حَدَّثَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ سَعْدِ بْنِ عَمَّارِ بْنِ سَعْدٍ الْمُؤَذِّنِ، حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، قَالَ كَانَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ يُكَبِّرُ بَيْنَ أَضْعَافِ الْخُطْبَةِ يُكْثِرُ التَّكْبِيرَ فِي خُطْبَةِ الْعِيدَيْنِ .
It was narrated from ‘Abdur-Rahman bin Sa’d bin ‘Ammar bin Sa’d, the Mu’adhdhin, that his father narrated, from his father, that his grandfather said:“The Prophet (ﷺ) used to say the Takbir between the two sermons and he used to say the Takbir a great deal in the sermon of ‘Eid.”
स्रोत में दर्ज दर्जे
DaifAl-Albani
DaifMuhammad Fouad Abd al-Baqi
DaifShuaib Al Arnaut
DaifZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।