-صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. -عمدة القاري شرح صحيح البخاري، لمحمود بن أحمد بن موسى الحنفى بدر الدين العينى، الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت. -شرح صحيح البخاري لابن بطال، تحقيق: أبي تميم ياسر بن إبراهيم، نشر: مكتبة الرشد، الرياض-السعودية، الطبعة: الثانية 1423ه، 2003م. -إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري, أحمد بن محمد بن أبى بكر بن عبد الملك القسطلاني القتيبي المصري, الناشر: المطبعة الكبرى الأميرية، مصر, الطبعة: السابعة، 1323 هـ -الإفصاح عن معاني الصحاح، ليحيى بن هبيرة بن محمد بن هبيرة الذهلي الشيباني، المحقق: فؤاد عبد المنعم أحمد، الناشر: دار الوطن، سنة النشر: 1417هـ.
तशरीह के साथ हदीसें
हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ियल्लाहु अनहु), उसमान बिन अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास उस समय पहुँचे, जब वह आर्मीनिया और अज़रबाइजान को जीतने के लिए सीरिया तथा इराक़ वालों को तैयारी कराने में जुटे थे, हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) को क़ुरआन पढ़ने के संबंध में लोगों के मतभेद ने घबराहट में डाल रखा था
عن ابن شهاب أنَّ أنس بن مالك حدثه: أنَّ حُذيفة بن اليَمان قدِم على عثمان وكان يُغازي أهل الشام في فتْح أَرْمِيِنيَّة، وأَذْرَبِيجان مع أهل العراق، فأفْزَع حذيفةَ اختلافُهم في القراءة، فقال حُذيفة لعثمان: يا أمير المؤمنين، أدْرِكْ هذه الأمةَ، قبل أنْ يختلفوا في الكتاب اختلافَ اليهود والنصارى، فأرسل عثمانُ إلى حفصة: «أنْ أرسلي إلينا بالصُّحُف ننسخُها في المصاحف، ثم نردُّها إليك»، فأرسلتْ بها حفصةُ إلى عثمان، فأَمَر زيدَ بن ثابت، وعبدَ الله بن الزبير، وسعيد بن العاص، وعبد الرحمن بن الحارث بن هشام فنسخوها في المصاحف، وقال عثمان للرَّهْط القُرَشيِّين الثلاثة: «إذا اختلفتم أنتم وزيدُ بن ثابت في شيء من القرآن فاكتبوه بِلِسان قُريش، فإنما نزل بِلِسانهم» ففعلوا حتى إذا نسخوا الصُّحُف في المصاحف، رَدَّ عثمانُ الصُّحُفَ إلى حفصة، وأرسل إلى كلِّ أُفُق بمصحف مما نَسَخُوا، وأَمَر بما سواه من القرآن في كلِّ صحِيفة أو مُصحف، أنْ يُحرق.
इब्ने शिहाब का वर्णन है कि अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) ने उन्हें बताया: हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ियल्लाहु अनहु) उसमान बिन अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अनहु) के पास उस समय पहुँचे, जब वह आर्मीनिया और अज़रबाइजान को जीतने के लिए सीरिया तथा इराक़ वालों को तैयारी कराने में जुटे थे। हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) को क़ुरआन पढ़ने के संबंध में लोगों के मतभेद ने घबराहट में डाल रखा था, इसलिए उन्होंने उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) से कहा: ऐ अमीरुलमोमिनीन! इस उम्मत को संभाल लीजिए, इससे पहले कि वे यहूदियों तथा ईसाइयों की तरह अपनी किताब के बारे में मतभेद के शिकार हो जाएँ। इसलिए, उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) ने हफ़सा (रज़ियल्लाहु अनहा) के पास संदेश भेजा कि हमारे पास वह सहीफ़े भेज दें, जो आपके पास हैं, हम मुसहफों के रूप में उनकी नक़ल तैयार करवाने के बाद उन्हें आपको लौटा देंगे। फिर हफ़सा (रज़ियल्लाहु अनहा) ने उन्हें उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) को भेज दिया। फिर उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) ने ज़ैद बिन साबित, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर, सईद बिन आस और अब्दुुर्रहमान बिन हारिस बिन हिशाम को अधिकृत किया और उन्होंने उन सहीफ़ों से नक़ल करके बहुत-से मुसहफ़ तैयार कर दिए। उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) मुसहफ़ तैयार करने के कार्य पर अधिकृत तीनों क़ुरैशी व्यक्तियों से कह दिया था कि जब क़ुरआन से संबंधित किसी बात पर ज़ैद बिन साबित से, (जो कि इस समिति के एकमात्र अंसारी सदस्य थे) तुम्हारा मतभेद हो, तो उसे क़ुरैश की भाषा में लिखना, क्योंकि क़ुरआन क़ुरैश ही की भाषा में उतरा है। इसलिए, उन्होंने ऐसा ही किया। यहाँ तक कि जब उन सहीफ़ों से बहुत- से मुसहफ़ तैयार कर लिए, तो उसमान (रज़ियल्लाहु अनहु) ने सहीफ़ों को हफ़सा (रज़ियल्लाहु अनहा) के हवाले कर दिया तथा तैयार किए हुए मुसहफों की एक- एक प्रति हर दिशा में भेज दी और उसके अतिरिक्त क़ुरआन के तमाम सहीफ़ों या मुसहफ़ों को जलाने का आदेश दे दिया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com