حَدَّثَنِي مَطَرُ بْنُ الْفَضْلِ، حَدَّثَنَا رَوْحُ بْنُ عُبَادَةَ، حَدَّثَنَا زَكَرِيَّاءُ بْنُ إِسْحَاقَ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ، قَالَ مَكَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِمَكَّةَ ثَلاَثَ عَشْرَةَ، وَتُوُفِّيَ وَهْوَ ابْنُ ثَلاَثٍ وَسِتِّينَ.
Narrated Ibn `Abbas:Allah's Messenger (ﷺ) stayed in Mecca for thirteen years (after receiving the first Divine Inspiration) and died at the age of sixty-three
स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।