आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) उस बरकत वाले सौदे को याद करते हुए, जो बरीरा (रज़ियल्लाहु अंहा) को उनसे क़रीब लाया था, अपनी इस मुक्त की हुई दासी की कुछ बरकतों को याद करती हैं। क्योंकि अल्लाह ने उनसे संबंधित चार ऐसे महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं, जो आम आदेश के रूप में हमेशा के लिए बाक़ी रह गए। पहला आदेशः वह अपने दास पति मुग़ीस (रज़ियल्लाहु अंहु) के विवाह में थीं कि मुक्त हो गईं, जिसके बाद उन्हें अपने पहले पति के निकाह में रहने या उसे छोड़कर अलग हो जाने की अनुमति दे दी गई, क्योंकि अब वह आज़ाद थीं और उनका पति ग़ुलाम। इस तरह वह अपने पति के समकक्ष नहीं रह गई थीं, जबकि यहाँ समकक्षता का एतबार होगा। यही कारण है कि वह निकाह रद्द करके उनसे अलग हो गईं और अन्य स्त्रियों के लिए एकआदर्श के रूप में सामने आईं। दूसरा आदेशः वह आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के घर में थीं और उनको मांस दान किया गया। मांस हंडी में पक ही रहा था कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के यहाँ आए और खाना माँगा। आपको रोटी और घर में मौजूद सालन दिया गया और बरीरा (रज़ियल्लाहु अंहा) को सदक़े में मिलने वाला मांस नहीं दिया गया, क्योंकि सब को पता था कि आप सदक़ा नहीं खाते। लेकिन आपने कहाः क्या मैंने चूल्हे पर मांस की हंडी नहीं देखी है? घर के लोगों ने कहाः हाँ, देखा तो है, लेकिन लेकिन वह बरीरा को सदक़े में मिला है और हम नहीं चाहते कि आप उसे खाएँ। इसपर आपने कहाः वह उसे सदक़े में मिला है, लेकिन उसकी ओर से हमारे लिए उपहार है। तीसरा आदेशः उनके मालिकों ने जब उनको आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) से बेचना चाहा, तो यह शर्त लगा दी कि 'वला' उनको प्राप्त होगा, ताकि जब मुक्त होने के बाद वह अपनी निसबत उनकी ओर करें, तो उन्हें गौरव का अनुभव हो तथा हो सकता है कि उन्हें मीरास और सहायता आदी भौतिक लाभ भी मिलें। ऐसे में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः " 'वला' उसके लिए है, जिसने आज़ाद किया हो।" बेचने वाले या किसी और के लिए नहीं। 'वला' वह संबंध है, जो मुक्ति प्राप्त करने के बाद, किसी मुक्त दास और उसके मुक्त करने वाले मालिक के बीच में हो। चुनांचे मुक्ति प्राप्त करने वाला दास यदि मर जाए और उसका कोई उत्तराधिकारी न हो या फिर सभी निर्धारित भाग वालों के अपना-अपना भाग ले लेने के बाद कुछ बच जाए, तो वह उसे मिलेगा, जिसने उसे आज़ाद किया हो।
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426 هـ. خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام لفيصل بن عبد العزيز آل المبارك ، ط2، 1412 هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381ه. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.