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सहीह मुस्लिम

नंबर 4865

नंबर 4865किताब 33, नंबर 161अरबी नंबरिंग 1876.07
وَحَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ يَعْنِي الثَّقَفِيَّ، ح وَحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ، بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، ح وَحَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عُمَرَ، حَدَّثَنَا مَرْوَانُ بْنُ مُعَاوِيَةَ، كُلُّهُمْ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي صَالِحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لَوْلاَ أَنْ أَشُقَّ عَلَى أُمَّتِي لأَحْبَبْتُ أَنْ لاَ أَتَخَلَّفَ خَلْفَ سَرِيَّةٍ ‏"‏ ‏.‏ نَحْوَ حَدِيثِهِمْ ‏.‏
It has been narrated on the authority of Abu Huraira that the Messenger of Allah (ﷺ) said:If it were not hard upon my Umma (to follow my example), I would not lag behind any expedition-as in the traditions gone before

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 33 · The Book on Government

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।