जब इस सम्मानित सहाबी ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को यह आयत पढ़ते सुना, जिसमें यहूदियों और ईसाइयों के बारे में कहा गया है कि उन्होंने अपने धर्म गुरुओं और सन्यासियों को उपास्य बना लिया और यह अधिकार दे दिया कि अल्लाह के आदेश-निषेध के विरुद्ध अपने आदेश-निषेध जारी करें, तो उन्हें उसका अर्थ समझने में कठिनाई हुई, क्योंकि वह समझते थे कि इबादत केवल सजदा आदि ही का नाम है। अतः, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने स्पष्ट कर दिया कि धर्म गुरुओं और पादरियों की इबादत का एक रूप यह भी है कि अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेश के विरुद्ध, उनकी हराम की हुई हलाल चीज़ को हराम मान लिया जाए और उनकी हलाल की हुई हराम चीज़ को हलाल मान लिया जाए।
- उलेमा और दूसरी किसी सृष्टि का अल्लाह के आदेशों को बदलने में अनुसरण करना, यदि अनुसरणकर्ता को मालूम हो कि वे अल्लाह की शरीयत का स्पष्ट विरोध कर रहे हैं, महाशिर्क है।
- किसी चीज को हलाल या हराम करार देने का अधिकार केवल अल्लाह को प्राप्त है।
- इसमें शिर्क की बहुत सारी किस्मों में से एक किस्म यानी अनुसरण में शिर्क का बयान हुआ है।
- इससे पता चलता है कि अज्ञान को ज्ञान देना, धर्म सम्मत है।
- यह भी मालूम होता है कि इबादत के मायने बहुत ही व्यापक हैं। इसमें हर वह निहित एवं विदित कथन तथा काम शामिल है, जिसे अल्लाह पसंद करता है और जिससे वह खुश होता है।
- इसमें पादरियों और सन्यासियों की गुमराही का बयान हुआ है।
- यहूदियों और ईसाइयों के शिर्क को साबित किया गया है।
- बताया गया है कि समस्त रसूलों का मूल धर्म एक ही है और वह है एकेश्वरवाद।
- रचयिता की अवज्ञा करते हुए, किसी सृष्टि की आज्ञा का पालन करना दरअसल उसकी इबादत करना है।
- बताया गया है कि यदि किसी धर्म संबंधी बात का भाव समझ में न आए, तो ज्ञानियों से पूछ कर मालूम कर लेना अनिवार्य है।
- इससे सहाबियों का ज्ञान से असीम प्रेम मालूम होता है।
كتاب التوحيد، للإمام محمد بن عبد الوهاب، ت: د. دغش العجمي. مكتبة أهل الأثر, الطبعة الخامسة, 1435ه. الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي, ت: محمد بن أحمد سيد, مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424ه. الملخص في شرح كتاب التوحيد، للشيخ صالح الفوزان, دار العاصمة, الطبعة الأولى، 1422ه. سلسلة الأحاديث الصحيحة، للألباني, مكتبة المعارف, الطبعة الأولى, 1415ه. جامع الترمذي, ت: أحمد شاكر, مكتبة ومطبعة مصطفى البابي, الطبعة: الثانية، 1395ه.