सीधे कंटेंट पर जाएँ
सुनन नसाई

नंबर 1695

नंबर 1695किताब 20, नंबर 98
أَخْبَرَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ فَضَالَةَ بْنِ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدٌ، - يَعْنِي ابْنَ الْمُبَارَكِ - قَالَ حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ، - وَهُوَ ابْنُ سَلاَّمٍ - عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي كَثِيرٍ، قَالَ حَدَّثَنِي أَبُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، وَنَافِعٌ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ سَمِعَهُ يَقُولُ ‏ "‏ صَلاَةُ اللَّيْلِ رَكْعَتَيْنِ رَكْعَتَيْنِ فَإِذَا خِفْتُمُ الصُّبْحَ فَأَوْتِرُوا بِوَاحِدَةٍ ‏"‏ ‏.‏
It was narrated from Ibn 'Umar that:He heard the Messenger of Allah (ﷺ) say: "Prayer at night is two rak'ahs by two rak'ahs, then when you fear tat dawn will break, pray witr with one rak'ah
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • HasanZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 20 · The Book of Qiyam Al-Lail (The Night Prayer) and Voluntary Prayers During the Day

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।