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सुनन नसाई

नंबर 3012

नंबर 3012किताब 24, नंबर 395
أَخْبَرَنَا إِسْحَاقُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ أَنْبَأَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، قَالَ حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَتْ قُرَيْشٌ تَقِفُ بِالْمُزْدَلِفَةِ وَيُسَمَّوْنَ الْحُمْسَ وَسَائِرُ الْعَرَبِ تَقِفُ بِعَرَفَةَ فَأَمَرَ اللَّهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى نَبِيَّهُ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَقِفَ بِعَرَفَةَ ثُمَّ يَدْفَعُ مِنْهَا فَأَنْزَلَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏{‏ ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ ‏}‏ ‏.‏
It was narrated that Aishah said:"The Quraish used to stand in Al-Muzdalifah and they called themselves Al-Hums, and the rest of Arabs stood in Arafat. Then Allah, Blessed and Most High, commanded his Prophet to stand in Arafat, and then move on from there. Allah, the Mighty and Sublime, revealed: 'Then depart from the place whence all the people depart
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • Sahih - Agreed UponZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 24 · The Book of Hajj

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।