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सहीह मुस्लिम

नंबर 2322

नंबर 2322किताब 12, नंबर 59अरबी नंबरिंग 1002.01
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُعَاذٍ الْعَنْبَرِيُّ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ عَدِيٍّ، - وَهُوَ ابْنُ ثَابِتٍ - عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَزِيدَ، عَنْ أَبِي مَسْعُودٍ الْبَدْرِيِّ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الْمُسْلِمَ إِذَا أَنْفَقَ عَلَى أَهْلِهِ نَفَقَةً وَهُوَ يَحْتَسِبُهَا كَانَتْ لَهُ صَدَقَةً ‏"‏ ‏.‏
Abu Mas'ud reported Allah's Messenger (way peace be upon him) as saying:When a Muslim spends on his family seeking reward for it from Allah, it counts for him as sadaqa

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 12 · The Book of Zakat

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।