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सहीह बुख़ारी

नंबर 4705

नंबर 4705किताब 65, नंबर 227
حَدَّثَنِي يَعْقُوبُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، أَخْبَرَنَا أَبُو بِشْرٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، رضى الله عنهما ‏{‏الَّذِينَ جَعَلُوا الْقُرْآنَ عِضِينَ‏}‏ قَالَ هُمْ أَهْلُ الْكِتَابِ، جَزَّءُوهُ أَجْزَاءً، فَآمَنُوا بِبَعْضِهِ وَكَفَرُوا بِبَعْضِهِ‏.‏
Narrated Ibn `Abbas:Those who have made their Scripture into parts are the people of the Scripture who divided it into portions and believed in a part of it and disbelieved the other

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 65 · Prophetic Commentary on the Qur'an (Tafseer of the Prophet (pbuh))

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।