حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رُمْحٍ، أَنْبَأَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّهُ أَخْبَرَهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يُصَلِّي الْعَصْرَ وَالشَّمْسُ مُرْتَفِعَةٌ حَيَّةٌ فَيَذْهَبُ الذَّاهِبُ إِلَى الْعَوَالِي وَالشَّمْسُ مُرْتَفِعَةٌ .
It was narrated from Anas bin Malik that:The Messenger of Allah used to pray 'Asr when the sun was still hot and high, and if a person were to go to the suburbs (of Al-Madinah) he would be able to reach it while the sun was still hot and high
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihAl-Albani
SahihMuhammad Fouad Abd al-Baqi
SahihShuaib Al Arnaut
Sahih MuslimZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।