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सहीह मुस्लिम

नंबर 3799

नंबर 3799किताब 20, नंबर 29अरबी नंबरिंग 1510.01
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، وَزُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، قَالاَ حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ سُهَيْلٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ يَجْزِي وَلَدٌ وَالِدًا إِلاَّ أَنْ يَجِدَهُ مَمْلُوكًا فَيَشْتَرِيَهُ فَيُعْتِقَهُ ‏"‏ ‏.‏ وَفِي رِوَايَةِ ابْنِ أَبِي شَيْبَةَ ‏"‏ وَلَدٌ وَالِدَهُ ‏"‏ ‏.‏
Abu Huraira (Allah be pleased with him) reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:A son does not repay what he owes his father unless he buys him (the father) in case he is a slave and then emancipates him. In the narration transmitted by Ibn Abu Shaiba there is a slight change of words

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 20 · The Book of Emancipating Slaves

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।