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सहीह बुख़ारी

नंबर 1631

नंबर 1631किताब 25, नंबर 114
حَدَّثَنِي الْحَسَنُ بْنُ مُحَمَّدٍ ـ هُوَ الزَّعْفَرَانِيُّ ـ حَدَّثَنَا عَبِيدَةُ بْنُ حُمَيْدٍ، حَدَّثَنِي عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ رُفَيْعٍ، قَالَ رَأَيْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ ـ رضى الله عنهما ـ يَطُوفُ بَعْدَ الْفَجْرِ، وَيُصَلِّي رَكْعَتَيْنِ‏.‏ قَالَ عَبْدُ الْعَزِيزِ وَرَأَيْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ يُصَلِّي رَكْعَتَيْنِ بَعْدَ الْعَصْرِ، وَيُخْبِرُ أَنَّ عَائِشَةَ ـ رضى الله عنها ـ حَدَّثَتْهُ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَدْخُلْ بَيْتَهَا إِلاَّ صَلاَّهُمَا‏.‏
Narrated Abida bin Humaid:`Abdul, `Aziz bin Rufa`i said, "I saw `Abdullah bin Az-Zubair performing Tawaf of the Ka`ba after the morning prayer then offering the two rak`at prayer." `Abdul `Aziz added, "I saw `Abdullah bin Az-Zubair offering a two rak`at prayer after the `Asr prayer." He informed me that Aisha told him that the Prophet (ﷺ) used to offer those two rak`at whenever he entered her house

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 25 · Hajj (Pilgrimage)

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।