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सुनन अबू दाऊद

नंबर 491

नंबर 491किताब 2, नंबर 101
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ صَالِحٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يَحْيَى بْنُ أَزْهَرَ، وَابْنُ، لَهِيعَةَ عَنِ الْحَجَّاجِ بْنِ شَدَّادٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ الْغِفَارِيِّ، عَنْ عَلِيٍّ، بِمَعْنَى سُلَيْمَانَ بْنِ دَاوُدَ قَالَ فَلَمَّا خَرَجَ ‏.‏ مَكَانَ فَلَمَّا بَرَزَ ‏.‏
Abu Salih narrated this tradition with a different chain of transmitters to the same effect as reported by Sulaiman b. Dawud. But this version has the word KHARAJA (he went out) instead of BARAZA (proceeded)
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • DaifAl-Albani
  • DaifMuhammad Muhyi Al-Din Abdul Hamid
  • DaifShuaib Al Arnaut
  • DaifZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 2 · Prayer (Kitab Al-Salat)

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।