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सुनन नसाई

नंबर 3103

नंबर 3103किताब 25, नंबर 19
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ سُفْيَانَ، وَشُعْبَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا حَبِيبُ بْنُ أَبِي ثَابِتٍ، عَنْ أَبِي الْعَبَّاسِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَسْتَأْذِنُهُ فِي الْجِهَادِ فَقَالَ ‏"‏ أَحَىٌّ وَالِدَاكَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَفِيهِمَا فَجَاهِدْ ‏"‏ ‏.‏
It was narrated that 'Abdullah bin 'Amr said:"A man came to the Messenger of Allah (ﷺ) and asked him for permission to go for Jihad. He said: 'Are your parents alive?' He said: 'Yes.' He said: 'Then strive for their sake
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • Sahih - Agreed UponZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 25 · The Book of Jihad

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।