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सहीह मुस्लिम

नंबर 4435

नंबर 4435
وَحَدَّثَنِي أَبُو الطَّاهِرِ، وَحَرْمَلَةُ، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، ح وَحَدَّثَنِي عَمْرٌو النَّاقِدُ، حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ بْنِ سَعْدٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ صَالِحٍ، ح وَحَدَّثَنَا عَبْدُ، بْنُ حُمَيْدٍ أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، عَنْ مَعْمَرٍ، كُلُّهُمْ عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِهَذَا الإِسْنَادِ ‏.‏ نَحْوَهُ ‏.‏
This hadith has been narrated on the authority of Zuhri with the same chain of transmitters

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किसी किताब में नहीं रखी गईं

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।