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तशरीह के साथ हदीसें

तौहीद (एकेश्वरवाद) की फ़ज़ीलतें

11 हदीसें

मेरी क़ब्र को मेला स्थान न बनाना और न अपने घरों को क़ब्रिस्तान बनाना। हाँ, मुझपर दरूद भेजते रहना। क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा सलाम मुझे पहुँच जाएगा।

عن علي بن الحسين: "أنه رأى رجلا يجيء إلى فُرْجَةٍ كانت عند قبر النبي صلى الله عليه وسلم فيدخل فيها فيدعو، فنهاه، وقال: ألا أحدثكم حديثا سمعته من أبي عن جدي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:« لا تتخذوا قبري عيدا، ولا بيوتكم قبورا، وصلوا علي، فإن تسليمكم يبلغني أين كنتم».
अली बिन हुसैन से रिवायत है कि उन्होंने एक व्यक्ति को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की क़ब्र के निकट दीवार के एक छिद्र से अंदर जाकर दुआ करते देखा, तो उसे मना किया और फ़रमायाः क्या मैं तुम्हें वह हदीस न बताऊँ, जो मैंने अपने पिता के वास्ते से अपने दादा से सुनी है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "मेरी क़ब्र को मेला स्थान न बनाना और न अपने घरों को क़ब्रिस्तान बनाना। हाँ, मुझपर दरूद भेजते रहना। क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा सलाम मुझे पहुँच जाएगा।"
इसे इब्ने अबी शैबा ने रिवायत किया है।दर्जाविभिन्न सनदों और शवाहिद के आधार पर सह़ीह़
तशरीह

अली बिन हुसैन हमें बता रहे हैं कि उन्होंने एक व्यक्ति को अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की क़ब्र के पास दुआ करते देखा, तो उसे इससे रोका तथा प्रमाण के तौर पर वह हदीस प्रस्तुत की, जिसमें आपकी कब्र के बार-बार दर्शन करने तथा घरों को अल्लाह की इबादत एवं ज़िक्र से वंचित रखने से मना किया गया है और ऐसे घरों को क़ब्रिस्तान के समान कहा गया है तथा यह बताया गया है कि मुसलमान चाहे जहाँ भी हो, उसका सलाम आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को पहुँच जाता है।

हवाला

كتاب التوحيد، للإمام محمد بن عبد الوهاب، ت: د. دغش العجمي، مكتبة أهل الأثر, الطبعة الخامسة, 1435ه. الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي, ت: محمد بن أحمد سيد, مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424ه. الملخص في شرح كتاب التوحيد، للشيخ صالح الفوزان, دار العاصمة, الطبعة الأولى، 1422ه. مصنف ابن أبي شيبة، تحقيق: كمال يوسف الحوت، نشر: مكتبة الرشد - الرياض، الطبعة: الأولى، 1409ه. تحذير الساجد من اتخاذ القبور مساجد, الألباني, المكتب الإسلامي - الطبعة: الرابعة.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

मुसलमान को जो भी रोग, थकान, दुख, गम, कष्ट और विपत्ति पहुँचती है, यहाँ तक कि एक काँटा भी चुभता है, तो उसके ज़रिए अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देता है।

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ وَعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنهما عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «مَا يُصِيبُ الْمُسْلِمَ مِنْ نَصَبٍ وَلَا وَصَبٍ وَلَا هَمٍّ وَلَا حُزْنٍ وَلَا أَذًى وَلَا غَمٍّ حَتَّى الشَّوْكَةِ يُشَاكُهَا إِلَّا كَفَّرَ اللهُ بِهَا مِنْ خَطَايَاهُ».
अबू सईद ख़ुदरी तथा अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुसलमान को जो भी रोग, थकान, दुख, गम, कष्ट और विपत्ति पहुँचती है, यहाँ तक कि एक काँटा भी चुभता है, तो उसके ज़रिए अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि मुसलमान को जो भी बीमारियाँ, ग़म, दुःख, परेशानियाँ, मुसीबतें, कठिनाइयाँ, भय और आर्थिक विपत्तियाँ आती हैं, यहाँ तक कि उसे एक काँटा भी चुभता है, जो उसके लिए कष्टकारक होता है, तो यह सारी चीज़ें उसके लिए गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) बन जाती हैं।

फ़ायदे
  1. बंदों पर अल्लाह का अनुग्रह एवं दया कि उनको होने वाले छोटे-छोटे कष्ट के कारण उनके गुनाहों को माफ़ कर देता है।
  2. मुसलमान को मुसीबतों को अल्लाह के यहाँ मिलने वाले प्रतिफल का साधन समझना और हर छोटी-बड़ी मुसीबत पर सब्र करना चाहिए, ताकि उसके दर्जे (श्रेणी) ऊँचे हों और उसके गुनाह मिटा दिए जाएँ।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 114) (5641). صحيح مسلم (4/ 1992) (2572). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 489). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 242). شرح النووي على مسلم (16/ 126). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص44). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 96). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخِن وغيره (1/ 70).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद मेरे पास उसका एक दीनार भी शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचा रखूँ। बाक़ी पूरा का पूरा अल्लाह के बंदों के बीच इस तरह, इस तरह और इस तरह बाँट दूँ।

عن أبي ذر رضي الله عنه قال: كنت أمشي مع النبي صلى الله عليه وسلم في حَرَّةٍ بالمدينة، فاستقبلنا أُحُدٌ، فقال: «يا أبا ذر» قلت: لبيك يا رسول الله. فقال: «ما يَسُرُّنِي أن عندي مثل أُحُدٍ هذا ذهبًا تمضي علي ثلاثة أيام وعندي منه دينارٌ، إلا شيء أرصده لِدَيْنٍ، إلا أن أقولَ به في عباد الله هكذا وهكذا وهكذا» عن يمينه وعن شماله ومن خلفه، ثم سار، فقال: «إن الأكثرين هم الأَقَلُّونَ يوم القيامة إلا من قال بالمال هكذا وهكذا وهكذا» عن يمينه وعن شماله ومن خَلفه «وقليل ماهم». ثم قال لي: «مكانك لا تَبْرح حتى آتيك» ثم انطلق في سوادِ الليل حتى تَوارى، فسمعت صوتًا، قد ارتفع، فَتَخَوَّفْتُ أن يكون أحدٌ عَرض للنبي صلى الله عليه وسلم فأردت أن آتيه فذكرت قوله: «لا تَبْرَحْ حتى آتيك» فلم أبْرَحْ حتى أتاني، فقلت: لقد سمعت صوتًا تَخَوَّفْتُ منه، فذكرت له، فقال: «وهل سمعته؟» قلت: نعم، قال: «ذاك جبريل أتاني فقال: من مات من أُمتك لا يُشرك بالله شيئًا دخل الجنة»، قلت: وإن زنى وإن سرق؟ قال: «وإن زنى وإن سرق».
अबू ज़र- रज़ियल्लाहु अंहु- कहते हैं कि मैं अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ मदीना के हर्रा (काले पत्थर वाली भूमि) में चल रहा था कि हमारे सामने उहुद पर्वत आ गया। आपने कहाः ऐ अबू ज़र! मैंने कहाः मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह के रसूल! फ़रमायाः मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद मेरे पास उसका एक दीनार भी शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचा रखूँ। बाक़ी पूरा का पूरा अल्लाह के बंदों के बीच इस तरह, इस तरह और इस तरह बाँट दूँ। यह कहते समय आपने दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर इशारा किया। फिर मुझसे कहाः आज अधिक धन-संपत्ति वाले क़यामत के दिन कम से कम सत्कर्म वाले होंगे, सिवाय उसके जिसने ऐसे, ऐसे और ऐसे ख़र्च किया। यह कहते समय भी आपने दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर इशारा किया। हाँ, मगर ऐसे लोग बहुत कम होंगे। फिर मुझसे कहाः मेरे आने तक तुम यहीं रुके रहो। फिर रात के अंधेरे में चल दिए, यहाँ तक कि छिप गए। इसी बीच मैंने एक तेज़ आवाज़ सुनी और डर महसूस किया कि किसी ने अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से छेड़छाड़ न की हो। मैंने आपके पास जाने का इरादा भी कर लिया, लेकिन आपकी यह बात याद आ गई कि मेरे आने तक यहीं रुके रहना, अतः, वहीं रुका रहा। आप आए तो मैंने कहा कि मैंने एक आवाज़ सुनी और डर महसूस किया तथा आगे की पूरी बात सुनाई तो पूछा: क्या तुमने सचमुच वह आवाज़ सुनी है? मैंने कहाः जी हाँ! तो फ़रमायाः दरअस्ल, मेरे पास जिबरील आए थे। उन्होंने कहाः आपकी उम्मत का जो व्यक्ति इस अवस्था में मर जाए कि किसी को अल्लाह का साझी न बनाता हो, वह जन्नत में जाएगा। मैंने कहाः चाहे वह व्यभिचार और चोरी में लिप्त हो? फ़रमायाः हाँ, चाहे वह व्यभिचार और चोरी में लिप्त हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

हदीस का अर्थ : अबूज़र -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ मदीने के हर्रा यानी काले पत्थरों वाली भूमि में चल रहे थे कि प्रख्यात उहुद पर्वत सामने आ गया। उसे देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मुझे इस बात से खुशी नहीं होगी कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद उसका कोई भी भाग, यहाँ तक कि एक दीनार भी मेरे पास शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचाकर रखूँ। यानी यदि मेरे पास उहुद पर्वत के बराबर भी शुद्ध सोना आ जाए, तो मैं उसे पूरा का पूरा अल्लाह के मार्ग में खर्च कर दूँगा और उसका केवल उतना भाग बचाकर रखूँगा, जिसकी ज़रूरत अधिकारों की अदायगी और क़र्ज़ चुकाने के लिए हो। मुझे इस बात से ख़ुशी नहीं होगी कि तीन दिन के बाद इससे अधिक एक दीनार भी मेरे पास शेष रहे। यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मानव समाज में दुनिया के मोह से सबसे अधिक विरक्त व्यक्ति थे। क्योंकि आपको उससे अधिक धन अपने पास बचाए रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जितना क़र्ज़ की अदायगी के लिए पर्याप्त होता। जब आपकी मृत्यु हुई, तो आपका कवच थोड़े-से जौ के बदले में एक यहूदी के पास रखा हुआ था, जिसे आपने अपने परिवार के लिए लिया था। यदि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह को दुनिया प्रिय होती, तो वह अपने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उससे वंचित न रखता। सच्चाई यह है कि दुनिया धिक्कारयोग्य है और उसकी सारी चीज़ें धिक्कारयोग्य हैं, सिवाय अल्लाह के ज़िक्र, उससे संबंधित चीज़ों, धर्म का ज्ञान रखने वाले और उसे अर्जन करने वाले और अल्लाह की इबादत के कार्यों के। फिर आपने फ़रमाया : "आज अधिक धन-संपत्ति वाले क़यामत के दिन कम से कम सत्कर्म वाले होंगे" क्योंकि आम तौर पर जिसके पास दुनिया में धन अधिक होता है, वह अभिमान का शिकार हो जाता है और अल्लाह की इबादत से विचलित हो जाता है। क्योंकि दुनिया उसे ग़फ़लत में डाल देती है और फलस्वरूप वह दुनिया में अधिक ध्यान देने लगता है और आख़िरत से ध्यान कम कर लेता है। "सिवाय उसके जिसने ऐसे, ऐसे और ऐसे धन खर्च किया" यानी सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के मार्ग में धन खर्च किया। उसके बाद फ़रमाया : "मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं।" यानी अल्लाह के मार्ग में धन खर्च करने वालों की संख्या बहुत कम है। फिर फ़रमाया : "जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि उसने किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा। चाहे उसने व्यभिचार एवं चोरी ही क्यों न की हो।" इसका मतलब यह नहीं है कि व्यभिचार एवं चोरी छोटे गुनाह हैं, बल्कि दोनों तो बड़े गुनाह हैं ही। यही कारण है कि अबूज़र -रज़ियल्लाहु अनहु- ने इसपर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि उसने व्यभिचार एवं चोरी की हो, तब भी जन्नत में प्रवेश करेगा? तो आपने उत्तर दिया कि हाँ, व्यभिचार एवं चोरी की हो, तब भी। इसका कारण यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु ईमान की अवस्था में हुई और उसने बड़े गुनाह भी किए हों, तो अल्लाह कहता है : "निःसंदेह अल्लाह यह नहीं क्षमा करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और उसके सिवा जिसे चाहे, क्षमा कर देगा।" अतः अल्लाह उसे क्षमा भी कर सकता है और सज़ा भी दे सकता है। लेकिन यदि सज़ा देता भी है, तब भी उसे अंत में जन्नत जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। क्योंकि अल्लाह का साझी न बनाने वाले और इनसान को काफ़िर घोषित करने वाला कोई कार्य न करने वाले हर बंदे को अंततः जन्नत जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। लेकिन जिसने काफ़िर घोषित करने वाला कोई कार्य किया और उसी पर मर गया, उसे हमेशा जहन्नम में रहना पड़ेगा और उसके सारे सत्कर्म नष्ट हो जाएँगे। क्योंकि मुनाफ़िक़ लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा करते थे कि {हम गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं} और थोड़े ही सही लेकिन अल्लाह को याद भी करते थे। इसी तरह सुस्ती के साथ ही सही, लेकिन नमाज़ भी पढ़ते थे। लेकिन इसके बावजूद वे जहन्नम की सबसे निचली श्रेणी में होंगे। इस हदीस से मालूम हुआ कि इनसान को दुनिया के मोह में नहीं पड़ना चाहिए। दुनिया इनसान के दिल में नहीं बल्कि हाथ में होनी चाहिए। दिल से केवल सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की ओर मुतवज्जेह रहना चाहिए। यही दुनिया के मोह से मुक्ति का असल अर्थ है। इसका अर्थ हरगिज़ यह नहीं है कि तुम दुनिया का कोई भी भाग धारण न करो। बल्कि इसका अर्थ यह है कि उसकी हलाल चीज़ों को लो और उसमें से अपना हिस्सा लेना हरगिज़ न भूलो। लेकिन उसे अपने दिल में नहीं, बल्कि अपने हाथ में रखो। इस महत्वूर्ण बिंदु को ध्यान में रखना चाहिए।

हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه . - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. - صحيح البخاري ؛ عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى1430ه - المنهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج /أبو زكريا محيي الدين يحيى بن شرف النووي، دار إحياء التراث العربي – بيروت الطبعة: الثانية، 1392 - منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري تأليف- حمزة محمد قاسم مكتبة دار البيان، دمشق - الجمهورية العربية السورية، مكتبة المؤيد، الطائف - المملكة العربية السعودية 1410 هـ - 1990 م - فتح الباري شرح صحيح البخاري- أحمد بن علي بن حجر العسقلاني الشافعي- دار المعرفة - بيروت، رقم كتبه وأبوابه وأحاديثه: محمد فؤاد عبد الباقي- قام بإخراجه وصححه وأشرف على طبعه: محب الدين الخطيب- عليه تعليقات العلامة: عبد العزيز بن عبد الله بن باز.

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जिस बंदे ने सच्चे दिल से यह गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं, अल्लाह उसे जहन्नम पर हराम कर देगा

عن أنس بن مالك رضي الله عنه: أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَمُعَاذٌ رَدِيفُهُ عَلَى الرَّحْلِ قَالَ: «يَا مُعَاذُ بْنَ جَبَلٍ»، قَالَ: لَبَّيْكَ يَا رَسُولَ اللهِ وَسَعْدَيْكَ، قَالَ: «يَا مُعَاذُ»، قَالَ: لَبَّيْكَ يَا رَسُولَ اللهِ وَسَعْدَيْكَ، ثَلَاثًا، قَالَ: «مَا مِنْ أَحَدٍ يَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ صِدْقًا مِنْ قَلْبِهِ إِلَّا حَرَّمَهُ اللهُ عَلَى النَّارِ»، قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، أَفَلَا أُخْبِرُ بِهِ النَّاسَ فَيَسْتَبْشِرُوا؟ قَالَ: «إِذًا يَتَّكِلُوا». وَأَخْبَرَ بِهَا مُعَاذٌ عِنْدَ مَوْتِهِ تَأَثُّمًا.
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने, जबकि मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु सवारी पर आपके पीछे बैठे थे, फ़रमाया : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैंं उपस्थित हूँ। आपने फिर कहा : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" उन्होंने दोबारा कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मैं उपस्थि हूँ! आपने फिर कहा : "ऐ मुआज़ बिन जबल!" तो उन्होंने तीसरी बार कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मैं उपस्थित हूँ! तीसरी बार के बाद आपने फ़रमाया : "जिस बंदे ने सच्चे दिल से यह गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं, अल्लाह उसे जहन्नम पर हराम कर देगा।" उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को आपकी यह बात बता न दूँ कि वे ख़ुश हो जाएँ? आपने फ़रमाया : "तब तो वे इसी पर भरोसा कर बैठेंगे।" चुनांचे मृत्यु के समय मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने गुनाह के भय से यह हदीस लोगों को बता दी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अनहु अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे सवारी पर बैठे हुए थे कि आपने उनका नाम लेकर तीन बार कहा : ऐ मुआज़! आपके तीन बार संबोधित करने का उद्देश्य आगे कही जाने वाली बात के महत्व को दर्शाना था। हर बार मुआज़ रज़ियल्लाह अनहु ने उत्तर में कहा : "لبيك يا رسول الله وسعديك" ऐ अल्लाह के रसूल! मैं आपकी हर आवाज़ पर खड़ा हूँ और इसे अपने लिए गौरव समझता हूँ। चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको बताया कि जिस व्यक्ति ने सच्चे दिल से इस बात की गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुमहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं तथा इसी हालत में मर गया, तो अल्लाह जहन्नम पर उसे हराम कर देगा। यह सुन मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने आपसे इस बात की अनुमति माँगी कि लोगों को यह बता दें, ताकि लोग खुश हो जाएँ। लेकिन आपको इस बात का भय हुआ कि कहीं लोग इसपर भरोसा न कर बैठें और अमल के क्षेत्र में सुस्त न पड़ जाएँ। इस लिए मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने यह हदीस किसी को नहीं सुनाई। परन्तु, मौत से पहले सुना गए, ताकि ज्ञान छुपाने के गुनाह का शिकार न होना पड़े।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सादा रहन-सहन कि मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु को अपने पीछे सवारी पर बिठा लिया।
  2. यहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शिक्षा देने का एक तरीक़ा सामने आता है कि आपने मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अनहु को एक से अधिक बार पुकारा, ताकि वह आपकी कही हुई बात को बड़े ध्यान से सुनें।
  3. अल्लाह के सिवा किसी के सच्चा पूज्य न होने तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अल्लाह के रसूल के गवाही देने की एक शर्त यह है कि गवाही देने वाला सच्चे दिल से गवाही दे रहा हो। वह न तो झूठा हो और न संदेह रखता हो।
  4. अल्लाह के एक होने की गवाही देने वाले लोग जहन्नम में हमेशा नहीं रह सकते। अपने गुनाहों के सबब जहन्नम चले भी गए, तो पाक होने के बाद निकाल लिए जाएँगे।
  5. सच्चे दिल से अल्लाह के एकमात्र पूज्य होने तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने की गवाही देने की फ़ज़ीलत।
  6. कुछ परिस्थितियों में कुछ हदीसों को बयान न करना भी जायज़ है, जब उनके बयान करने से किसी नुक़सान का डर हो।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 37) (128). صحيح مسلم (1/ 61) (32). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين (1/ 377). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 487). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (6/ 496).

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क्या तुम इस बात की गवाही नहीं देते कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं?

عَنْ أَنَسٍ رضي الله عنه قَالَ: جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا تَرَكْتُ حَاجَّةً وَلَا دَاجَّةً إِلَّا قَدْ أَتَيْتُ، قَالَ: «أَلَيْسَ تَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ؟» ثَلَاثَ مَرَّاتٍ. قَالَ: نَعَمْ، قَالَ: «فَإِنَّ ذَلِكَ يَأْتِي عَلَى ذَلِكَ».
अनस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने हर छोटा-बड़ा गुनाह कर डाला है। आपने पूछा : "क्या तुम इस बात की गवाही नहीं देते कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं?" आपने इस प्रश्न को तीन बार दोहराया। उसने जवाब दिया : अवश्य देता हूँ। आपने कहा : "यह उसे मिटा देगा।"
इसे अबू यअ़ला, त़बरानी और ज़िया अल-मक़दिसी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहने लगा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने हर तरह के गुनाह किए हैं और कोई छोटा-बड़ा गुनाह नहीं छोड़ा है। ऐसे में क्या मुझे क्षमा प्राप्त हो सकती है? यह सुन आपने उससे पूछा कि क्या तुम इस बात की गवाही नहीं देते कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं?: आपने अपने इस प्रश्न को तीन बार दोहराया। चुनांचे उसने उत्तर दिया कि अवश्य ही मैं इसकी गवाही देता हूँ। उत्तर सुनने के बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको दोनों गवाहियों की फ़ज़ीलत बताई और यह स्पष्ट कर दिया कि इससे गुनाह मिटा दिए जाते हैं और तौबा पहले किए हुए सारे गुनाहों को ख़त्म कर देती है।

फ़ायदे
  1. दोनों गवाहियों का महत्व तथा यह कि सच्चे दिल से गवाही देने पर इन्सान के गुनाह ख़त्म हो जाते हैं।
  2. इस्लाम ग्रहण करने के बाद पहले किए हुए गुनाह मिट जाते हैं।
  3. सच्ची तौबा पहले किए हुए गुनाहों को मिटा देती है।
  4. शिक्षा देते समय बात को दोहराना अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा है।
  5. दोनों गवाहियों की फ़ज़ीलत तथा यह कि दोनों गवाहियाँ जहन्नम में हमेशा रहने से मुक्ति प्रदान करती हैं।
हवाला

مسند أبي يعلى الموصلي (6/ 155) (3433)، المعجم الصغير للطبراني (2/ 201) (1025)، شعب الإيمان (5/404) (7086)، الأحاديث المختارة للضياء المقدسي (5/ 151) (1773)، غريب الحديث للخطابي (1/255)، الترغيب والترهيب (4/55)، النهاية في غريب الحديث والأثر (1/341)، الزواجر لابن حجر الهيتمي (2/961)، جامع العلوم والحكم (1/305).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न ठहराता हो

عَنْ مُعَاذٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: كُنْتُ رِدْفَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَى حِمَارٍ يُقَالُ لَهُ عُفَيْرٌ، فَقَالَ: «يَا مُعَاذُ، هَلْ تَدْرِي حَقَّ اللَّهِ عَلَى عِبَادِهِ، وَمَا حَقُّ العِبَادِ عَلَى اللَّهِ؟»، قُلْتُ: اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ، قَالَ: «فَإِنَّ حَقَّ اللَّهِ عَلَى العِبَادِ أَنْ يَعْبُدُوهُ وَلا يُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا، وَحَقَّ العِبَادِ عَلَى اللَّهِ أَنْ لا يُعَذِّبَ مَنْ لا يُشْرِكُ بِهِ شَيْئًا»، فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ أَفَلاَ أُبَشِّرُ بِهِ النَّاسَ؟ قَالَ: «لا تُبَشِّرْهُمْ، فَيَتَّكِلُوا».
मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे एक गधे पर बैठा हुआ था, जिसका नाम उफ़ैर था। इसी दौरान आपने कहा : "ऐ मुआज़! क्या तुम जानते हो कि बंदों पर अल्लाह का अधिकार क्या है और अल्लाह पर बंदों का अधिकार क्या है?" मैंने कहा : अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते हैं। आपने कहा : "बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न ठहराता हो।" मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को यह सुसमाचार सुना न दूँ? आपने उत्तर दिया : "यह सुसमाचार लोगों को न सुनाओ, वरना लोग भरोसा करके बैठ जाएँगे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदों पर अल्लाह का क्या अधिकार है और अल्लाह पर बंदों का क्या अधिकार है। आपने बताया कि बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे अकेले उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह ऐसे एकेश्वरवादी लोगों को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न बनाते हों। यह सुन मुआज़ रज़ियल्लाह अनहु ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैं लोगों को यह सुसमाचार सुना न दूँ, ताकि वे अल्लाह के इस अनुग्रह पर खुश हो जाएँ? चुनांचे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस भय के देखते हुए उनको ऐसा करने से मना कर दिया कि कहीं लोग इसी पर भरोसा करके बैठ न जाएँ।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के उस अधिकार का बयान, जिसे उसने अपने बंदों पर वाजिब किया। वह अधिकार यह है कि बंदे केवल उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ।
  2. अल्लाह पर बंदों के उस अधिकार का बयान, जिसे अल्लाह ने अपने अनुग्रह से अपने ऊपर वाजिब कर रखा है। वह अधिकार यह है कि अल्लाह ऐसे बंदों को जन्नत प्रदान करे तथा यातना का सामना करने न दे, जो किसी को उसका साझी न बनाते हों।
  3. इस हदीस में ऐसे एकेश्वरवादी लोगों के लिए बहुत बड़ा सुसमाचार है, जो किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाते। सुसमाचार यह है कि अल्लाह ऐसे लोगों को जन्नत प्रदान करेगा।
  4. मुआज़ रज़ियल्लाहु अनहु ने मृत्यु से पहले इस भय से यह हदीस बता दी कि कहीं ज्ञान छुपाने का गुनाह न उठाना पड़े।
  5. यह निर्देश कि कुछ हदीसों को कुछ ऐसे लोगों को बताना नहीं चाहिए, जिनके बारे में इस बात का डर हो कि वह उसका मतलब समझ नहीं पाएँगे। लेकिन यह बात उन हदीसों पर लागू होगी, जिनके अंदर किसी अमल या किसी शरई दंड का ज़िक्र न हो।
  6. अवज्ञाकारी एकेश्वरवादी लोग अल्लाह की इच्छा के अधीन होंगे। वह चाहे तो उनको यातना दे और चाहे तो माफ़ कर दे और फिर उनका ठिकाना जन्नत हो।
हवाला

صحيح البخاري (4/ 29) (2856)، صحيح مسلم (1/ 58) (30)، المحكم لابن سيده (10/26)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 203)، فتح الباري (11/340، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (1/ 623)، (1/ 627)، عمدة القاري شرح صحيح البخاري (14/ 148).

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जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।

عَنْ جَابِرٍ رضي الله عنه قَالَ: أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رَجُلٌ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْمُوجِبَتَانِ؟ فَقَالَ: «مَنْ مَاتَ لَا يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ الْجَنَّةَ، وَمَنْ مَاتَ يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ النَّارَ»
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! दो वाजिब करने वाली चीज़ें क्या हैं? आपने उत्तर दिया : "जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

एक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दो ऐसी बातों के बारे में पूछा, जो जन्नत में प्रवेश या जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करती हैं। आपने उत्तर दिया कि जन्नत अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि केवल एक अल्लाह की इबादत करता हो और किसी को उसका साझी न बनाता हो। जबकि जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि किसी को पूज्य बनाकर, पालनहार समझकर या उसे अल्लाह के नाम तथा विशेषताएँ प्रदान करके उसका साझी बनाता हो।

फ़ायदे
  1. तौहीद (एकेश्वरवाद) की फ़ज़ीलत और इस बात का स्पष्ट उल्लेख कि जो व्यक्ति ईमान की हालत में इस तरह मरेगा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाएगा, वह जन्नत में प्रवेश केरगा।
  2. शिर्क की भयावहता तथा इस बात का स्पष्ट उल्लेख कि जो व्यक्ति किसी को अल्लाह का साझी बनाते हुए मरेगा, वह जहन्नम में जाएगा।
  3. अवज्ञाकारी एकेश्वरवादी लोग अल्लाह की इच्छा के अधीन होंगे। अल्लाह अगर चाहेगा, तो उनको अज़ाब देगा और अगर चाहेगा, तो उनको माफ़ कर देगा और फिर उनका ठिकाना जन्नत होगा।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 94) (93)، إكمال المعلم بفوائد مسلم (1/ 363)، شرح النووي على مسلم (2/96) المفهم للقرطبي (1/290)، تطريز رياض الصالحين (ص 281)، الكوكب الوهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج (3/63).

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अमल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। रही बात छह आमाल की, तो उनमें से दो प्रकार के अमल वाजिब करने वाले हैं, दो प्रकार के अमल बराबर-बराबर हैं, एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब दस गुना मिलता है और एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब सात सौ गुना मिलता है

عَنْ خُرَيْمِ بْنِ فَاتِكٍ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الْأَعْمَالُ سِتَّةٌ، وَالنَّاسُ أَرْبَعَةٌ، فَمُوجِبَتَانِ، وَمِثْلٌ بِمِثْلٍ، وَحَسَنَةٌ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا، وَحَسَنَةٌ بِسَبْعِ مِائَةٍ، فَأَمَّا الْمُوجِبَتَانِ: فَمَنْ مَاتَ لَا يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ الْجَنَّةَ، وَمَنْ مَاتَ يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ النَّارَ، وَأَمَّا مِثْلٌ بِمِثْلٍ: فَمَنْ هَمَّ بِحَسَنَةٍ حَتَّى يَشْعُرَهَا قَلْبُهُ، وَيَعْلَمَهَا اللهُ مِنْهُ كُتِبَتْ لَهُ حَسَنَةً، وَمَنْ عَمِلَ سَيِّئَةً، كُتِبَتْ عَلَيْهِ سَيِّئَةً، وَمَنْ عَمِلَ حَسَنَةً فَبِعَشْرِ أَمْثَالِهَا، وَمَنْ أَنْفَقَ نَفَقَةً فِي سَبِيلِ اللهِ فَحَسَنَةٌ بِسَبْعِ مِائَةٍ، وَأَمَّا النَّاسُ، فَمُوَسَّعٌ عَلَيْهِ فِي الدُّنْيَا مَقْتُورٌ عَلَيْهِ فِي الْآخِرَةِ، وَمَقْتُورٌ عَلَيْهِ فِي الدُّنْيَا مُوَسَّعٌ عَلَيْهِ فِي الْآخِرَةِ، وَمَقْتُورٌ عَلَيْهِ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ، وَمُوَسَّعٌ عَلَيْهِ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ».
ख़ुरैम बिन फ़ातिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अमल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। रही बात छह आमाल की, तो उनमें से दो प्रकार के अमल वाजिब करने वाले हैं, दो प्रकार के अमल बराबर-बराबर हैं, एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब दस गुना मिलता है और एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब सात सौ गुना मिलता है। जहाँ तक दो वाजिब करने वाले अमल की बात है, तो जो व्यक्ति इस अवस्था में दुनिया से मृत्यु को प्राप्त हुआ कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराया, वह जन्नत में जाएगा और जो इस अवस्था में दुनिया से मृत्यु पाया कि किसी को अल्लाह का साझी ठहराया, वह जहन्नम में जाएगा। जहाँ तक बराबर-बराबर वाले दो अमल की बात है, तो ध्यान में रहे कि जिसने किसी नेकी के काम की इस तरह नीयत कर ली कि उसके दिल ने उसे महसूस किया और अल्लाह ने उसकी नीयत को जाना, तो उसके लिए एक नेकी लिखी जाएगी। इसी तरह जिसने कोई बुरा काम किया, उसके लिए एक गुनाह लिखा जाएगा। पाँचवें प्रकार का अमल यह है कि जिसने कोई नेकी का काम कर लिया, उसे उस नेकी के काम का सवाब दस गुना दिया जाएगा। और छठे प्रकार का अमल यह है कि जिसने अल्लाह के रास्ते में कोई चीज़ खर्च की, उसे इस एक अच्छे काम का सवाब सात सौ गुना मिलेगा। जहाँ तक चार प्रकार के लोगों की बात है, तो कुछ लोग दुनिया में खुशहाल हैं और आख़िरत में कंगाल होंगे, कुछ लोग दुनिया में कंगाल हैं और आख़िरत में खुशहाल होंगे, कुछ लोग दुनिया में भी कंगाल हैं और आख़िरत में भी कंगाल होंगे, जबकि कुछ लोग दुनिया में भी खुशहाल हैं और आख़िरत में भी खुशहाल होंगे।
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि आमाल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। छह प्रकार के आमाल इस प्रकार हैं : 1- जो व्यक्ति इस अवस्था में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराया, उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाएगी। 2- जो व्यक्ति इस हालत में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी ठहराया, उसपर जहन्नम वाजिब हो जाएगी और वह उसके अंदर हमेशा रहेगा। यही दोनों अमल वाजिब करने वाले हैं। 3- ऐसा नेकी का काम जिसका इरादा किया गया हो। जिसने कोई नेकी का काम करने की इच्छा मात्र किया और उसका इरादा सच्चा था कि उसे अपने दिल में महसूस किया और अल्लाह ने भी उसकी नीयत को जाना, फिर किसी कारणवश उस नेकी के काम को वह कर न सका, तो उसके लिए एक पूरी नेकी लिखी जाती है। 4- किया हुआ गुनाह का काम। जिसने कोई बुरा काम किया, उसके लिए एक गुनाह लिखा जाता है। यह दोनों ऐसे अमल हैं, जिनका प्रतिफल काम के बराबर ही मिलता है। 5- नेकी का ऐसा काम, जिसका सवाब उस काम का दस गुनाह मिलता है। जिसने किसी नेकी के काम का इरादा किया और उसे कर भी डाला, उसके लिए दस नेकियाँ लिखी जाती हैं। 6- नेकी का ऐसा काम, जिसका सवाब सात सौ गुना मिलता है। जिसने अल्लाह के मार्ग में कोई चीज़ खर्च की, तो उसके लिए नेकी का यह काम सात सौ गुना लिखा जाता है। यह दरअसल बंदों पर अल्लाह का अनुग्रह एवं कृपा है। जबकि चार प्रकार के लोग इस तरह हैं : 1- दुनिया में खुशहाल तथा सुखी-संपन्न एवं आख़िरत में कंगाल लोग, जो जहन्नम में जाएँगे। इनसे मुराद मालदार अविश्वासी लोग हैं। 2- दुनिया में कंगाल लेकिन आख़िरत में खुशहाल तथा जन्नत में जाने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले लोग। इनसे मुराद निर्धन मोमिन हैं। 3- दुनिया तथा आख़िरत दोनों स्थानों में कंगाल लोग। इनसे मुराद निर्धन अविश्वासी हैं। 4- दुनिया तथा आख़िरत दोनों जगहों में खुशहाल लोग। इनसे मुराद धनवान् मोमिन हैं।

फ़ायदे
  1. बंदों पर अल्लाह का बहुत बड़ा अनुग्रह तथा उसका बंदों की नेकियों को बढ़ाकर लिखना।
  2. अल्लाह का न्याय तथा उसकी दया कि वह गुनाह का बदला न्याय के अनुरूप देता है। यानी एक बुरे काम का बदला एक गुनाह।
  3. शिर्क की भयावहता, क्योंकि इसकी बिना पर बंदा जन्नत से वंचित हो जाता है।
  4. अल्लाह के मार्ग में खर्च करने की फ़ज़ीलत का बयान।
  5. अल्लाह के मार्ग में खर्च करने के सवाब में बढ़ोतरी सात सौ गुना से शुरू होती है। क्योंकि इससे अल्लाह के दीन के पताका को ऊँचा करने में मदद मिलती है।
  6. इस हदीस में लोगों के अलग-अलग प्रकार बयान किए गए हैं।
  7. दुनिया में खुशहाली मोमिन तथा ग़ैर-मोमिन सब को प्राप्त होती है, जबकि आख़िरत की खुशहाली केवल मोमिन को प्राप्त होती है।
हवाला

مسند أحمد (31/ 196) (18900)، (31/ 384)، الفتح الرباني لترتيب مسند أحمد بن حنبل الشيباني (19/198).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
11 में से 8
11 हदीसें
  1. मेरी क़ब्र को मेला स्थान न बनाना और न अपने घरों को क़ब्रिस्तान बनाना। हाँ, मुझपर दरूद भेजते रहना। क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा सलाम मुझे पहुँच जाएगा।
  2. मुसलमान को जो भी रोग, थकान, दुख, गम, कष्ट और विपत्ति पहुँचती है, यहाँ तक कि एक काँटा भी चुभता है, तो उसके ज़रिए अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देता है।
  3. मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद मेरे पास उसका एक दीनार भी शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचा रखूँ। बाक़ी पूरा का पूरा अल्लाह के बंदों के बीच इस तरह, इस तरह और इस तरह बाँट दूँ।
  4. जिस बंदे ने सच्चे दिल से यह गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं, अल्लाह उसे जहन्नम पर हराम कर देगा
  5. क्या तुम इस बात की गवाही नहीं देते कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं?
  6. बंदों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि बंदे उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। जबकि अल्लाह पर बंदों का अधिकार यह है कि अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति को अज़ाब न दे, जो किसी को उसका साझी न ठहराता हो
  7. जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।
  8. अमल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। रही बात छह आमाल की, तो उनमें से दो प्रकार के अमल वाजिब करने वाले हैं, दो प्रकार के अमल बराबर-बराबर हैं, एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब दस गुना मिलता है और एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब सात सौ गुना मिलता है
  9. अल्लाह क़यामत के दिन मेरी उम्मत से एक व्यक्ति को चुनकर सारी सृष्टियों के सामने उपस्थित करेगा
  10. आप ला इलाहा इल्लल्लाह कह दें, मैं क़यामत के दिन आपके लिए इसकी गवाही दूँगा
  11. जो अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी न बनाया होगा, उसे कोई पाप हानि नहीं पहुँचाएगा, और जो उससे इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी ठहराया होगा, तो कोई नेकी उसे लाभ नहीं पहुँचाएगी।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com