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सुनन इब्न माजा

नंबर 4248

नंबर 4248किताब 37, नंबर 149
حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ حُمَيْدِ بْنِ كَاسِبٍ الْمَدَنِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ، حَدَّثَنَا جَعْفَرُ بْنُ بُرْقَانَ، عَنْ يَزِيدَ بْنِ الأَصَمِّ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ قَالَ ‏:‏ ‏ "‏ لَوْ أَخْطَأْتُمْ حَتَّى تَبْلُغَ خَطَايَاكُمُ السَّمَاءَ ثُمَّ تُبْتُمْ لَتَابَ عَلَيْكُمْ ‏"‏ ‏.‏
It was narrated from Abu Hurairah that the Prophet (ﷺ) said:“If you were to commit sin until your sins reach the heaven, then you were to repent, your repentance would be accepted.”
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • Hasan SahihAl-Albani
  • Hasan SahihMuhammad Fouad Abd al-Baqi
  • Sahih LighairihiShuaib Al Arnaut
  • HasanZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 37 · Zuhd

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।