सीधे कंटेंट पर जाएँ
सहीह मुस्लिम

नंबर 4127

नंबर 4127किताब 22, नंबर 166अरबी नंबरिंग 1608.01
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ يُونُسَ، حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ، حَدَّثَنَا أَبُو الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، ح وَحَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، أَخْبَرَنَا أَبُو خَيْثَمَةَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ كَانَ لَهُ شَرِيكٌ فِي رَبْعَةٍ أَوْ نَخْلٍ فَلَيْسَ لَهُ أَنْ يَبِيعَ حَتَّى يُؤْذِنَ شَرِيكَهُ فَإِنْ رَضِيَ أَخَذَ وَإِنْ كَرِهَ تَرَكَ ‏"‏ ‏.‏
Jabir b. 'Abdullah (Allah be pleased with them) reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:He who has a partner in a dwelling or a garden, it is not lawful for him to sell that until he is permitted by his partner. If he (the partner) agrees, he should go in for that, and if he disapproves of that, he should abandon (the idea of selling it)

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 22 · The Book of Musaqah

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।