أَخْبَرَنَا أَحْمَدُ بْنُ فَضَالَةَ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ، قَالَ أَنْبَأَنَا إِسْرَائِيلُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ، عَنْ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَتَعَوَّذُ مِنَ الْجُبْنِ وَالْبُخْلِ وَسُوءِ الْعُمُرِ وَفِتْنَةِ الصَّدْرِ وَعَذَابِ الْقَبْرِ .
It was narrated from 'Umar that:The Prophet [SAW] used to seek refuge with Allah from cowardice, miserliness, reaching the age of second childhood, the trials of the heart and the torment of the grave
स्रोत में दर्ज दर्जे
DaifAbu Ghuddah
DaifAl-Albani
HasanZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।