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तशरीह के साथ हदीसें

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़िक्र का तरीक़ा

8 हदीसें

जब आदमी अपने घर में प्रवेश करता है और प्रवेश करते समय एवं खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेता है, तो शैतान अपने साथियों से कहता है : यहाँ न तुम्हारे लिए रात बिताने का स्थान है और न रात के खाने का प्रबंध

عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللهِ رضي الله عنهما أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «إِذَا دَخَلَ الرَّجُلُ بَيْتَهُ، فَذَكَرَ اللهَ عِنْدَ دُخُولِهِ وَعِنْدَ طَعَامِهِ، قَالَ الشَّيْطَانُ: لَا مَبِيتَ لَكُمْ، وَلَا عَشَاءَ، وَإِذَا دَخَلَ، فَلَمْ يَذْكُرِ اللهَ عِنْدَ دُخُولِهِ، قَالَ الشَّيْطَانُ: أَدْرَكْتُمُ الْمَبِيتَ، وَإِذَا لَمْ يَذْكُرِ اللهَ عِنْدَ طَعَامِهِ، قَالَ: أَدْرَكْتُمُ الْمَبِيتَ وَالْعَشَاءَ».
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब आदमी अपने घर में प्रवेश करता है और प्रवेश करते समय एवं खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेता है, तो शैतान अपने साथियों से कहता है : यहाँ न तुम्हारे लिए रात बिताने का स्थान है और न रात के खाने का प्रबंध। और जब वह घर में प्रवेश करता है तथा प्रवेश करते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान कहता है : तुमने रात बिताने का स्थान पा लिया और जब खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो कहता है : तुमने रात बिताने की जगह तथा रात का खाना दोनों पा लिया।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घर में प्रवेश करते समय और खाना खाने से पहले अल्लाह का नाम लेने का आदेश दिया है। जब कोई व्यक्ति घर में प्रवेश करते और खाना खाते समय बिस्मिल्लाह कहता है, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि तुम्हारे लिए इस घर में रात गुज़ारने का स्थान और रात के खाने का प्रबंध नहीं है, क्योंकि घर के मालिक ने तुमसे अल्लाह की शरण ले ली है। इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति घर में दाख़िल होता है और घर में दाखिल होते तथा खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि इस घर में उनके रात गुज़ारने तथा खाने का प्रबंध हो गया है।

फ़ायदे
  1. घर में दाखिल होते तथा खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेना मुसतहब है। क्योंकि अल्लाह का नाम न लेने पर शैतान घर में रात गुज़ारता है और खाने में शरीक हो जाता है।
  2. शैतान इन्सान के हर काम को ध्यान से देखता रहता है और जैसे ही इन्सान अल्लाह के नाम से ग़ाफ़िल होता है, उसकी मुराद पूरी हो जाती है।
  3. अल्लाह का ज़िक्र शैतान को भगाता है।
  4. हर शैतान के कुछ अनुसरणकारी तथा सहयोगी होते हैं, जो उसकी बात से खुश होते और उसके आदेश का पालन करते हैं।
हवाला

صحيح مسلم (3/ 1598) (2018). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 50). تطريز رياض الصالحين، لفيصل المبارك (ص467). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 190). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 700).

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“ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सामने समर्पित कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी मदद से दुश्मनों से झगड़ा किया। ऐ अल्लाह! मैं तेरे प्रभुत्व की शरण में आता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, इस बात से कि तू मुझे गुमराह करे। तू जीवंत है, जिसे कभी मौत नहीं आती, जबकि जिन्न और इन्सान मरते हैं।”

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضيَ اللهُ عنهما أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَقُولُ: «اللهُمَّ لَكَ أَسْلَمْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ، وَبِكَ خَاصَمْتُ، اللهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِعِزَّتِكَ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ أَنْ تُضِلَّنِي، أَنْتَ الْحَيُّ الَّذِي لَا يَمُوتُ، وَالْجِنُّ وَالْإِنْسُ يَمُوتُونَ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सामने समर्पित कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी मदद से दुश्मनों से झगड़ा किया। ऐ अल्लाह! मैं तेरे प्रभुत्व की शरण में आता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, इस बात से कि तू मुझे गुमराह करे। तू जीवंत है, जिसे कभी मौत नहीं आती, जबकि जिन्न और इन्सान मरते हैं।”
बुख़ारी एवं मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है, तथा उपरोक्त शब्द मुस्लिम द्वारा वर्णित हैं और बुख़ारी ने इसे संक्षेप में रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

नबी ﷺ की यह दुआ थी: (अल्लाहुम्मा लका अस्लम्तु) यानी ऐ अल्लाह! मैं तेरा आज्ञाकारी बन गया, (व बिका आमन्तु) तुझपर ईमान लाया, तेरी पुष्टि की और तेरे प्रति अपनी स्वीकारोक्ति व्यक्त की, (व अलैका तवक्कल्तु) तुझपर भरोसा किया और अपने सारे मामलात तेरे हवाले कर दिए, (व इलैका अनब्तु) तेरी ओर लौट आया, (व बिका ख़ासम्तु) तथा तेरी मदद से तेरे दुश्मनों से वाद-विवाद किया। (अल्लाहुम्मा इन्नी अऊजु बिइज़्ज़तिका) ऐ अल्लाह! मैं तेरे सम्मान, शक्ति और प्रभुत्व के शरण में आता हूँ, (ला इलाह इल्ला अनत) कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, (अन तुज़िल्लनी) इस बात से कि तू मुझे सत्य एवं अपनी प्रसन्नता के मार्ग से हटा दे। (अंतल हय्युल लज़ी ला यमूतु) तू ही सदा जीवित रहने वाली हस्ती है, जिसे कभी मौत नहीं आ सकती और जो कभी फ़ना नहीं हो सकती। (वल जिन्नु वल् इन्सु यमूतून) जबकि जिन्नों एवं इन्सानों को मरना है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह से कुछ माँगने से पहले उसकी स्तुति गान करना चाहिए।
  2. केवल अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए और उसी से सुरक्षा माँगनी चाहिए। क्योंकि वह हर एतबार से संपूर्ण एवं परिपूर्ण है, इसलिए केवल उसी पर भरूसा किया जा सकता है। जबकि सारी सृष्टियाँ असमर्थ, विवश तथा नश्वर हैं। अतः उनपर भरोसा करने का कोई मतलब नहीं बनता।
  3. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पद्चिह्नों पर चलते हुए इन सारगर्भित शब्दों द्वारा दुआ करनी चाहिए, जो सच्चे ईमान एवं दृढ़ विश्वास को व्यक्त करते हैं।
  4. सिंधी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्द "तू ही जीवित है" का अर्थ है: इसलिए केवल तुझ ही से शरण माँगनी चाहिए, किसी और से नहीं।
हवाला

صحيح البخاري (9/ 117) (7383). صحيح مسلم (4/ 2086) (2717). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص72). فتح رب البرية بتلخيص الحموية، لابن عثيمين (ص79). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 109). مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، عبيد الله المباركفوري (8/ 223).

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यह दुआ सदा पढ़ते रहा करो 'يَاذا الجَلاَلِ والإكْرامِ' (अर्थात, ऐ प्रतापी एवं उपकारी)।

عن أنس رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رسُولُ الله صلى الله عليه وسلم : «ألِظُّوا بـ (يَاذا الجَلاَلِ والإكْرامِ)».
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "यह दुआ सदा पढ़ते रहा करो 'يَاذا الجَلاَلِ والإكْرامِ' (अर्थात, ऐ प्रतापी एवं उपकारी)।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. - كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا - الطبعة الأولى، 1430ه. سنن الترمذي - محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق وتعليق: أحمد محمد شاكر ومحمد فؤاد عبد الباقي وإبراهيم عطوة عوض - شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي - مصر، الطبعة: الثانية، 1395هـ - 1975م.

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अल्लाह की क़सम! मैं दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसके सामने तौबा करता हूँ।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «وَاللهِ إني لأَسْتَغْفِرُ اللهَ وأَتُوبُ إليهِ في اليومِ أَكْثَرَ من سَبْعِينَ مَرَّةً».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुनाः अल्लाह की क़सम! मैं दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसके सामने तौबा करता हूँ।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जिनके अगले-पिछले सारे गुनाह माफ़ थे, क़सम खाकर कह रहे हैं कि वह दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमायाचना और उसके सामने तौबा करते हैं। याद रहे कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की क्षमायाचना इसलिए नहीं हुआ करती थी कि आपसे कुछ गुनाह हो जाया करते थे, बल्कि यह अल्लाह की संपूर्ण दासता, उसके ज़िक्र से आपके लगाव, उसके विशाल अधिकार के एहसास और बंदे की कोताही, चाहे वह उसकी नेमतों का शुक्र अदा करने के लिए जितना भी काम करे, का प्रतीक है। यह दरअसल अपने बाद उम्मत के लिए आदर्श प्रस्तुत करने का एक उदाहरण है। इसके अंदर इस प्रकार के अन्य कई हिकमतें हैं।

हवाला

-نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407هـ - 1987م. -شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426هـ. -بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى1418هـ. -صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ.

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ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।

عن الْأَغَرِّ رضي الله عنه، وَكَانَ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «يَا أَيُّهَا النَّاسُ تُوبُوا إِلَى اللهِ، فَإِنِّي أَتُوبُ فِي الْيَوْمِ إِلَيْهِ مِائَةَ مَرَّةٍ».
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के एक सहाबी अग़र्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को अधिक से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करने का आदेश दे रहे हैं और ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं कि आप दिन में सौ बार से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करते हैं। जबकि आपके अगले एवं पिछले तमाम गुनाह माफ़ थे। यह दरअसल अल्लाह के सामने में अपनी बंदगी एवं हीनता के इज़हार का पराकाष्ठा है।

फ़ायदे
  1. प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे उसके ईमान का स्तर कुछ भी हो, सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर लौटने और तौबा के माध्यम से स्वयं को परिपूर्ण बनाने की आवश्यकता होती है। प्रत्येक व्यक्ति से अल्लाह के अधिकारों की अदायगी में कोताही हो ही जाया करती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ मोमिनो! तुम सब अल्लाह के सामने तौबा करो।"
  2. तौबा का यह आदेश आम है। तौबा चाहे हराम कामों और गुनाह करने की हो या अनिवार्य कार्य करने में कोताही की।
  3. तौबा के क़बूल होने के लिए दिल में अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति की नीयत करना शर्त है। जिसने अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य से गुनाह छोड़ा, वह तौबा करने वाला शुमार नहीं होगा।
  4. नववी कहते हैं : तौबा की तीन शर्तें हैं : 1- गुनाह को छोड़ देना। 2- गुनाह में संलिप्त होने पर शर्मिंदा होना। 3- इस बात की प्रतिज्ञा कर लेना कि दोबारा वह गुनाह नहीं करेगा। उपर्युक्त तीन शर्तें उस समय हैं, जब गुनाह का संबंध अल्लाह के किसी अधिकार के हनन से हो। अगर गुनाह का संबंध बंदों के अधिकारों में से किसी अधिकार के हनन से हो, तो तौबा के सही होने के लिए अधिकार वाले को उसका अधिकार लौटाना या माफ़ी-तलाफ़ी करा लेना चौथी शर्त होगी।
  5. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क्षमा याचना करने का यह अर्थ नहीं है कि गुनाह होने के कारण ही आप क्षमा याचना किया करते थे। दरअसल आप ऐसा अल्लाह की इबादत में पूरी तरह समर्पित होने, अल्लाह के ज़िक्र से हार्दिक संबंध, अल्लाह के महान अधिकार से अवगत होने और अल्लाह का शुक्र अदा करने में हो जाने वाली कमियों का एहसास रखने के कारण किया करते थे। इसका एक उद्देश्य अपनी उम्मत के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना भी था।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2075) (2702). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 33). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 97). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 52).

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अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सजदे की हालत में यह दुआ किया करते थे : “हे अल्लाह, तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा स्पष्ट-अस्पष्ट सभी को।”

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَقُولُ فِي سُجُودِهِ: «اللهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ دِقَّهُ، وَجِلَّهُ، وَأَوَّلَهُ وَآخِرَهُ وَعَلَانِيَتَهُ وَسِرَّهُ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सजदे की हालत में यह दुआ किया करते थे : “हे अल्लाह, तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा स्पष्ट-अस्पष्ट सभी को।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सजदे में यह दुआ किया करते थे : "اللهم اغفر لي ذنبي" यानी ऐ अल्लाह! मेरे सारे गुनाहों को क्षमा कर दे, उनपर पर्दा डाल दे और मुझे उनके कुप्रभावों से बचाए रख। "كله" सारे गुनाह, "دِقّه" छोटे और कम गुनाह "وجِلّه" तथा बड़े और अधिक गुनाह "وأوله" पहले गुनाह, "وآخره" अंतिम गुनाह और बीच के सारे गुनाह "علانيته وسره" खुले और छुपे गुनाह, जिन्हें तेरे सिवा कोई नहीं जानता।

फ़ायदे
  1. इब्न-ए-क़ैयिम कहते हैं : छोटे और बड़े, कम और ज़्यादा, पहले और बाद के तथा छुपे और खुले तमाम गुनाहों से व्यापक अंदाज़ में क्षमा इसलिए माँगी गई है, ताकि सभी गुनाहों से तौबा हो जाए। बंदा जिन्हें जानता है उनसे भी और जिन्हें नहीं जानता उनसे भी।
  2. कहा गया है : आपने 'الجِلّ' से पहले 'الدِّق' का ज़िक्र इसलिए किया है कि माँगने वाला माँगते समय दर्जा-ब-दर्जा आगे बढ़ता है। दूसरी बात यह है कि बड़े गुनाह आम तौर पर छोटे गुनाहों पर आग्रह एवं उनके बारे में लापरवाही के नतीजे ही में सामने आते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि छोटे पाप ही बड़े पापों का ज़रिया हैं और ज़रिया का ज़िक्र पहले किया जाना चाहिए।
  3. इन्सान को विनम्रता के साथ अल्लाह से छोटे-बड़े सभी पापों के लिए क्षमा माँगनी चाहिए।
  4. नववी कहते हैं : इस हदीस में बार-बार दुआ करने और दुआ के शब्दों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की प्रेरणा दी गई है, यद्यपि उसके कुछ शब्द कुछ से बेनियाज़ कर देते हों।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 350) (483). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 506). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص780). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 509). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 111). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 979).

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हे अल्लाह, तू मेरे पापों को क्षमा कर दे, जो कुछ भी मैंने पहले किया या बाद में किया, छिपाकर किया या दिखाकर किया।

عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام إلى الصلاة يكون من آخر ما يقول بين التشهد والتسليم: «اللهم اغفر لي ما قَدَّمتُ وما أخَّرْتُ، وما أسررتُ وما أعلنتُ، وما أسْرَفتُ، وما أنت أعلم به مني، أنت المُقَدِّم، وأنت المؤخر، لا إله إلا أنت».
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो सबसे अंत में तशह्हुद और सलाम के बीच में यह दुआ पढ़ते थेः “हे अल्लाह, तू मेरे पापों को क्षमा कर दे, जो कुछ भी मैंने पहले किया या बाद में किया, छिपाकर किया या दिखाकर किया, जो कुछ मैंने ज़्यादती की और जो तू मुझसे भी बेहतर जानता है। तू ही आगे करने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं”।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف: سليم الهلالي، دار ابن الجوزي. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير- دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبدالباقي، دار عالم الكتب، الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، تأليف ملا علي القاري، تحقيق صدقي العطار، دار الفكر، بيروت، الطبعة الأولى، 1412هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.

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तुम कहते रहा करो : لا إله إلا الله وحده لا شريك له، الله أكبر كبيرًا، والحمد لله كثيرًا، وسبحان الله رب العالمين، ولا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم" (अर्थात, अल्लाह के अतिरिक्त कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है। उस अल्लाह के लिए अत्याधिक प्रशंसा है। पवित्र है वह अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है। पाप से दूर रहने की शक्ति एवं नेकी का सामर्थ्य केवल उसी शक्तिशाली एवं हिकमत वाले अल्लाह से प्राप्त होती है।)

عَنْ سَعْدٍ رضي الله عنها قَالَ: جَاءَ أَعْرَابِيٌّ إِلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: عَلِّمْنِي كَلَامًا أَقُولُهُ، قَالَ: «قُلْ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، اللهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كَثِيرًا، سُبْحَانَ اللهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ» قَالَ: فَهَؤُلَاءِ لِرَبِّي، فَمَا لِي؟ قَالَ: «قُلْ: اللهُمَّ اغْفِرْ لِي وَارْحَمْنِي وَاهْدِنِي وَارْزُقْنِي».
साद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : एक देहाती, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और बोला : मुझे कोई ऐसी बात सिखा दीजिए, जो मैं कहता रहूँ। आपने फ़रमाया : तुम कहते रहा करो : لا إله إلا الله وحده لا شريك له، الله أكبر كبيرًا، والحمد لله كثيرًا، وسبحان الله رب العالمين، ولا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم" (अर्थात, अल्लाह के अतिरिक्त कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है। उस अल्लाह के लिए अत्याधिक प्रशंसा है। पवित्र है वह अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है। पाप से दूर रहने की शक्ति एवं नेकी का सामर्थ्य केवल उसी शक्तिशाली एवं हिकमत वाले अल्लाह से प्राप्त होती है।) उसने कहा : यह शब्द तो मेरे रब के लिए हैं, मेरे लिए क्या है? आपने फ़रमाया : तुम कहा करो : اللهم اغفر لي وارحمني واهدني وارزقني" (अर्थात, ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे, मुझपर दया कर, मुझे सीधा रास्ता दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।)
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

देहात से आए हुए एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अनुरोध किया कि उसे एक ज़िक्र सिखा दें, जिसे वह पढ़ा करे। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे कहा : तुम कहा करो : "لا إله إلا الله وحده لا شريك له" आरंभ एकेश्वरवाद की गवाही से किया। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है। "الله أكبر كبيرًا" (अल्लाहु अकबर कबीरा) यानी अल्लाह सारी चीज़ों से बड़ा एवं महान है। "والحمد لله كثيرًا" (वल-हम्दु लिल्लाहि कसीरा) यानी अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है। उसके गुणों एवं कार्यों तथा अनगिनत नेमतों पर। "سبحان الله رب العالمين" (सुबहानल्लाहि रब्बिल आलमीन) यानी अल्लाह कमियों से पाक एवं पवित्र है। "لا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم" (ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम) यानी एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना अल्लाह, उसके सहयोग और सुयोग के बिना संभव नहीं है। उस व्यक्ति ने कहा : ये शब्द मेरे रब के लिए हैं। यानी उसके ज़िक्र एवं सम्मान के लिए हैं। मुझे खुद अपने लिए माँगना हो, तो किन शब्दों द्वारा माँगूँ? चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा : तुम कहो : "اللهم اغفر لي" (अल्लाहुम्मग़्फिरली) ऐ अल्लाह! मेरे गुनाहों को मिटाकर तथा उनपर पर्दा डालकर मुझे क्षमा कर दे। "وارحمني" (वर्हमनी) मेरे धार्मिक एवं सांसारिक हितों की रक्षा करते हुए, मुझपर दया करत। "واهدني" (वहदिनी) मुझे उत्तम परिस्थितियों की राह दिखा और सीधे मार्ग पर चला। "وارزقني" (वर्ज़ुक़नी) मुझे हलाल धन, स्वास्थ्य और हर भलाई एवं सुरक्षा प्रदान कर।

फ़ायदे
  1. ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, अल-हम्दु लिल्लाह और सुबहानल्लाह द्वारा अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा।
  2. दुआ करने से पहले अल्लाह का ज़िक्र और प्रशंसा करना मुसतहब है।
  3. मुसतहब यह है कि इन्सान बेहतरीन दुआओं द्वारा अल्लाह से दुआ माँगे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित ऐसी सारगर्भित दुआओं का चयन करे, जो अपने अंदर दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ समेटी हुई हों। इन्सान को अख़्तियार है कि वह जो दुआ चाहे, करे।
  4. बंदे को ऐसी चीज़ें सीखने की कोशिश करनी चाहिए, जो दुनिया एवं आख़िरत में उसके हक़ में लाभकारी हों।
  5. क्षमा, दया एवं आजीविका माँगने की प्रेरणा, क्योंकि इन्हीं चीज़ों से भलाई के स्रोत फूटते हैं।
  6. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह कोशिश कि उम्मत को ऐसी बातें सिखाई जाएँ, जो उसके हक़ में लाभकारी हों।
  7. दया का ज़िक्र क्षमा के बाद इसलिए हुआ है कि इन्सान पूरे तौर पर स्वच्छ हो जाए। क्योंकि "المغفرة" (अल-मग़्फ़िरह) गुनाहों पर पर्दा डाल देने, उनको मिटा देने और जहन्नम से बचा लेने का नाम है, जबकि दया विभिन्न प्रकार की भलाई प्रदान करने और जन्नत में दाख़िल करने का नाम है और यही सबसे बड़ी सफलता है।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2072) (2696). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 498). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 972). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (4/ 1606).

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