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मुवत्ता इमाम मालिक

नंबर 995

नंबर 995किताब 21, नंबर 37
حَدَّثَنِي يَحْيَى، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ، أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ، كَانَ يَحْمِلُ فِي الْعَامِ الْوَاحِدِ عَلَى أَرْبَعِينَ أَلْفِ بَعِيرٍ يَحْمِلُ الرَّجُلَ إِلَى الشَّامِ عَلَى بَعِيرٍ وَيَحْمِلُ الرَّجُلَيْنِ إِلَى الْعِرَاقِ عَلَى بَعِيرٍ فَجَاءَهُ رَجُلٌ مِنْ أَهْلِ الْعِرَاقِ فَقَالَ احْمِلْنِي وَسُحَيْمًا ‏.‏ فَقَالَ لَهُ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ نَشَدْتُكَ اللَّهَ أَسُحَيْمٌ زِقٌّ قَالَ لَهُ نَعَمْ ‏.‏
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • Mauquf DaifSalim al-Hilali
किताब 21 · Jihad

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।