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सहीह मुस्लिम

नंबर 4066

नंबर 4066किताब 22, नंबर 105अरबी नंबरिंग 1588.01
حَدَّثَنَا أَبُو كُرَيْبٍ، مُحَمَّدُ بْنُ الْعَلاَءِ وَوَاصِلُ بْنُ عَبْدِ الأَعْلَى قَالاَ حَدَّثَنَا ابْنُ فُضَيْلٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ التَّمْرُ بِالتَّمْرِ وَالْحِنْطَةُ بِالْحِنْطَةِ وَالشَّعِيرُ بِالشَّعِيرِ وَالْمِلْحُ بِالْمِلْحِ مِثْلاً بِمِثْلٍ يَدًا بِيَدٍ فَمَنْ زَادَ أَوِ اسْتَزَادَ فَقَدْ أَرْبَى إِلاَّ مَا اخْتَلَفَتْ أَلْوَانُهُ ‏"‏ ‏.‏
Abu Huraira (Allah be pleased with him) reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:Dates are to be paid for by dates, wheat by wheat, barley by barley, salt by salt, like for like, payment being made on the spot. He who made an addition or demanded an addition, in fact, dealt in usury except in case where their classes differ

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 22 · The Book of Musaqah

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।