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सहीह मुस्लिम

नंबर 171

नंबर 171किताब 1, नंबर 78अरबी नंबरिंग 45.02
وَحَدَّثَنِي زُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ حُسَيْنٍ الْمُعَلِّمِ، عَنْ قَتَادَةَ، عَنْ أَنَسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لاَ يُؤْمِنُ عَبْدٌ حَتَّى يُحِبَّ لِجَارِهِ - أَوْ قَالَ لأَخِيهِ - مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ ‏"‏ ‏.‏
It is narrated on the authority of Anas that the Prophet (may peace blessings be upon him) observed:By Him in whose Hand is my life, no, bondsman (truly) believes till he likes for his neighbour, or he (the Holy Prophet) said: for his brother, whatever he likes for himself

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 1 · The Book of Faith

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।