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सहीह मुस्लिम

नंबर 373

नंबर 373किताब 1, नंबर 280अरबी नंबरिंग 146
وَحَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ رَافِعٍ، وَالْفَضْلُ بْنُ سَهْلٍ الأَعْرَجُ، قَالاَ حَدَّثَنَا شَبَابَةُ بْنُ سَوَّارٍ، حَدَّثَنَا عَاصِمٌ، - وَهُوَ ابْنُ مُحَمَّدٍ الْعُمَرِيُّ - عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الإِسْلاَمَ بَدَأَ غَرِيبًا وَسَيَعُودُ غَرِيبًا كَمَا بَدَأَ وَهُوَ يَأْرِزُ بَيْنَ الْمَسْجِدَيْنِ كَمَا تَأْرِزُ الْحَيَّةُ فِي جُحْرِهَا ‏"‏ ‏.‏
It is narrated on the authority of Ibn 'Umar ('Abdullah b. 'Umar) that the Messenger of Allah (ﷺ) observed:Verily Islam started as something strange and it would again revert (to its old position) of being strange just as it started, and it would recede between the two mosques just as the serpent crawls back into its hole

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 1 · The Book of Faith

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।