عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «انْصُرْ أَخَاكَ ظَالِمًا أَوْ مَظْلُومًا». فَقَالَ رَجُلٌ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، أَنْصُرُهُ إِذَا كَانَ مَظْلُومًا، أَفَرَأَيْتَ إِذَا كَانَ ظَالِمًا كَيْفَ أَنْصُرُهُ؟ قَالَ: « تَحْجُزُهُ -أَوْ تَمْنَعُهُ- مِنَ الظُّلْمِ؛ فَإِنَّ ذَلِكَ نَصْرُهُ».
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपने भाई की मदद करो, वह ज़ालिम हो या मज़लूम। एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! जब वह मज़लूम हो तो उसकी मदद करूँगा। परन्तु, जब वह ज़ालिम हो तो उसकी मदद भला कैसे करूँ? फ़रमायाः उसे अत्याचार से रोको। यही उसकी मदद है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري (3/ 128) (2443). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 589). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 326).