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सहीह मुस्लिम

नंबर 5813

नंबर 5813किताब 39, नंबर 165अरबी नंबरिंग 537.03
حَدَّثَنِي أَبُو الطَّاهِرِ، وَحَرْمَلَةُ بْنُ يَحْيَى، قَالاَ أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ، عَنْ مُعَاوِيَةَ بْنِ الْحَكَمِ السُّلَمِيِّ، قَالَ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ أُمُورًا كُنَّا نَصْنَعُهَا فِي الْجَاهِلِيَّةِ كُنَّا نَأْتِي الْكُهَّانَ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ فَلاَ تَأْتُوا الْكُهَّانَ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ قُلْتُ كُنَّا نَتَطَيَّرُ ‏.‏ قَالَ ‏"‏ ذَاكَ شَىْءٌ يَجِدُهُ أَحَدُكُمْ فِي نَفْسِهِ فَلاَ يَصُدَّنَّكُمْ ‏"‏ ‏.‏
Mu'awiya b. al-Hakam as-Sulami reported:I said: Messenger of Allah, there were things we used to do in the pre-Islamic days. We used to visit Kahins, whereupon he said: Don't visit Kahins. I said: We used to take omens. He said: That is a sort of personal whim of yours, so let it not prevent you (from doing a thing)

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 39 · The Book of Greetings

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।