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तशरीह के साथ हदीसें

बाल-बच्चों आदि का खर्च

11 हदीसें

तुम उसके धन में से उतना लो, जो साधारणतः तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए काफ़ी हो।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المؤْمنينَ رَضيَ اللهُ عنها قَالَت: دَخَلَتْ هِنْدٌ بِنْتُ عُتْبَةَ امْرَأَةُ أَبِي سُفْيَانَ عَلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنَّ أَبَا سُفْيَانَ رَجُلٌ شَحِيحٌ، لَا يُعْطِينِي مِنَ النَّفَقَةِ مَا يَكْفِينِي وَيَكْفِي بَنِيَّ إِلَّا مَا أَخَذْتُ مِنْ مَالِهِ بِغَيْرِ عِلْمِهِ، فَهَلْ عَلَيَّ فِي ذَلِكَ مِنْ جُنَاحٍ؟ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «خُذِي مِنْ مَالِهِ بِالْمَعْرُوفِ مَا يَكْفِيكِ وَيَكْفِي بَنِيكِ».
मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : अबू सुफ़यान की पत्नी हिंद बिन्त उतबा अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आईं और कहने लगीं : ऐ अल्लाह के रसूल! अबू सुफ़यान एक कंजूस व्यक्ति हैं। वह मुझे इतना खर्च नहीं देते, जो मेरे तथा मेरे बच्चों के लिए काफ़ी हो। अतः, मैं उन्हें बताए बिना उनके धन में से कुछ ले लेती हूँ। क्या इससे मुझे कोई गुनाह होगा? अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तुम उसके धन में से उतना लो, जो साधारणतः तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए काफ़ी हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

हिंद बिंत उतबा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपने पति अबू सुफ़यान रज़ियल्लाहु अनहु के बारे में फ़तवा पूछा। उन्होंने बताया कि अबू सुफ़यान एक कंजूस व्यक्ति हैं। वह उनको और उनके बच्चों को पर्याप्त ख़र्च नहीं देते। यही कारण है कि उनको अबू सुफ़यान को बताए बिना उनके धन में से कुछ छुपाकर ले लेना पड़ता है। ऐसे में क्या उनपर कोई गुनाह होगा? अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : तुम अपने और अपने बच्चों के लिए अबू सुफ़यान के धन में से इतना ले लिया करो, जो यहाँ आम जीवन-शैली के अनुसार पर्याप्त हो। अबू सुफ़यान को इसकी जानकारी न भी रहे, तो कोई हर्ज नहीं है।

फ़ायदे
  1. पत्नी और बच्चों पर खर्च करना अनिवार्य है।
  2. इब्न-ए-हजर कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने "तुम उसके धन में से उतना लो, जो आम प्रचलन के अंसार तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए काफ़ी हो।" कहकर ऐसे मामलों को आम प्रचलन के हवाले कर दिया, जिनके बारे में शरीयत द्वारा कुछ निर्धारण न हो।
  3. इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि फ़तवा लेने या शिकायत करने आदि के लिए इन्सान की ऐसी बातों का ज़िक्र किया जा सकता है, जो उसे पसंद न हों। यह उन स्थानों में से एक है, जहाँ ग़ीबत जायज़ है।
  4. क़ुर्तुबी कहते हैं : हिंद का उद्देश्य यह नहीं था कि अबू सुफ़यान हर जगह कंजूसी से काम लेते हैं। वह बस इतना बताना चाहती थीं कि अबू सुफ़यान उनपर तथा उनके बच्चों पर खर्च करने के मामले में कंजूस हैं, जिसका यह मतलब लेना उचित नहीं होगा कि अबू सुफ़यान हर मामले में कंजूस हैं। क्योंकि बहुत-से धनवान् अपने बच्चों पर ख़र्च करने के मामले में कंजूसी से काम लेते हैं, लेकिन दूसरों का दिल रखने के लिए उनपर ख़ूब ख़र्च करते हैं।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 79) (2211). صحيح مسلم (3/ 1338) (1714). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص700). الإعلام بفوائد عمدة الأحكام، لابن الملقن (10/ 12).

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अपने पास कुछ माल जमा रखो, यह तुम्हारे हित में बेहतर है

عن كَعْب بن مالك رضي الله عنه قال: قلتُ: يا رسولَ الله، إن مِن تَوبتي أن أَنْخَلِعَ مِنْ مالي؛ صدقةً إلى الله وإلى رسولِه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم : "أمسِكْ عليك بعضَ مالِكَ؛ فهو خيرٌ لكَ".
काब बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपनी तौबा क़बूल होने की खुशी में अपना सारा धन अल्लाह और उसके रसूल की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदक़ा करता हूँ। उनकी बात सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपना कुछ माल रखे रहो, यह तुम्हारे लिए बेहतर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

काब बिन मालिक -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- उन तीन सहाबा में से एक हैं, जो बिना किसी उचित कारण और बिना निफ़ाक़ के तबूक युद्ध से पीछे रह गए थे। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- युद्ध से वापस आए, तो उनका बहिष्कार किया तथा लोगों को भी उनके बहिष्कार का आदेश दिया। इस तरह, वे अलग-थलग पड़े रहे, यहाँ तक कि उनकी क्षमा से संबंधित आयत अवतरित हुई और अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया। फिर, रसूल और सहाबा भी उनसे संतुष्ट हो गए। चुनांचे काब -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के प्रसन्न होने और उनकी तौबा स्वीकार होने से इतना उत्साहित हुए कि अपना सारा धन अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए सदक़ा कर देने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी रहनुमाई करते हुए फ़रमाया कि कुछ धन अपने पास रख लो। क्योंकि अल्लाह ने उनकी सच्ची नीयत एवं पूरी निष्ठा के साथ क्षमा याचना के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था और अब इसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। साथ ही अल्लाह किसी पर उसकी ताक़त से अधिक बोझ भी नहीं डालता। इसके बाद उन्होंने अपना कुछ धन अल्लाह की प्रसन्नता से संतुष्ट होकर और आख़िरत के लिए जमा रखने के इरादे से खर्च कर दिया और कुछ अपने पास रखा, ताकि अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा दयालु है।

हवाला

-صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. -صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ. -عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ. -تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه. -تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. -الإلمام بشرح عمدة الأحكام, إسماعيل الأنصاري, الطبعة الثانية 1392هـ. -الشرح الممتع على زاد المستقنع، محمد بن صالح بن محمد العثيمين، دار ابن الجوزي، الطبعة: الأولى، 1422- 1428هـ.

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ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से बेहतर है। ऊपर वाला हाथ खर्च करने वाला हाथ है और नीचे वाला हाथ माँगने वाला हाथ है

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ وَهُوَ عَلَى المِنْبَرِ، وَذَكَرَ الصَّدَقَةَ، وَالتَّعَفُّفَ، وَالمَسْأَلَةَ: «اليَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِنَ اليَدِ السُّفْلَى، فَاليَدُ العُلْيَا: هِيَ المُنْفِقَةُ، وَالسُّفْلَى: هِيَ السَّائِلَةُ».
अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मिंबर पर खड़े होकर दान करने तथा माँगने से बचने का ज़िक्र करते हुए फ़रमायाः "ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से बेहतर है। ऊपर वाला हाथ खर्च करने वाला हाथ है और नीचे वाला हाथ माँगने वाला हाथ है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح البخاري (2/ 112) (1429). صحيح مسلم (2/ 717) (1033). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 590). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 465). التوضيح لشرح الجامع الصحيح، لابن الملقن (10/ 315). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 388). تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذي، المباركفوري (3/ 288). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص212).

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ऐ अल्लाह के रसूल, यदि मैं अबू सलमा के बेटों पर खर्च करूँ, तो क्या मुझे उसका प्रतिफल मिलेगा, जबकि मैं उन्हें इस अवस्था में छोड़ भी नहीं सकती, क्योंकि वह मेरे बेटे ही हैं? तो फ़रमायाः "हाँ, तुम जो कुछ उनपर खर्च करोगी, तुम्हें उसका प्रतिफल मिलेगा।

عن أم سلمة رضي الله عنها ، قالت: قلت: يا رسول الله، هل لي أجرٌ في بني أبي سلمة أن أُنْفِقَ عليهم، ولستُ بتاركتهم هكذا وهكذا إنما هم بَنِيَّ؟ فقال: «نعم، لك أجرُ ما أنفقتِ عليهم».
उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, यदि मैं अबू सलमा के बेटों पर खर्च करूँ, तो क्या मुझे उसका प्रतिफल मिलेगा, जबकि मैं उन्हें इस अवस्था में छोड़ भी नहीं सकती, क्योंकि वह मेरे बेटे ही हैं? तो फ़रमायाः "हाँ, तुम जो कुछ उनपर खर्च करोगी, तुम्हें उसका प्रतिफल मिलेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، نشر دار الكتاب العربي. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407ه 1987م. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي. صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت.

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अल्लाह फ़रमाता है : ऐ आदम की संतान! व्यय (खर्च) करो, तुमपर व्यय किया जाएगा।

عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «قَالَ اللهُ: أَنْفِقْ يَا ابْنَ آدَمَ أُنْفِقْ عَلَيْكَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह फ़रमाता है : ऐ आदम की संतान! व्यय (खर्च) करो, तुमपर व्यय किया जाएगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाते हैं कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ऐ आदम की संतान! तुम उन जगहों में खर्च करो, जहाँ खर्च करना वाजिब या मुसतहब (वांछित) हो, मैं तुम्हें इसका बदला दोंगा, तुम्हारी रोज़ी में बरकत दूँगा और तुम्हें खुशहाली प्रदान करूँगा।

फ़ायदे
  1. सदक़ा करने तथा अल्लाह के मार्ग में खर्च करने की प्रेरणा।
  2. नेकी के कामों में खर्च करना रोज़ी में बरकत का एक बहुत बड़ा कारण है और अल्लाह बंदे को इसका बदला प्रदान करता है।
  3. यह हदीस उन हदीसों में से है, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने रब से रिवायत करके कहा है। इस तरह की हदीस को हदीस-ए-क़ुदसी या हदीस-ए-इलाही कहा जाता है। इससे मुराद वह हदीस है, जिसके शब्द तथा अर्थ दोनों अल्लाह के हों। अलबत्ता इसके अंदर क़ुरआन की विशेषताएँ, जैसे उसकी तिलावत का इबादत होना, उसके लिए तहारत प्राप्त करना तथा उसका चमत्कार होना आदि, नहीं पाई जाती।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 62) (5352). صحيح مسلم (2/ 690) (993). شرح النووي على مسلم (7/ 79). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 603).

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एक दीनार जो तुमने अल्लाह के रास्ते में खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी दास को मुक्त करने के लिए खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी निर्धन को दान किया और एक दीनार जो तुमने बाल-बच्चों पर ख़र्च किया, उनमें सबसे अधिक नेकी वाला दीनार वह है, जिसे तुमने अपने परिवार पर खर्च किया।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قالَ: قالَ رَسُولُ اللَّهِ صلَّى اللَّهُ عليْه وسلَّمَ: «دِينَارٌ أَنْفَقْتَهُ فِي سَبِيلِ اللهِ، وَدِينَارٌ أَنْفَقْتَهُ فِي رَقَبَةٍ، وَدِينَارٌ تَصَدَّقْتَ بِهِ عَلَى مِسْكِينٍ، وَدِينَارٌ أَنْفَقْتَهُ عَلَى أَهْلِكَ أَعْظَمُهَا أَجْرًا الَّذِي أَنْفَقْتَهُ عَلَى أَهْلِكَ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "एक दीनार जो तुमने अल्लाह के रास्ते में खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी दास को मुक्त करने के लिए खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी निर्धन को दान किया और एक दीनार जो तुमने बाल-बच्चों पर ख़र्च किया, उनमें सबसे अधिक नेकी वाला दीनार वह है, जिसे तुमने अपने परिवार पर खर्च किया।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पहले खर्च करने की कुछ जगहों को बयान किया। फ़रमाया कि एक दीनार जिसे तुम अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए खर्च करते हो, एक दीनार जिसे तुम किसी ग़ुलाम को ग़ुलामी के बंधन से आज़ाद करने के लिए खर्च करते हो, एक दीनार जिसे तुम किसी ज़रूरतमंद निर्धन को दान करते हो और एक दीनार जिसे तुम अपने बीवी-बच्चों पर खर्च करते हो। फिर आपने बताया कि अल्लाह के यहाँ इनमें सबसे अधिक सवाब वाला दीनार वह है, जिसे तुम अपने बीवी-बच्चों और ऐसे लोगों पर खर्च करते हो, जिनका खर्च उठाना तुमपर वाजिब है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए खर्च करने के बहुत-से रास्ते हैं।
  2. जब खर्च करने के कई विकल्प सामने हों, तो अधिक बेहतर विकल्प को प्राथमिकता दी जाएगी। जब सारे स्थानों पर खर्च करना संभव न हो, बाल-बच्चों पर खर्च किया जाएगा।
  3. नववी सहीह मुस्लिम की व्याख्या में कहते हैं : अपने मातहतों पर खर्च करने की प्रेरणा और उससे मिलने वाले प्रतिफल का बयान। क्योंकि मातहतों पर खर्च करना कभी उनसे रिश्तेदारी के कारण वाजिब, मुसतहब तथा सदक़ा होता है, तो कभी निकाह या दासता के कारण मालिकाना अधिकार की वजह से वाजिब होता है। इन सभी लोगों पर खर्च करना नेकी का काम है और शरीयत ने इसकी प्रेरणा दी है। इनपर ख़र्च करना नफ़ल सदक़े से बेहतर है।
  4. सिंधी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्दों "वह दीनार जो वह अपने परिजनों पर खर्च करता है" का अर्थ है : जिसे खर्च करते समय अल्लाह की प्रसन्नता सामने हो और पारिवारिक कर्तव्य को पूरा करना उद्देश्य हो।
  5. अबू क़िलाबा कहते हैं : उस व्यक्ति से बढ़कर प्रतिफल का हक़दार कौन हो सकता है, जो अपने छोटे-छोटे बच्चों पर ख़र्च करके उनको किसी के सामने हाथ फैलाने से बचाए रखे या अल्लाह उसके द्वारा उन्हें लाभान्वित करे तथा बेनियाज़ रखे।
हवाला

صحيح مسلم (2/ 692) (995). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 156). نزهة المتقين بشرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 291). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 374). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص209).

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जब कोई आदमी अपने घर वालों पर, नेकी व सवाब की उम्मीद रखते हुए खर्च करता है, तो यह उसके लिए सदक़ा होता है।

عن أبي مسعود رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «إِذَا أَنْفَقَ الرَّجُلُ عَلَى أَهْلِهِ يَحْتَسِبُهَا فَهُوَ لَهُ صَدَقَةٌ».
अबू मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब कोई आदमी अपने घर वालों पर, नेकी व सवाब की उम्मीद रखते हुए खर्च करता है, तो यह उसके लिए सदक़ा होता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

जब कोई व्यक्ति अपने घर के लोगों, जैसे पत्नी, माता-पिता और बच्चों आदि पर, जिनपर खर्च करना उसपर अनिवार्य है, अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए और सवाब की नीयत से खर्च करे, तो उसे सदक़े का सवाब मिलेगा।

फ़ायदे
  1. परिवार पर खर्च करने का भी प्रतिफल मिलेगा।
  2. मोमिन अपना हर काम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने और उसके यहाँ सवाब हासिल करने के लिए करता है।
  3. हर काम करते समय, जिसमें अपने परिवार पर खर्च करना भी शामिल है, दिल में अच्छी नीयत रखनी चाहिए।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 20) (55). صحيح مسلم (2/ 695) (1002). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (5/ 334). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 157). نزهة المتقين بشرح رياض الصالحين، لمصطفى الخن وغيره (1/ 293). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم الهلالي (1/ 375).

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मेरे वारिस न दीनार तक़सीम करेंगे, न दिरहम। जो कुछ मैं अपनी पत्नियों के ख़र्च और अपने लिये काम करने वाले (ख़लीफ़ा आदि ) के ख़र्च के बाद छोड़ूँ, वह सदक़ा है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لا يَقْتَسِمُ وَرَثَتي دينارًا ولا درهمًا، ما تَرَكْتُ بَعْدَ نَفَقَة نسائي، ومئونَة عامِلي فهو صَدَقة».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "मेरे वारिस न दीनार तक़सीम करेंगे, न दिरहम। जो कुछ मैं अपनी पत्नियों के ख़र्च और अपने लिये काम करने वाले (ख़लीफ़ा आदि ) के ख़र्च के बाद छोड़ूँ, वह सदक़ा है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. - صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. - شرح صحيح البخاري لابن بطال، تحقيق: أبي تميم ياسر بن إبراهيم، نشر: مكتبة الرشد، الرياض-السعودية، الطبعة: الثانية 1423ه، 2003م. - إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري، لأحمد بن محمد بن أبى بكر بن عبد الملك القسطلاني القتيبي المصري، الناشر: المطبعة الكبرى الأميرية، مصر، الطبعة: السابعة، 1323 هـ. - عمدة القاري شرح صحيح البخاري، لمحمود بن أحمد بن موسى الحنفى بدر الدين العينى، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. - مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م.

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11 में से 8
11 हदीसें
  1. तुम उसके धन में से उतना लो, जो साधारणतः तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के लिए काफ़ी हो।
  2. अपने पास कुछ माल जमा रखो, यह तुम्हारे हित में बेहतर है
  3. ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से बेहतर है। ऊपर वाला हाथ खर्च करने वाला हाथ है और नीचे वाला हाथ माँगने वाला हाथ है
  4. ऐ अल्लाह के रसूल, यदि मैं अबू सलमा के बेटों पर खर्च करूँ, तो क्या मुझे उसका प्रतिफल मिलेगा, जबकि मैं उन्हें इस अवस्था में छोड़ भी नहीं सकती, क्योंकि वह मेरे बेटे ही हैं? तो फ़रमायाः "हाँ, तुम जो कुछ उनपर खर्च करोगी, तुम्हें उसका प्रतिफल मिलेगा।
  5. अल्लाह फ़रमाता है : ऐ आदम की संतान! व्यय (खर्च) करो, तुमपर व्यय किया जाएगा।
  6. एक दीनार जो तुमने अल्लाह के रास्ते में खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी दास को मुक्त करने के लिए खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी निर्धन को दान किया और एक दीनार जो तुमने बाल-बच्चों पर ख़र्च किया, उनमें सबसे अधिक नेकी वाला दीनार वह है, जिसे तुमने अपने परिवार पर खर्च किया।
  7. जब कोई आदमी अपने घर वालों पर, नेकी व सवाब की उम्मीद रखते हुए खर्च करता है, तो यह उसके लिए सदक़ा होता है।
  8. मेरे वारिस न दीनार तक़सीम करेंगे, न दिरहम। जो कुछ मैं अपनी पत्नियों के ख़र्च और अपने लिये काम करने वाले (ख़लीफ़ा आदि ) के ख़र्च के बाद छोड़ूँ, वह सदक़ा है।
  9. देने वाले का हाथ ऊपर होता है। आरंभ उससे करो जिसके ऊपर खर्च करना तुम्हारे ऊपर वाजिब है : तुम्हारी माता, तुम्हारे पिता, तुम्हारी बहन, तुम्हारे भाई, फिर सबसे निकट का संबंधी और उसके बाद सबसे निकट का संबंधी।
  10. किसी व्यक्ति के पापी (गुनहगार) होने के लिए बस इतना काफी है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति का राशन रोक ले, जिसका राशन उसके हाथ में है।
  11. उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने सेनाओं के सेनापतियों के नाम उन लोगों के विषय में पत्र लिखकर आदेश जारी किया, जो अपनी पत्नियों से दूर रहते थे कि वे उन्हें उपस्थित करके कहें कि या तो (अपनी पत्नियों को) खर्च दें या उनको तलाक़ दे दें। फिर, यदि तलाक़ देते हैं तो जितने दिनों तक उन्हें अपने विवाह में रखा है, उतने दिनों का खर्च भेज दें।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com