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तशरीह के साथ हदीसें

अल-वला तथा अल-बरा (मैत्री तथा अलगाव) से संबंधित अहकाम

5 हदीसें

“आदमी अपने मित्र के दीन पर चलता है। अतः, तुममें से हर व्यक्ति देख ले कि वह किसे मित्र बना रहा है।”

عن أبي هريرة رضي الله عنه أَن النبيَّ صَلّى اللهُ عَلَيْهِ وسَلَّم قَالَ: «الرَّجُلُ عَلَى دِينِ خَلِيلِهِ، فَلْيَنْظُر أَحَدُكُم مَنْ يُخَالِل».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “आदमी अपने मित्र के दीन पर चलता है। अतः, तुममें से हर व्यक्ति देख ले कि वह किसे मित्र बना रहा है।”
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि एक इन्सान का जीवन एवं व्यवहार वैसा ही हुआ करता है, जैसा उसके साथी एवं दोस्त हुआ करते हैं। दोस्ती का प्रभाव चरित्र, व्यवहार और काम-काज पर पड़ता ही है। यही कारण है कि आपने अच्छे दोस्त का चुनाव करने का निर्देश दिया है। क्योंकि अच्छा दोस्त ईमान, सत्य और भलाई का रास्ता दिखाता है और इन चीज़ों में मदद करता है।

फ़ायदे
  1. अच्छे लोगों का चयन करने और उनके साथ रहने का आदेश और बुरे लोगों के साथ रहने की मनाही।
  2. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यहाँ दोस्ता का ज़िक्र किया है, रिश्तेदार का नहीं, क्योंकि दोस्त का चयन इन्सान खुद करता है, जबकि भाई और रिश्तेदार के चयन में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं होती।
  3. किसी से दोस्ती सोच समझ कर करनी चाहिए।
  4. इन्सान ईमान वालों की संगति से अपने दीन को सबल करता है और गुनाहगारों की संगति से उसे निर्बल करता है।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 204) (4833). سنن الترمذي (4/ 187) (2378). مسند أحمد (13/ 398) (8028). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 433). تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذي، للمباركفوري (7/ 51). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص250). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (6/ 166). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 341).

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एक मुसलमन के दूसरे मुसलमान पर छह अधिकार हैं।" पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! वो क्या हैं? फ़रमाया : "जब उससे मिलो तो सलाम करो, जब वह आमंत्रण दे तो उसका आमंत्रण स्वीकार करो, जब तुमसे शुभचिंतन की आशा रखे तो उसका शुभचिंतक बनो, जब छींकने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करे तो 'यरहमुकल्लाह' कहो, जब बीमार हो तो उसका हाल जानने जाओ और जब मर जाए तो उसके जनाज़े में शामिल हो।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «حَقُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ سِتٌّ» قِيلَ: مَا هُنَّ يَا رَسُولَ اللهِ؟، قَالَ: «إِذَا لَقِيتَهُ فَسَلِّمْ عَلَيْهِ، وَإِذَا دَعَاكَ فَأَجِبْهُ، وَإِذَا اسْتَنْصَحَكَ فَانْصَحْ لَهُ، وَإِذَا عَطَسَ فَحَمِدَ اللهَ فَسَمِّتْهُ، وَإِذَا مَرِضَ فَعُدْهُ وَإِذَا مَاتَ فَاتَّبِعْهُ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "एक मुसलमन के दूसरे मुसलमान पर छह अधिकार हैं।" पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! वो क्या हैं? फ़रमाया : "जब उससे मिलो तो सलाम करो, जब वह आमंत्रण दे तो उसका आमंत्रण स्वीकार करो, जब तुमसे शुभचिंतन की आशा रखे तो उसका शुभचिंतक बनो, जब छींकने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करे तो 'यरहमुकल्लाह' कहो, जब बीमार हो तो उसका हाल जानने जाओ और जब मर जाए तो उसके जनाज़े में शामिल हो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बयान फ़रमाया है कि एक मुसलमान के दूसरे मुसलमान पर जो अधिकार हैं, उनमें निम्नलिखित छह चीज़ें शामिल हैं : 1- मुलाक़ात होने पर अस्सलामु अलैकुम कहकर सलाम करना। उत्तर में सामने वाला व्यक्ति व अलैकुमुस्सलाम कहेगा। 2- वलीमा आदि दावत में शामिल होने का निमंत्रण मिलने पर उसे ग्रहण करना। 3- सलाह माँगे जाने पर उचित सलाह देना। चापलूसी एवं धोखा न करना। 4- जब कोई छींके और अल-हम्दु लिल्लाह कहे, तो उसके उत्तर में यरहमुकल्लाह कहना। इसके बाद छींकने वाला व्यक्ति यहदीकुमुल्लाह व युसलिह बालकुम कहे। 5- बीमार होने पर उसका हाल जानने के लिए जाना। 6- मृत्यु हो जाने पर उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ना और दफ़न का कार्य सम्पूर्ण हो जाने तक उसके जनाज़े के साथ रहना।

फ़ायदे
  1. शौकानी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्द "حق المسلم" से मुराद यह है कि इन कार्यों को छोड़ा नहीं जाना चाहिए और इनका करना या तो वाजिब है या फिर वाजिब से निकट का मुसतहब, जिन्हें छोड़ने का कोई औचित्य नहीं बनता।
  2. सलाम जब किसी ख़ास व्यक्ति को किया जाए तो जवाब देना ज़रूरी है और जब किसी समूह को सलाम किया जाए तो एक व्यक्ति का जवाब देना काफ़ी है। हालाँकि, सलाम करना सुन्नत है।
  3. बीमार व्यक्ति का हाल जानने के लिए जाना मुसलमान भाइयों के अनिवार्य अधिकारों में से एक है, क्योंकि इससे बीमार व्यक्ति को खुशी और आराम मिलता है। यह एक फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है।
  4. निमंत्रण ग्रहण करना वाजिब है, जब तक वहाँ कोई गुनाह का काम न हो रहा हो। निमंत्रण अगर वलीमे का हो, तो जमहूर के यहाँ उसे क़बूल करना वाजिब है। हाँ, कोई शरई मजबूरी हो, तो बात अलग है। निमंत्रण अगर वलीमे के अतिरिक्त किसी और आयोजन का हो, तो जमहूर के यहाँ उसे ग्रहण करना मुसतहब है।
  5. छींकने वाला जब अल-हम्दु लिल्लाह कहे तो सुनने वाले पर यरहमुकल्लाह कहना वाजिब है।
  6. इस्लामी शरीयत एक सम्पूर्ण शरीयत है, जिसने सामाजिक बंधनों को मजबूत करने तथा समाज के सभी लोगों के बीच प्रेम और स्नेह का निर्माण करने का हर संभव प्रयास किया है।
  7. कुछ संस्करणों में "فَسَمِّتْهُ" के स्थान पर "فَشمّتهُ" है। दोनों का अर्थ है : भलाई और बरकत की दुआ करना। कुछ लोग कहते हैं कि "تشميت" का अर्थ है : अल्लाह आपको जग-हंसाई से दूर रखे और हर उस चीज़ से बचाए जो दुश्मन को हँसने का मौका देती है। जबकि "تسميت" का अर्थ है : अल्लाह आपको सही रास्ते पर ले जाए।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 1705) (2162). منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (10/ 7). توضيح الأحكام من بلوغ المرام، للبسام (3/ 128). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 327).

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जो किसी को हानि पहुंचाएगा, अल्लाह उसको हानि पहुंचाएगा और जो किसी को कठिनाई में डालेगा, अल्लाह उसे कठिनाई में डालेगा।

عن أبي صِرْمة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «مَنْ ضَارَّ ضَارَّ اللهُ بِهِ، وَمَنْ شَاقَّ شَقَّ اللهُ عَلَيْهِ».
अबू सिर्मा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो किसी को हानि पहुंचाएगा, अल्लाह उसको हानि पहुंचाएगा और जो किसी को कठिनाई में डालेगा, अल्लाह उसे कठिनाई में डालेगा।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी मुसलमान को हानि पहुँचाने और उसे किसी भी तरह की कठिनाई में डालने से मना किया है। हानि तथा कठिनाई का संबंध उसकी जान से हो, धन से हो या परिवार से। आपने बताया है कि ऐसा करने वाले को अल्लाह उसी कोटि का प्रतिफल देगा, जिस कोटि का उसका कर्म है।

फ़ायदे
  1. मुसलमान को हानि पहुँचाना और उसे कठिनाई में डालना हराम है।
  2. अल्लाह अपने बंदों के लिए प्रतिशोध लेता है।
हवाला

سنن أبي داود (5/ 477) (3635). سنن الترمذي (3/ 495) (1940). سنن ابن ماجه (3/ 432) (2342). مسند أحمد (25/ 34) (15755). مساوئ الأخلاق، للخرائطي (ص: 274) (583). توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، للبسام (7/ 445). فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام، لابن عثيمين (6/ 396). منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (10/ 261).

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मैं हर उस मुसलमान से बरी हूँ, जो काफ़िरों के बीच में रहता हो।

عن جرير بن عبد الله قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سَرِيَّةً إلى خَثْعَمٍ فاعٍتَصَمَ نَاسٌ منهم بالسجود، فَأَسْرَعَ فيهم القَتْلُ قال: فَبَلَغَ ذلك النبيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَمَرَ لهم بنصف العَقْلِ وقال: «أنا بريء من كل مسلم يُقيم بين أَظْهُرِ المشركين». قالوا: يا رسول الله لم؟ قال: «لا تَرَاءَى نَارَاهُما».
जरीर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़सअम क़बीले की ओर एक सैन्यदल भेजा। (युद्ध के दौरान) उनमें से कुछ लोग बचाव के लिए सजदे में गिर पड़े, लेकिन मुसलमानों ने देर किए बिना उन्हें क़त्ल कर डाला। वर्णनकर्ता का कहना है कि इसकी सूचना नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिली, तो उनके लिए आधी दियत अदा करने का आदेश दिया और फ़रमायाः "मैं हर उस मुसलमान से बरी हूँ, जो काफ़िरों के बीच में रहता हो।" लोगों ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, आख़िर क्यों? आपने फ़रमायाः "उन दोनों की आग एक-दूसरे को नहीं दिखनी चाहिए।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने खसअम क़बीले के एक समूह की ओर जो कि काफ़िर था एक सैन्यदल भेजा,। मुसलमानों को हमलावर होते देख उनमें कुछ लोगों ने यह दिखाने के लिए कि वे मुसलमान हैं, सजदा करने लगे। लेकिन मुसलमानों ने जल्दबाज़ी में उनका वध कर दिया। क्योंकि मुसलमान उन्हें मुश्रिक समझ रहे थे और इसलिए भी कि वे रह भी रहे थे मुश्रिकों के बीच। लेकिन जब यह अच्छी तरह स्पष्ट हो गया कि वे मुसलमान थे, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी दियत मुसलमानों की दियत से आधी निर्धारित की। आपने पूरी दियत इसलिए निर्धारित नहीं की, क्योंकि इस क़त्ल का कारण स्वयं वही थे। शरीयत ने काफ़िरों के नगर में रहने को हराम क़रार दिया है। अतः दोनों को एक-दूसरे के साथ नहीं रहना चाहिए और उनमें से एक की आग दूसरे को नहीं दिखनी चाहिए। यानी इतना निकट घर नहीं बनाना चाहिए कि यदि दोनों में से कोई आग जलाए, तो दूसरे को दिख जाए। ऐसा शरीयत ने अविश्वास एवं अविश्वासियों से बेजारी को रेखांकित करने के लिये किया है ।

हवाला

سنن أبي داود، سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد: المكتبة العصرية. السنن الصغرى للنسائي، أحمد بن شعيب النسائي، تحقيق: عبد الفتاح أبو غدة، مكتب المطبوعات الإسلامية، حلب، الطبعة: الثانية، 1406 – 1986. سنن الترمذي، محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق وتعليق: أحمد محمد شاكر ومحمد فؤاد عبد الباقي وإبراهيم عطوة عوض، شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي، مصر الطبعة: الثانية، 1395 هـ - 1975 م. تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام: تأليف الشيخ صالح الفوزان، عناية عبد السلام السليمان، مؤسسة الرسالة الطبعة الأولى. فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية القاهرة، تحقيق صبحي رمضان وأم إسراء بيومي- الطبعة الأولى 1427. إرواء الغليل في تخريج أحاديث منار السبيل، لمحمد ناصر الدين الألباني، إشراف: زهير الشاويش، المكتب الإسلامي، بيروت، الطبعة: الثانية 1405 هـ - 1985م. ذخيرة العقبى في شرح المجتبى، المؤلف: محمد بن علي بن آدم الإثيوبي الوَلَّوِي دار المعراج الدولية للنشر ودار آل بروم للنشر والتوزيع، الطبعة: الأولى - 1416 هـ - 1996 م.

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मैं यहूदियों और ईसाइयों को ज़रूर अरब द्वीप से निकाल दूँगा, यहाँ तक कि मुसलमानों के सिवा किसी को नहीं छोड़ूँगा।

عن عمر بن الخطاب أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «لأُخْرِجَنَّ اليهودَ والنصارى مِن جَزِيرة العرب حتى لا أدَعَ إلا مُسلما».
उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुनाः "मैं यहूदियों और ईसाइयों को ज़रूर अरब द्वीप से निकाल दूँगा, यहाँ तक कि मुसलमानों के सिवा किसी को नहीं छोड़ूँगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अरब द्वीप से यहूदियों एवं ईसाइयों को निकाल बाहर करने का इरादा रखते थे, ताकि वहाँ दो धर्मों का मिलाप न हो और अरब द्वीप एकेश्वरवाद की ध्वनि से गूँजता रहे तथा उसमें शिर्क का कोई प्रतीक बाक़ी न रहे। क्योंकि अविश्वासियों के पड़ोस में तथा उनके साथ रहना बुरी चीज़ होने के साथ-साथ बहुत-सी बुराइयों का कारण भी बनता है। जैसे सीधे-सादे तथा कम समझ-बूझ वाले मुसलमानों का उनकी मुशाबहत अख़्तियार कर लेना, उनकी धार्मिक मान्यताओं को अच्छा समझने लगना और उनकी चाल चलने लगना। अतः ज़रूरी है कि मुसलमान अपने नगर में अलग से रहें तथा विपरीत अक़ीदों वाले लोगों के मेल-जोल से खुद को दूर रखें। यही कारण है कि यहूदियों, ईसाइयों तथा मजूसियों आदि सारे अविश्वासी समुदायों को अरब द्वीप से निकालना ज़रूरी हो गया। क्योंकि अरब द्वीप मुसलमानों के लिए खास है। यहीं वह्य उतरती रही है और किसी भी अवस्था में यहाँ गैरमुस्लिमों का रहना उचित नहीं है।

हवाला

- صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423 ه.ـ - بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض - المملكة العربية السعودية الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م. - تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف: صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، الطبعة: الأولى، 1427 هـ 2006 م. - منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان، دار ابن الجوزي ط1 1428هـ. - فتح ذي الجلال والاكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية - الطبعة الأولى 1427. - توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام، مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة.الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. - مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح للقاري، دار الفكر، بيروت، الطبعة: الأولى، 1422هـ. - سبل السلام للصنعاني، نشر: دار الحديث. - البدرُ التمام شرح بلوغ المرام، للمَغرِبي, ت: علي بن عبد الله الزبن, دار هجر, الطبعة: الأولى 1428 هـ. - عون المعبود شرح سنن أبي داود، للعظيم آبادي، دار الكتب العلمية، بيروت, الطبعة: الثانية، 1415 هـ. - كشف المشكل من حديث الصحيحين، لابن الجوزي, المحقق: علي حسين البواب, الناشر: دار الوطن - الرياض. - المفاتيح في شرح المصابيح، المؤلف: الحسين بن محمود مظهر الدين الزَّيْدَانيُّ الضَّريرُ الشِّيرازيُّ, ت: لجنة مختصة من المحققين بإشراف: نور الدين طالب, الناشر: دار النوادر، وهو من إصدارات إدارة الثقافة الإسلامية - وزارة الأوقاف الكويتية, الطبعة: الأولى، 1433 هـ. - فتاوى اللجنة الدائمة - المجموعة الأولى، اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء، جمع وترتيب: أحمد بن عبد الرزاق الدويش.

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com