عن أبي واقد الحارث بن عوف رضي الله عنه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بينما هو جالس في المسجد، والناس معه، إذ أقبل ثلاثَةُ نَفَرٍ، فأقبل اثنان إلى رسول الله، صلى الله عليه وسلم وذهب واحد، فوقفا على رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فأما أحدهما فرأى فُرْجَةً في الْحَلْقَةِ فجلس فيها، وأما الآخر فجلس خلفهم، وأما الثالث فأدْبَر ذاهبٍا، فلما فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «ألا أُخْبِرُكُم عن النَّفَرِ الثلاثة: أما أحدهم فأَوَى إلى الله فآوَاهُ الله إليه، وأما الآخر فاسْتَحْيا فاسْتَحْيَا الله منه، وأما الآخر، فأعْرَضَ، فأعرضَ اللهُ عنه».
अबू वाक़िद हारिस बिन औफ़ (रज़ियल्लाहु अनहु) सेे रिवायत है कि एक बार अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मस्जिद में लोगों के साथ बैठे थे कि इतने में तीन आदमी आए। उनमें से दो लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए और एक वापस चला गया। जो दो व्यक्ति अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, उनमें से एक मज्लिस में एक खाली स्थान देखकर बैठ गया और दूसरा लोगों के पीछे जाकर बैठा। रही बात तीसरे की, तो वह उलटे पाँव वापस हो गया। जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की व्यस्तता समाप्त हुई, तो फ़रमायाः क्या मैं तुम्हें उन तीन व्यक्तियों के बारे में न बताऊँ? उनमें से एक ने अल्लाह की शरण ली, तो अल्लाह ने उसे अपनी शरण दे दी। दूसरा शरमाया, तो अल्लाह ने भी उसकी लाज रख ली। तीसरे ने मुँह फेरा, तो अल्लाह ने भी उससे मुँह फेर लिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، دار طوق النجاة، ط: الأولى، 1422هـ.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي – بيروت.
رياض الصالحين، للنووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق -بيروت، ط: الأولى 1428هـ.
نزهة المتقين، لمجموعة من المؤلفين، مؤسسة الرسالة، ط: الرابعة عشر،1407هـ.
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، بإشراف مؤسسة الشيخ، دار الوطن للنشر، الرياض، ط: 1426هـ.
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي، دار ابن الجوزي، السعودية، ط: الثالثة 1418هـ.
تطريز رياض الصالحين، تأليف فيصل آل مبارك، تحقيق د. عبد العزيز آل حمد، دار العاصمة -الرياض، الطبعة الأولى، 1423هـ.
صفات الله عز وجل الواردة في الكتاب والسنة: علوي بن عبد القادر السَّقَّاف، دار الهجرة الطبعة: الثالثة ، 1426هـ - 2006م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن سمرة بن جندب رضي الله عنه قال: لقد كنت على عَهْدِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم غُلاما، فكنت أحفظ عنه، فما يمنعني من القول إلا أن هاهنا رِجَالًا هم أَسَنُّ مِنِّي.
समुरा बिन जुंदुब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैं अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में कमसिन- छोटा- था। मैं आपकी बातें याद कर लिया करता था। परन्तु, उन्हें बयान करने से मुझे केवल यह बात रोकती थी कि मुझसे अधिक आयु वाले लोग भी मौजूद होते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة: الأولى 1418هـ.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، محمد علي بن البكري بن علان، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، الطبعة: الرابعة 1425هـ.
رياض الصالحين، للنووي، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، كنوز إشبيليا، الرياض، الطبعة: الأولى 1430هـ.
صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ: أَنَّ أَعْرَابِيًّا أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: دُلَّنِي عَلَى عَمَلٍ إِذَا عَمِلْتُهُ دَخَلْتُ الجَنَّةَ، قَالَ: «تَعْبُدُ اللَّهَ لاَ تُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا، وَتُقِيمُ الصَّلاَةَ المَكْتُوبَةَ، وَتُؤَدِّي الزَّكَاةَ المَفْرُوضَةَ، وَتَصُومُ رَمَضَانَ» قَالَ: وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لاَ أَزِيدُ عَلَى هَذَا، فَلَمَّا وَلَّى قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ سَرَّهُ أَنْ يَنْظُرَ إِلَى رَجُلٍ مِنْ أَهْلِ الجَنَّةِ، فَلْيَنْظُرْ إِلَى هَذَا».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है : एक देहाती अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहा : मुझे कोई ऐसा कर्म बताएँ कि उसे करूँ, तो जन्नत में दाखिल हो जाऊँ। फ़रमाया : "अल्लाह की इबादत करो, किसी को उसका साझी न बनाओ, फ़र्ज़ नमाज़ कायम करो, फ़र्ज़ ज़कात अदा करो और रमज़ान के रोज़े रखो।" उसने कहा : उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा। जब वह वापस हुआ, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो किसी जन्नती व्यक्ति को देखना चाहे, वह इसे देख ले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
देहात का रहने वाला एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया, ताकि आप उसे जन्नत में दाख़िल करने वाला कोई अमल बता दें। अतः आपने उसे बताया कि जन्नत में प्रवेश और जहन्नम से मुक्ति इस्लाम के स्तंभों के अनुपालन पर निर्भर है, जो इस प्रकार हैं : एक अल्लाह की इबादत करना और किसी को उसका साझी न बनाना। पाँच वक़्त की नमाज़ क़ायम करना, जिन्हें अल्लाह ने रात और दिन में अपने बंदों पर फ़र्ज़ किया है। धन की ज़कात, जो अनिवार्य है, निकाल कर हक़दारों को देना। रमज़ान महीने के रोज़े समय पर पाबंदी से रखना। इतना सुनने के बाद उस व्यक्ति ने कहा : उस हस्ती की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं आपसे सुने हुए अनिवार्य कार्यों से न ज़्यादा करूँगा, न कम। अतः जब वह व्यक्ति जाने लगा, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : जिसे कोई जन्नती इन्सान देखना हो, वह इस देहाती व्यक्ति को देख ले।
फ़ायदे
- अल्लाह की ओर बुलाने के काम का आरंभ एक अल्लाह की इबादत से होना चाहिए।
- नए-नए मुसलमान होने वाले इन्सान को पहले केवल अनिवार्य चीज़ें सिखानी चाहिए।
- यह ज़रूरी है कि अल्लाह की ओर बुलाने का कार्य क्रमिक किया जाए।
- इन्सान को अपने दीन की बात सीखने का उत्सुक होना चाहिए।
- केवल अनिवार्य कार्यों के पालन से भी मुस्लिम व्यक्ति सफल हो जाएगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन्सान नफ़ल इबादतों की अदायगी में सुस्ती से काम ले। क्योंकि नफ़ल इबादतों द्वारा फ़र्ज़ इबादतों में रह जाने वाली कमियाँ दूर होती हैं।
- कुछ इबादतों का ही केवल उल्लेख उनका महत्व एवं अनिवार्यता बताता है। इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरी इबादतें अनिवार्य नहीं हैं।
हवाला
صحيح البخاري (2/ 105) (1397).
صحيح مسلم (1/ 44) (14).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (15/ 588).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 349).
نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (2/ 861).
منار القاري، لحمزة قاسم (3/ 5).
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (1/ 82).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى قَالَ: لَقِيَنِي كَعْبُ بْنُ عُجْرَةَ، فَقَالَ: أَلاَ أُهْدِي لَكَ هَدِيَّةً؟ إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَرَجَ عَلَيْنَا، فَقُلْنَا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، قَدْ عَلِمْنَا كَيْفَ نُسَلِّمُ عَلَيْكَ، فَكَيْفَ نُصَلِّي عَلَيْكَ؟ قَالَ: «فَقُولُوا: اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ».
अब्दुर रहमान बिन अबू लैला कहते हैं कि काब बिन उजरा मुझसे मिले और कहने लगे : क्या मैं तुम्हें कोई तोहफ़ा न दूँ? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे पास आए, तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, हम यह तो जान गए हैं कि हम आप पर सलाम कैसे भेजें, लेकिन हम आप पर दरूद कैसे भेजें? तो आपने फ़रमाया : "कहो : «اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ» (ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम को जब पता हो गया कि "अत-तहिय्यात" में "السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته..." कहकर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सलाम भेजा जाएगा, तो आपसे पूछा कि आप पर दरूद कैसे भेजा जाए? जवाब में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको आप पर दरूद भेजने के शब्द बता दिए, जो इस प्रकार हैं : "اللهم صلِّ على محمدٍ وعلى آل محمد" (अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद) यानी ऐ अल्लाह! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके दीन का पालन करने वालों और आपके ईमान वाले रिश्तेदारों की प्रशंसा निकटवर्तीय फ़रिश्तों के सामने फ़रमा। "كما صلَّيتَ على آل إبراهيم" (कमा सल्लैता अला आलि इब्राहीम) जिस प्रकार तु ने इबराहीम अलैहिस्सलाम की आल को सम्मान दिया है, उसी प्रकार मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भी यह सम्मान प्रदान कर। इबराहीम की आल से तात्पर्य; खुद इब्राहीम, तथा इसमाईल, इसहाक़, उनकी संतान-संतति और उनके मोमिन अनुसरणकारी हैं। "إنك حميد مجيد" (इन्नका हमीदुन मजीद) यानी तो अपनी हस्ती, गुणों एवं कार्यों में प्रशंसित तथा बड़ा महान, अधिकार वाला और दानशील है। "اللهم بارك على محمدٍ وعلى آل محمد كما باركتَ على آل إبراهيم" (अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद, कमा बारकता अला आलि इब्राहीम) यानी आपको बड़ी भलाई एवं सम्मान प्रदान कर, उसे बढ़ाता जा और निरंतर रूप से जारी रख।
फ़ायदे
- सलफ़ एक-दूसरे को इल्मी मसायल का भेंट दिया करते थे।
- नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना वाजिब (अनिवार्य) है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा को आपपर दरूद एवं सलाम भेजने की शिक्षा दी है।
- दरूद के ये शब्दावली अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजने के सबसे संपूर्ण शब्दावली हैं।
हवाला
صحيح البخاري (8/ 77) (6357).
صحيح مسلم (1/ 305) (406).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص208).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (2/ 270).
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 170).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي رِفَاعَةَ تَمِيم بن أُسَيدٍ رضي الله عنه قَالَ: انتهيتُ إلى رسولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وهو يَخطبُ، فَقُلتُ: يَا رسولَ اللهِ، رَجُلٌ غَريبٌ جاءَ يَسألُ عن دِينِهِ لا يَدرِي مَا دِينُهُ؟ فَأَقْبلَ عليَّ رسولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وتَرَكَ خُطبتَهُ حتى انتَهى إليَّ، فأُتِيَ بكُرسِيٍّ، فَقَعَدَ عليه، وجَعَلَ يُعَلِّمُنِي ممّا عَلَّمَهُ اللهُ، ثم أتى خُطبتَهُ فَأَتَمَّ آخِرَهَا.
अबू रिफ़ाआ तमीम बिन उसैद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास पहुँचा, तो उस समय आप खुतबा दे रहे थे। मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मैं एक अजनबी आदमी हूँ, जो अपने धर्म के विषय में ज्ञान अर्जित करने आया है। वह नहीं जानता है कि उसका धर्म क्या है। यह सुन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरी ओर मुतवज्जेह हुए और अपना ख़ुतबा छोड़ दिया, यहाँ तक कि मेरे निकट आ गए। चुनांचे एक कुरसी लाई गई और आप उसपर बैठकर मुझे वह बातें सिखाने लगे, जो अल्लाह ने आपको सिखाई हैं। फिर आकर ख़ुतबा दिया और उसके शेष भाग को पूरा किया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي.
رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ.
شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن-الرياض، 1426هـ.
شرح صحيح مسلم؛ للإمام محي الدين النووي، دار الريان للتراث-القاهرة، الطبعة الأولى، 1407هـ.
صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبدالباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضيَ اللهُ عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ تَعَلَّمَ عِلْمًا مِمَّا يُبْتَغَى بِهِ وَجْهُ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ لَا يَتَعَلَّمُهُ إِلَّا لِيُصِيبَ بِهِ عَرَضًا مِنَ الدُّنْيَا لَمْ يَجِدْ عَرْفَ الْجَنَّةِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ» يَعْنِي رِيحَهَا.
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिसने ऐसा ज्ञान प्राप्त किया, जिससे अल्लाह की खुशी प्राप्त की जाती है और वह इसे केवल दुनिया प्राप्त करने के लिए सीखता है, तो वह क़यामत के दिन जन्नत की खुश्बू तक नहीं पाएगा।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن أبي داود (5/ 504) (3664).
سنن ابن ماجه (1/ 169) (252).
مسند أحمد (14/ 169) (8457).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 477).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (16/ 507).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 957).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 447).
عون المعبود شرح سنن أبي داود، العظيم آبادي (10/ 70).
حاشية السندي على سنن ابن ماجه، لمحمد التتوي (1/ 110).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «مَنْ سُئِلَ عن عِلْمٍ فَكَتَمَهُ، أُلْجِمَ يوم القيامةِ بِلِجَامٍ مِنْ نارٍ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिससे किसी ज्ञान से संबंधित कुछ पूछा गया और उसने उसे छिपा लिया, तो उसे क़यामत के दिन आग की लगाम पहनाई जाएगी।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में ज्ञान छुपाने से सख़्त सावधान किया गया है, और यह बताया गया है कि जिस व्यक्ति से धर्म से संबंधित कोई जानकारी माँगी गई, जिसकी पूछने वाले को ज़रूरत हो और पूछे गए व्यक्ति के लिए उसे बयान करना ज़रूरी भी हो, लेकिन इसके बावजूद उसे जानकारी न दे और प्रश्न का उत्तर न दे या फिर लिखकर देने से मना कर दे, तो अल्लाह क़यामत के दिन इसके दंड के तौर पर उसके मुँह में आग की लगाम लगा देगा। दरअसल यह बदला है इस बात का कि उसने दुनिया में अपने मुँह में खामोशी की लगाम लगा ली थी। होता भी यही है कि अल्लाह इन्सान को उसी प्रकार का दंड देता है, जिस प्रकार का उसका कर्म होता है। यहाँ यह याद रहे कि इस हदीस में जो चेतावनी दी गई है उसके दायरे में वह व्यक्ति आता है, जिसे पता हो कि पूछने वाला मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए पूछ रहा है। लेकिन इसके विपरीत यदि वह जानता हो कि पूछने वाला मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि उसके ज्ञान की थाह लेने के लिए पूछ रहा है, तो ऐसे में उसे एख़्तियार है कि चाहे तो जवाब दे और चाहे तो न दे। वह इस हदीस में दी गई चेतावनी के दायरे में नहीं आएगा।
हवाला
- الجامع الصحيح –وهو سنن الترمذي-؛ للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وآخرين، مكتبة الحلبي-مصر، الطبعة الثانية، 1388هـ.
- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ.
- شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
- مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح؛ تأليف ملا علي القاري، تحقيق صدقي العطار، دار الفكر-بيروت، الطبعة الأولى، 1412هـ.
- مشكاة المصابيح؛ تأليف محمد بن عبدالله التبريزي، تحقيق محمد ناصر الدين الألباني، المكتب الإسلامي-بيروت، الطبعة الثانية، 1399هـ.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
- سنن أبي داود, أبو داود سليمان بن الأشعث بن إسحاق بن بشير بن شداد بن عمرو الأزدي السِّجِسْتاني, المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد, المكتبة العصرية، صيدا – بيروت.
- مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م.
- مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م.
- بهجة الناظرين, سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997م.
- سنن ابن ماجه, ابن ماجه أبو عبد الله محمد بن يزيد القزويني، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي, الناشر: دار إحياء الكتب العربية - فيصل عيسى البابي الحلبي.
- مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، أبو الحسن عبيد الله بن محمد الرحماني المباركفوري, الناشر: إدارة البحوث العلمية والدعوة والإفتاء - الجامعة السلفية، بنارس الهند, الطبعة: الثالثة - 1404 هـ، 1984 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ مَسْعُودٍ رضي الله عنه قَالَ: سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «نَضَّرَ اللَّهُ امْرَأً سَمِعَ مِنَّا شَيْئًا فَبَلَّغَهُ كَمَا سَمِعَ، فَرُبَّ مُبَلِّغٍ أَوْعَى مِنْ سَامِعٍ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "अल्लाह उस व्यक्ति को ख़ुश व आबाद रखे, जिसने मुझसे कोई बात सुनी और उसे उसी प्रकार दूसरों तक पहुँचा दिया, जिस प्रकार मुझसे सुनी थी। क्योंकि बहुत बार सुनने वाले से वह व्यक्ति अधिक याद रखता है (या अधिक समझदार होता है) जिस तक बात पहुँचाई गई हो।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसे व्यक्ति को दुनिया में हरे-भरे तथा सुंदर जीवन एवं आख़िरत में जन्नत की शादाबी तथा नेमतों की प्राप्ति की दुआ दी है, जो आपकी हदीस सुने, उसे याद रखे और दूसरों को पहुँचा दे। क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि हदीस नक़ल करने वाले की तुलना में नक़ल करने वाले से प्राप्त करने वाला ही कहीं ज़्यादा याद रखने वाला, समझने वाला और उससे मसायल निकालने की सलाहियत रखने वाला होता है। इस तरह पहला व्यक्ति याद रखने और नक़ल करने का काम बेहतर अंदाज़ में करता है तथा दूसरा समझने तथा मसायल निकालने का काम बेहतर अंदाज़ में करता है।
फ़ायदे
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत को याद करने और उसे लोगों तक पहुँचाने के लिए प्रोत्साहन।
- अह्ल-ए-हदीस तथा हदीस का ज्ञान प्राप्त करने वालों की फ़ज़ीलत तथा प्रतिष्ठा का बयान।
- हदीस को समझने और उससे मसायल निकालने की क्षमता रखने वाले उलेमा की फ़ज़ीलत।
- सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम की फ़ज़ीलत, जिन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस सुनी और उसे हम तक पहुँचाया।
- मुनावी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि हदीस के वर्णनकर्ता के लिए फ़क़ीह होना शर्त नहीं है। उसके लिए शर्त याद रखना है। समझने और ग़ौर व फ़िक्र करने का काम फ़क़ीह का है।
- इब्न-ए-उयैना कहते हैं : हदीस के विद्धार्थी के चेहरे से हमेशा ताज़गी झलकती है।
- मुहद्दिसों के यहाँ याद रखने के दो प्रकार हैं : सीने में सुरक्षित रखना और लिखित रूप से सुरक्षित रखना। दोनों प्रकार से याद रखना इस हदीस में शामिल है।
- लोगों की समझ अलग-अलग हुआ करती है। क्योंकि बहुत-से सुनने वाले से सीखने वाले लोग सुनने वाले से अधिक याद रखने वाले हुआ करते हैं, और बहुत-से फ़िक़्ह की सामग्री अपने पास रखने वाले लोग फ़क़ीह नहीं हुआ करते।
हवाला
سنن الترمذي (4/ 394) (2657).
سنن ابن ماجه (1/ 157) (232).
مسند أحمد (7/ 221) (4157).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 476).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 446).
فيض القدير شرح الجامع الصغير، لعبدالرؤوف المناوي (3/ 206).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (16/ 496).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 956).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com