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सहीह मुस्लिम

नंबर 2459

नंबर 2459किताब 12, नंबर 196अरबी नंबरिंग 1065.03
حَدَّثَنَا أَبُو الرَّبِيعِ الزَّهْرَانِيُّ، وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، قَالَ قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَبِي نَضْرَةَ، عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ تَكُونُ فِي أُمَّتِي فِرْقَتَانِ فَتَخْرُجُ مِنْ بَيْنِهِمَا مَارِقَةٌ يَلِي قَتْلَهُمْ أَوْلاَهُمْ بِالْحَقِّ ‏"‏ ‏.‏
Abu Sa'id al-Khudri reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:There would be two groups in my Ummah, and there would emerge another group (seceding itself from both of them), and the party nearer to the truth among the two would kill them (the group of the Khawarij)

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 12 · The Book of Zakat

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।