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जामे तिर्मिज़ी

नंबर 444

नंबर 444किताब 2, नंबर 297
وَرَوَاهُ سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ عَنِ الأَعْمَشِ، نَحْوَ هَذَا حَدَّثَنَا بِذَلِكَ، مَحْمُودُ بْنُ غَيْلاَنَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ آدَمَ، عَنْ سُفْيَانَ، عَنِ الأَعْمَشِ، ‏.‏ قَالَ أَبُو عِيسَى وَأَكْثَرُ مَا رُوِيَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي صَلاَةِ اللَّيْلِ ثَلاَثَ عَشْرَةَ رَكْعَةً مَعَ الْوِتْرِ وَأَقَلُّ مَا وُصِفَ مِنْ صَلاَتِهِ بِاللَّيْلِ تِسْعُ رَكَعَاتٍ ‏.‏
Narrator not mentioned:(Another chain with similar narration)
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 2 · The Book on Salat (Prayer)

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।