सीधे कंटेंट पर जाएँ
सहीह मुस्लिम

नंबर 4970

नंबर 4970
وَحَدَّثَنِيهِ مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، بِهَذَا الإِسْنَادِ قَالَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ قَالَ سُفْيَانُ لاَ أَدْرِي هَذَا فِي الْحَدِيثِ أَمْ لاَ ‏.‏ يَعْنِي أَنْ يَتَخَوَّنَهُمْ أَوْ يَلْتَمِسَ عَثَرَاتِهِمْ ‏.‏
This tradition has been reported through anothee chain. 'Abdurahman, one of the sub-narrators, said "I do not know if it in the hadith or not", meaning (the words) "doubting their fidelity and spying into their lapses

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किसी किताब में नहीं रखी गईं

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।