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सहीह बुख़ारी

नंबर 4711

नंबर 4711किताब 65, नंबर 233
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، أَخْبَرَنَا مَنْصُورٌ، عَنْ أَبِي وَائِلٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ كُنَّا نَقُولُ لِلْحَىِّ إِذَا كَثُرُوا فِي الْجَاهِلِيَّةِ أَمِرَ بَنُو فُلاَنٍ‏.‏ حَدَّثَنَا الْحُمَيْدِيُّ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ وَقَالَ أَمِرَ‏.‏
Narrated `Abdullah:During the Pre-Islamic period of ignorance if any tribe became great in number, we used to say, "Amira the children of so-and-so." Narrated Al-Humaidi: Sufyan narrated to us something and used the word 'Amira

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 65 · Prophetic Commentary on the Qur'an (Tafseer of the Prophet (pbuh))

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।