के लिए जमा भी रखा जा सकता है।
- इब्न-ए-बाज़ कहते हैं : गिड़गिड़ाना, अल्लाह से अच्छा गुमान रखना और निराश न होना, दुआ के क़बूल होने के सबसे बड़े कारणों में से हैं। इसलिए दुआ करते समय इन्सान को गिड़गिड़ाना चाहिए, अल्लाह से अच्छा गुमान रखना चाहिए और इस बात का विश्वास रखना चाहिए कि अल्लाह हिकमत वाला तथा सब कुछ जानने वाला है। वह कभी किसी हिकमत के मद्देनज़र दुआ फ़ौरन क़बूल कर लेता है, कभी किसी हिकमत के तहत देर से क़बूल करता है और कभी माँगने वाले को उसकी माँगी हुई वस्तु से बेहतर वस्तु प्रदान करता है।
हवाला
مسند أحمد (17/ 213) (11133).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 592).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص805).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 54).
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، للقاري (4/ 1537).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1020).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ سَلْمَانَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنَّ رَبَّكُمْ حَيِيٌّ كَرِيمٌ، يَسْتَحْيِي مِنْ عَبْدِهِ إِذَا رَفَعَ يَدَيْهِ إِلَيْهِ أَنْ يَرُدَّهُمَا صِفْرًا».
सलमान -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुम्हारा रब बड़ा ही हया वाला तथा दानशील है। जब कोई बंदा उसके आगे अपने हाथों को फैलाता है, तो उसे उनको खाली लौटाने में शर्म आती है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दुआ के दौरान दोनों हाथों को उठाने की प्रेरणा दे रहे हैं और बता रहे हैं कि अल्लाह अत्यधिक हया वाला है। वह देने से गुरेज़ नहीं करता। वह बंदे का दामन ख़ुशियों से भर देता है और उसे हानियों से बचाता है। वह दाता है और बिन माँगे भी देता है, तो भला माँगने के बाद कैसे नहीं देगा? उसे इस बात से हया आती है कि जब कोई मोमिन बंदा उससे कुछ माँगने के लिए हाथ उठाए, तो उसके हाथों को खाली व नामुराद वापस कर दे।
फ़ायदे
- जितना अधिक कोई व्यक्ति अल्लाह के सामने अपनी लाचारी और बंदगी व्यक्त करता है, उतनी ही अधिक आशा होती है कि उसकी दुआ स्वीकार की जाएगी।
- दुआ की प्रेरणा। दुआ के समय दोनों हाथों को उठाना मुसतहब है और यह दुआ क़बूल होने का एक सबब है।
- बंदों पर अल्लाह की असीम कृपा तथा दया।
हवाला
سنن أبي داود (2/ 609) (1488).
سنن الترمذي (5/ 521) (3556).
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، لعبد الله البسام (7/ 552).
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (10/ 423).
فتح ذي الجلال والإكرام، لابن عثيمين (6/ 483).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَائِشَةَ رضي الله عنها قَالَتْ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَسْتَحِبُّ الْجَوَامِعَ مِنَ الدُّعَاءِ، وَيَدَعُ مَا سِوَى ذَلِكَ.
आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सारगर्भित दुआओं को पसंद करते थे और इससे इतर दुआओं को छोड़ देते थे।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ऐसी सारगर्भित दुआएँ पसंद करते थे, जो दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयों पर सम्मिलित हों, कम शब्दों में अधिक अर्थों को समेटे हुए हों तथा उनके अंदर अल्लाह की प्रेशंसा और सही उद्देश्य निहित हों। जिन दुआओं के अंदर ये विशेषताएँ न हों, उनसे आप गुरेज़ करते थे।
फ़ायदे
- दुआएँ छोटी लेकिन व्यापक और अच्छे अर्थ वाले शब्दों में करना मुसतहब है। इसमें बनावट से काम लेना मकरूह है। यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े के विरुद्ध भी है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सारगर्भित शब्दों में बात रखने की क्षमता प्रदान की गई थी।
- कोशिश यह हो कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित दुआओं को पढ़ा जाए, चाहे लम्बी और अधिक शब्दों वाली ही क्यों न हो। इस प्रकार सारी दुआएँ सारगर्भित दुआओं के दायरे में आती हैं।
हवाला
سنن أبي داود (2/ 605) (1482).
مسند أحمد (42/ 76) (25151).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 542).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1003).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 15).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 349).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَن أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: «لاَ يَقُلْ أَحَدُكُمْ: اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي إِنْ شِئْتَ، ارْحَمْنِي إِنْ شِئْتَ، ارْزُقْنِي إِنْ شِئْتَ، وَليَعْزِمْ مَسْأَلَتَهُ، إِنَّهُ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ، لاَ مُكْرِهَ لَهُ».
ولمسلم: «وَلَكِنْ لِيَعْزِمِ الْمَسْأَلَةَ وَلْيُعَظِّمِ الرَّغْبَةَ، فَإِنَّ اللهَ لَا يَتَعَاظَمُهُ شَيْءٌ أَعْطَاهُ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुममें से कोई व्यक्ति यह न कहे : ऐ अल्लाह! यदि तू चाहे तो मुझे क्षमा प्रदान कर, ऐ अल्लाह! यदि तू चाहे तो मुझपर दया कर। उसे चाहिए कि यक़ीन के साथ माँगे। इसलिए कि अल्लाह जो चाहता है करता है। उसे मजबूर कर सके, ऐसी कोई हस्ती नहीं है।" मुस्लिम की रिवायत में है : "अल्लाह से विश्वास के साथ माँगे और पूरी चाहत दिखाए। इसलिए कि अल्लाह के लिए कुछ भी देना भारी नहीं है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी चीज़ से, यहाँ तक कि अल्लाह की इच्छा से भी, जोड़कर दुआ करने से मना किया है। क्योंकि यह एक ज्ञात बात है कि अल्लाह क्षमा उसी समय करेगा, जब क्षमा करना चाहेगा। इच्छा की शर्त रखना इसलिए भी अर्थहीन है कि इच्छा की शर्त उसके बारे में रखी जाती है, जिससे बिना इच्छा के भी कोई हो सकता हो। जैसे ज़ोर-ज़बरदस्ती कोई काम करवा लिया जाना। लेकिन अल्लाह के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी इस हदीस के अंत में इस बिंदु को स्पष्ट करते हुए कह दिया है कि अल्लाह को कोई मजबूर नहीं कर सकता। कोई भी चीज़ देना उसके लिए कठिन नहीं है और कुछ भी उसके वश से बाहर नहीं है। दूसरी बात यह है कि इच्छा की शर्त लगाकर क्षमा याचना करना दरअसल यह बताना है कि मुझे अल्लाह की क्षमा की ज़रूरत नहीं है। इसलिए 'अगर तू देना चाहे तो दे' कहना दरअसल यह बताना है कि उसे या तो लेने की ज़रूरत नहीं है या फिर जिससे माँग रहा है वह बेबस है। जहाँ सामने वाला सक्षम हो और माँगने वाला ज़रूरतमंद, वहाँ विश्वास के साथ माँगा जाता है। इसलिए अल्लाह से ऐसे माँगना चाहिए, जैसे एक निर्धन व ज़रूरतमंद एक दाता व ज़रूरत पूरी करने वाले से माँग रहा हो। क्योंकि अल्लाह धनवान्, निस्पृह और क्षमतावान् है।
फ़ायदे
- इच्छा की शर्त लगाकर दुआ करना मना है।
- अल्लाह उन तमाम चीज़ों से पाक है, जो उसकी महानता, अपार अनुग्रह, संपूर्ण निस्पृहता एवं दानशीलता के अनुरूप नहीं है।
- सर्वशक्तिमान अल्लाह संपूर्ण है।
- अल्लाह के पास मौजूद चीज़ों की चाहत रखने और अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखने का महत्व।
- कुछ लोग अनजाने में भी दुआ के साथ इच्छा की शर्त लगा देते हैं। जैसे कह देते हैं : 'अल्लाह चाहे तो तुम्हें अच्छा प्रतिफल दे' तथा 'अल्लाह चाहे तो तुमपर दया करे' आदि। इस प्रकार के वाक्यों का प्रयोग सही नहीं है और सही न होने का प्रमाण यही हदीस है।
हवाला
صحيح البخاري (9/ 140) (7477).
صحيح مسلم (4/ 2063) (2679).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص410).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص368).
القول المفيد على كتاب التوحيد، لابن عثيمين (2/ 331).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي بن كعب رضي الله عنه : كان رسولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إذا ذَهَبَ ثُلثُ الليلِ قامَ، فقال: "يا أيها الناسُ، اذكروا اللهَ، جاءت الرَّاجِفَةُ، تَتْبَعُها الرَّادِفَةُ، جاءَ الموتُ بما فيه، جاءَ الموتُ بما فيه"، قلتُ: يا رسول الله، إني أُكْثِرُ الصلاةَ عليكَ، فكم أجعلُ لكَ من صلاتِي؟ فقالَ: "ما شِئتَ"، قلتُ: الرُّبُعَ؟، قالَ: "ما شئتَ، فإنْ زِدتَ فهو خيرٌ لكَ"، قلتُ: فالنّصفَ؟، قالَ: "ما شئتَ، فإن زِدتَ فهو خيرٌ لكَ"، قلتُ: فالثلثين؟ قالَ: "ما شئتَ، فإن زدتَ فهو خيرٌ لكَ"، قلتُ: أجعلُ لكَ صلاتِي كُلَّها؟ قالَ: "إذاً تُكْفى هَمَّكَ، ويُغْفَرَ لكَ ذَنبُكَ".
उबै बिन काब (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का एक नित्यकार्य यह था कि जब एक तिहाई रात गुज़र जाती तो खड़े होते और कहतेः ऐ लोगो! अल्लाह को याद करो। पहली बार सूर फूँकने का समय आ गया है। उसके बाद दूसरी बार सूर में फूँक मारी जाएगी। मृत्यु अपनी कठिनाइयों के साथ आ चुकी है। मृत्यु अपनी कठिनाइयों के साथ आ चुकी है। मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं आप पर अत्यधिक दरूद भेजा करता हूँ। मैं यह जानना चाहता हूँ कि अपनी दुआ का कितना भाग आपके लिए ख़ास करूँ? फ़रमायाः जितना चाहो। मैंने कहाः एक चौथाई? फ़रमायाः जितना चाहो, करो। यदि इससे अधिक करते हो तो वह तुम्हारे लिए अच्छा है। मैंने कहाः आधा? तो फ़रमायाः जितना चाहो, करो। अगर इससे ज़्यादा करते हो तो वह तुम्हारे लिए बेहतर है। मैंने कहाः दो तिहाई? फ़रमायाः जितना चाहो, करो। अगर इससे भी अधित करते हो तो वह तुम्हारे हक़ में उत्तम है। मैंने कहाः मैं अपनी सारी दुआओं को आपके लिए ख़ास कर दूँ? तो फ़रमायाः अगर ऐसा करोगे तो तुम्हारी सारी चिंताएँ समाप्त हो जाएँगी और तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ हो जाएंगे।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي.
تحفة الذاكرين بعدة الحصن الحصين؛ للإمام محمد بن علي الشوكاني، تحقيق سيد إبراهيم وغيره، دار الحديث-القاهرة، الطبعة الأولى، 1419م.
الجامع الكبير؛ للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق د. بشار عواد، دار الغرب الإسلامي-بيروت، الطبعة الثانية، 1998م.
جامع المسائل؛ لشيخ الإسلام أحمد بن تيمية الحراني، تحقيق محمد عزيز شمس، دار عالم الفوائد، الطبعة الأولى، 1422هـ.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي-بيروت.
رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ.
سلسلة الأحاديث الصحيحة؛ للشيخ محمد ناصر الدين الألباني، مكتبة المعارف-الرياض، 1415هـ.
صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبدالباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
كنوز رياض الصالحين؛ فريق علمي برئاسة أ.د. حمد العمار، دار كنوز إشبيليا-الرياض، الطبعة الأولى، 1430هـ.
المسند؛ للإمام أحمد بن حنبل، نشر المكتب الإسلامي-بيروت، مصور عن الطبعة الميمنية.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أنس رضي الله عنه : أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم جاءَ إلى سعد بنِ عبادة رضي الله عنه فَجَاءَ بِخُبْزٍ وَزَيْتٍ، فأكلَ، ثم قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم : «أفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ؛ وَأكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبرَارُ، وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ المَلاَئِكَةُ».
अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) साद बिन उबादा (रज़ियल्लाहु अनहु) के यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने रोटी और तेल पेश किया। आपने उसे खाया और यह दुआ फ़रमाई : "أفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ؛ وَأكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبرَارُ، وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ المَلاَئِكَةُ" (तुम्हारे यहाँ रोज़ेदार इफ़तार किया करें, तुम्हारा खाना नेक लोग खाएँ और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए दुआ करें)।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।दर्जाइसकी सनद सह़ीह़ है।
हवाला
1- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي.
2- تطريز رياض الصالحين؛ تأليف فيصل آل مبارك، تحقيق د. عبدالعزيز آل حمد، دار العاصمة-الرياض، الطبعة الأولى، 1423هـ.
3- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي-بيروت.
4- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ.
5- سنن أبي داود؛ للإمام أبي داود سليمان بن الأشعث السجستاني، تعليق عزت الدعاس وغيره، دار ابن حزم-بيروت، الطبعة الأولى، 1418هـ.
6- سنن ابن ماجه؛ للحافظ محمد بن يزيد القزويني، حققه محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء الكتب العربية.
7- المسند؛ للإمام أحمد بن حنبل، نشر المكتب الإسلامي-بيروت، مصور عن الطبعة الميمنية.
8- مسند الدارمي –المعروف بـ: سنن الدارمي-؛ للإمام عبدالله بن عبدالرحمن الدارمي، تحقيق حسين سليم، دار المغني-الرياض، الأولى، 1421هـ.
9- مشكاة المصابيح؛ تأليف محمد بن عبدالله التبريزي، تحقيق محمد ناصر الدين الألباني، المكتب الإسلامي-بيروت، الطبعة الثانية، 1399هـ.
10- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com