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सहीह मुस्लिम

नंबर 6408

नंबर 6408किताब 44, नंबर 239अरबी नंबरिंग 2500
حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ الأَشْعَرِيُّ، وَأَبُو كُرَيْبٍ جَمِيعًا عَنْ أَبِي أُسَامَةَ، قَالَ أَبُو عَامِرٍ حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، حَدَّثَنِي بُرَيْدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ جَدِّهِ أَبِي بُرْدَةَ، عَنْ أَبِي مُوسَى، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ إِنَّ الأَشْعَرِيِّينَ إِذَا أَرْمَلُوا فِي الْغَزْوِ أَوْ قَلَّ طَعَامُ عِيَالِهِمْ بِالْمَدِينَةِ جَمَعُوا مَا كَانَ عِنْدَهُمْ فِي ثَوْبٍ وَاحِدٍ ثُمَّ اقْتَسَمُوهُ بَيْنَهُمْ فِي إِنَاءٍ وَاحِدٍ بِالسَّوِيَّةِ فَهُمْ مِنِّي وَأَنَا مِنْهُمْ ‏"‏ ‏.‏
Abu Musa reported that Allah's Messenger (ﷺ) said:When the Ash'arites run short of provisions in the campaigns or run short of food for their children in Medina they collect whatever is with them in the cloth and then partake equally from one vessel. They are from me and I am from them

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 44 · The Book of the Merits of the Companions

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।