وَحَدَّثَنِي مَالِكٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّ رَجُلاً، نَادَى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا تَرَى فِي الضَّبِّ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم " لَسْتُ بِآكِلِهِ وَلاَ بِمُحَرِّمِهِ " .
Malik related to me from Abdullah ibn Dinar from Abdullah ibn Umar that a man called the Messenger of Allah and said, "Messenger of Allah, what do you think about lizards?" The Messenger of Allah, may Allah bless him and grant him peace, said, "I do not eat them, and I do not forbid them
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihSalim al-Hilali
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।