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सहीह मुस्लिम

नंबर 6430

नंबर 6430किताब 44, नंबर 259अरबी नंबरिंग 2514.02
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ الْقَوَارِيرِيُّ، وَمُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، وَابْنُ، بَشَّارٍ جَمِيعًا عَنِ ابْنِ مَهْدِيٍّ، قَالَ قَالَ ابْنُ الْمُثَنَّى حَدَّثَنِي عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ أَبِي عِمْرَانَ، الْجَوْنِيِّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الصَّامِتِ، عَنْ أَبِي ذَرٍّ، قَالَ قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ ائْتِ قَوْمَكَ فَقُلْ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ أَسْلَمُ سَالَمَهَا اللَّهُ وَغِفَارُ غَفَرَ اللَّهُ لَهَا ‏"‏ ‏.‏
Abu Dharr reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:To the tribe of Aslam Allah has granted safety and to the tribe of Ghifar Allah has granted pardon

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 44 · The Book of the Merits of the Companions

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।