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जामे तिर्मिज़ी

नंबर 3645

नंबर 3645किताब 49, नंबर 41
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ، حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ الْعَوَّامِ، أَخْبَرَنَا الْحَجَّاجُ، هُوَ ابْنُ أَرْطَاةَ عَنْ سِمَاكِ بْنِ حَرْبٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ، قَالَ كَانَ فِي سَاقَىْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حُمُوشَةٌ وَكَانَ لاَ يَضْحَكُ إِلاَّ تَبَسُّمًا وَكُنْتُ إِذَا نَظَرْتُ إِلَيْهِ قُلْتُ أَكْحَلَ الْعَيْنَيْنِ وَلَيْسَ بِأَكْحَلَ ‏.‏ قَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ غَرِيبٌ مِنْ هَذَا الْوَجْهِ ‏.‏
Narrated Jabir bin Samurah:"The two shins of the Messenger of Allah (ﷺ) were thin, and he would not laugh except as a smile, and whenever I looked at him I would say: "He put kohl on his eyes,' but he (ﷺ) did not use kohl
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • DaifAhmad Muhammad Shakir
  • DaifAl-Albani
  • DaifZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 49 · Chapters on Virtues

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।