सीधे कंटेंट पर जाएँ
सुनन नसाई

नंबर 5515

नंबर 5515किताब 50, नंबर 88
أَخْبَرَنَا أَبُو عَاصِمٍ، قَالَ حَدَّثَنَا الْقَاسِمُ بْنُ كَثِيرٍ الْمُقْرِئُ، عَنِ اللَّيْثِ بْنِ سَعْدٍ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي حَبِيبٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ فِي دُعَائِهِ ‏ "‏ اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْقَبْرِ وَفِتْنَةِ الدَّجَّالِ وَفِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو عَبْدِ الرَّحْمَنِ هَذَا خَطَأٌ وَالصَّوَابُ سُلَيْمَانُ بْنُ سِنَانٍ ‏.‏
It was narrated from Sulaiman bin Yasar that he heard Abu Hurairah say:"I heard the Messenger of Allah [SAW] say in his supplication: 'Allahumma, inni a'udhu bika min fitnatil-qabri, wa fitnatid-dajjali, wa fitnatil-mahya wal-mamat (O Allah, I seek refuge with You from the trial of the grave, and the tribulation of the Dajjal, and the trials of life and death)
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • SahihZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 50 · The Book of Seeking Refuge with Allah

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।