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तशरीह के साथ हदीसें

कुफ़्र (अविश्वास)

7 हदीसें

जिस आदमी ने (अपने पिता को जानते हुए) यह दावा किया कि उसका पिता कोई और है, वह काफ़िर हो गया तथा जिसने किसी ऐसी चीज़ का दावा किया जो उसकी नहीं है, वह हममें से नहीं है तथा वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले और जिसने किसी व्यक्ति को काफ़िर कहकर पुकारा या अल्लाह का दुश्मन कहा, हालाँकि वह वैसा नहीं है तो उसकी यह बात उसी की ओर लौट आएगी।

عن أبي ذر رضي الله عنه مرفوعًا: (ليس من رجل ادَّعَى لغير أبيه -وهو يعلمه- إلا كفر، ومن ادعى ما ليس له، فليس منا وَلَيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ من النار، ومن دعا رجلا بالكفر، أو قال: عدو الله، وليس كذلك، إلا حَارَ عليه).
अबू ज़र्र (रज़ियल्लाहु अनहु) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हैं कि जिस आदमी ने (अपने पिता को जानते हुए) यह दावा किया कि उसका पिता कोई और है, वह काफ़िर हो गया तथा जिसने किसी ऐसी चीज़ का दावा किया जो उसकी नहीं है, वह हममें से नहीं है तथा वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले और जिसने किसी व्यक्ति को काफ़िर कहकर पुकारा या अल्लाह का दुश्मन कहा, हालाँकि वह वैसा नहीं है तो उसकी यह बात उसी की ओर लौट आएगी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में उस व्यक्ति के लिए भयानक चेतावनी और बड़ी ज़ोरदार धमकी है, जो निम्नलिखित कार्यों में से कोई एक कार्य करे। ऐसे में उस व्यक्ति के बारे में आप क्या कहेंगे, जो तीनों काम करता हो? पहला : कोई अपने पिता को जानता हो और उसका नसब साबित हो, इससे बावजूद उसे पिता न माने और जानते हुए अनजान बन जाए तथा किसी और को पिता कहने लगे या अपने कुल के अतिरिक्त किसी और कुल से अपना संबंध जोड़े। दूसरा : कोई जान-बूझकर किसी ऐसे नसब, धन, अधिकार, कार्य या ज्ञान का दावा करे, जो उसका या उसके पास न हो या फिर अपने अंदर कोई ऐसा गुण होने का झूठा दावा करे, जिसके द्वारा वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सके। इस व्यक्ति के लिए बड़ी भयानक यातना है। क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस प्रकार के व्यक्ति से अपना कोई संबंध न होने की बात कही है और उससे कहा है कि वह जहन्नम के अंदर अपना ठिकाना ग्रहण कर ले, जिसका वह हक़दार है। तीसरा : कोई किसी निर्दोष को काफ़िर, यहूदी, ईसाई या अल्लाह का दुश्मन कहे। इस तरह के व्यक्ति की कही हुई बात उसी की ओर लौट जाती है। क्योंकि वह खुद ही इन बुरी विशेषताओं का एक ऐसे मुसलमान की तुलना में अधिक हक़दार है, जो बुरे कामों से गाफ़िल हो।

हवाला

صحيح البخاري، دار طوق النجاة، ط 1422هـ. صحيح مسلم، ط دار إحياء التراث العربي، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي. تيسير العلام، للبسام، الناشر: مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة العاشرة، 1426هـ - 2006 م. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط دار الفكر بدمشق، الطبعة الأولى 1381هـ.

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लोगों के अंदर कुफ़्र की दो बातें पाई जाती रहेंगी : किसी के कुल पर कटाक्ष करना, तथा मरे हुए व्यक्ति पर विलाप करना।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «اثْنَتَانِ فِي النَّاسِ هُمَا بِهِمْ كُفْرٌ: الطَّعْنُ فِي النَّسَبِ، وَالنِّيَاحَةُ عَلَى الْمَيِّتِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "लोगों के अंदर कुफ़्र की दो बातें पाई जाती रहेंगी : किसी के कुल पर कटाक्ष करना, तथा मरे हुए व्यक्ति पर विलाप करना।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- लोगों के अंदर पाई जाने वाली दो बातों का ज़िक्र कर रहे हैं कि वह दरअसल अविश्वासपूर्ण कार्य एवं अज्ञानता काल के चरित्र हैं। ये दोनों कार्य हैं : 1- लोगों के नसब पर ताना कसना, उन्हें नीचा दिखाना और उनके प्रति घमंडी होना। 2- मुसीबत के समय अल्लाह के निर्णय से नाराज़ होकर ज़ोर-ज़ोर से रोना और व्याकुल होकर कपड़े फाड़ना।

फ़ायदे
  1. विनम्र रहने और अभिमान से बचने की प्रेरणा।
  2. मुसीबत के समय सब्र से काम लेना और अल्लाह के निर्णय से नाराज़ न होना अनिवार्य है।
  3. ऊपर बयान किए गए कार्यों का संबंध छोटे अविश्वास (कुफ़्र) से है। किसी के अंदर छोटे अविश्वास वाली कोई बात पाई जाए, तो वह इस्लाम के दायरे से बाहर निकल नहीं जाता। आदमी इस्लाम के दायरे से बाहर उसी समय निकलता है, जब बड़े अविश्वास (कुफ़्र) वाला कोई कार्य करे।
  4. इस्लाम ने नसब पर ताना कसने और इस प्रकार के तमाम कार्यों से रोका है, जो मुसलमानों के अंदर बिखराव पैदा करते हैं।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 82) (67). كتاب التوحيد، للإمام محمد بن عبد الوهاب (ص96). الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص279). الجديد في شرح كتاب التوحيد، للقرعاوي (ص315).

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कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर फ़ासिक़ होने का लांछन न लगाए। काफ़िर होने का लांछन भी न लगाए। क्योंकि अगर वह ऐसा न हुआ, तो यह लांछन उसी की ओर लौट आएगा।

عَنْ أَبِي ذَرٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «لاَ يَرْمِي رَجُلٌ رَجُلًا بِالفُسُوقِ، وَلاَ يَرْمِيهِ بِالكُفْرِ، إِلَّا ارْتَدَّتْ عَلَيْهِ، إِنْ لَمْ يَكُنْ صَاحِبُهُ كَذَلِكَ».
अबू ज़र रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर फ़ासिक़ होने का लांछन न लगाए। काफ़िर होने का लांछन भी न लगाए। क्योंकि अगर वह ऐसा न हुआ, तो यह लांछन उसी की ओर लौट आएगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस बात से सावधान किया है कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहे कि : तुम फ़ासिक़ हो, या तुम काफ़िर हो। क्योंकि अगर सामने वाला व्यक्ति फ़ासिक़ या काफ़िर न हुआ, तो कहने वाला व्यक्ति ही इस विशेषण का हक़दार हो जाएगा और उसकी कही हुई बात उसी की ओर लौट जाएगी। लेकिन, अगर वह वैसा ही हो जैसा कि उसने कहा, तो कहने वाले का कोई नुक़सान नहीं होगा क्योंकि उसकी बात दुरुस्त है।

फ़ायदे
  1. किसी शरई कारण के बिना किसी को काफ़िर या फ़ासिक़ कहना हराम है।
  2. लोगों पर कोई हुक्म लगाने से पहले सत्यापन वाजिब है।
  3. इब्न-ए-दक़ीक़ अल-ईद कहते हैं : किसी व्यक्ति को, जो सच-मुच काफ़िर न हो, काफ़िर कहने वालों के लिए यह बहुत बड़ी चेतावनी है। और वास्तव में यह बड़े दुविधा की बात है।
  4. इब्न-ए-हजर असक़लानी कहते हैं : किसी को काफ़िर या फ़ासिक़ कहने से उसके काफ़िर या फ़ासिक़ न हो जाने से यह लाज़िम नहीं आता कि कहने वाला ऐसा कहने के कारण गुनाहगार नहीं होगा। दरअसल इसके बारे में तफ़सील है। अगर सामने वाले का शुभचिंतन या उसका हाल बताकर किसी और का शुभचिंतन उद्देश्य हो, तो जायज़ है। अगर शर्म दिलाना, बदनाम करना और कष्ट देना उद्देश्य हो, तो जायज़ नहीं है। क्योंकि शरीयत ने उसको आदेश पर्दा डालने, शिक्षा देने और समझाने-बुझाने का दिया है और यह काम नर्मी से हो जाए, तो सख़्ती करना जायज़ नहीं है। बल्कि सख़्ती करने से कभी-कभी इन्सान भड़क जाता है और उस काम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता है। क्योंकि बहुत-से लोग अहंकारी होते हैं और उनका अहंकार उस समय विशेष रूप से जाग उठता है, जब बताने वाला उनसे कमतर हो।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 15) (6045). صحيح مسلم (1/ 79) (61). نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1073). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (18/ 446). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (3/ 82). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 220). التنوير شرح الجامع الصغير، للصنعاني (9/ 275).

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उसने कभी यह नहीं कहा : ऐ मेरे रब! प्रतिफल के दिन मेरे गुनाह माफ़ कर देना।

عَنْ عَائِشَةَ رضي الله عنها قَالَتْ: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ، ابْنُ جُدْعَانَ كَانَ فِي الْجَاهِلِيَّةِ يَصِلُ الرَّحِمَ، وَيُطْعِمُ الْمِسْكِينَ، فَهَلْ ذَاكَ نَافِعُهُ؟ قَالَ: «لَا يَنْفَعُهُ، إِنَّهُ لَمْ يَقُلْ يَوْمًا: رَبِّ اغْفِرْ لِي خَطِيئَتِي يَوْمَ الدِّينِ».
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! इब्न-ए-जुदआन जाहिलियत के ज़माने में रिश्ते-नातों का ख़्याल रखता था और निर्धनों को खाना खिलाता था। क्या यह बातें उसके लिए लाभकारी सिद्ध होंगी? आपने कहा : "इन कामों का उसे कोई लाभ नहीं मिलेगा। उसने कभी यह नहीं कहा : ऐ मेरे रब! प्रतिफल के दिन मेरे गुनाह माफ़ कर देना।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

इब्ने-ए-जुदआन इस्लाम से पहले क़ुरैश का एक सरदार था। उसने कई अच्छे काम किए थे। जैसे रिश्ते-नातों का ख़याल रखता था और निर्धनों को खाना खिलाता था। वह इस तरह के कई अन्य काम भी किया करता था, जिनकी प्रेरणा खुद इस्लाम ने भी दी है। आपने उसके बारे में बताया कि यह काम आख़िरत में उसके लिए कुछ लाभकारी नहीं होंगे। इसका कारण यह है कि उसका अल्लाह पर विश्वास नहीं था और उसने कभी नहीं कहा था कि ऐ मेरे रब! क़यामत के दिन मेरे गुनाहों को माफ़ कर देना।

फ़ायदे
  1. ईमान की फ़ज़ीलत का बयान तथा यह कि ईमान कर्मों को ग्रहण योग्य होने के लिए शर्त है।
  2. कुफ्र (अविश्वास) के मनहूस होने का बयान तथा यह कि अविश्वास इन्सान के अच्छे कर्मों को नष्ट कर देता है।
  3. अविश्वासियों को आख़िरत में उनके कर्मों का कोई लाभ नहीं मिलेगा। क्योंकि वे अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते।
  4. कुफ़्र की हालत में किए गए इन्सान के आमाल, उसके इस्लाम ग्रहण कर लेने की अवस्था में उसके हक़ में लिखे जाते हैं और उसे उनका प्रतिफल भी दिया जाता है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 196) (214)، شرح النووي على مسلم (3/87)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 459)، إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري (4/ 170)، التنوير شرح الجامع الصغير (2/364)، فتح المنعم (2/54)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (3/ 455).

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क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे रब ने क्या कहा?” लोगों ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। (आपने फ़रमाया कि अल्लाह ने) फ़रमाया : “मेरे बंदों में से कुछ ने मुझपर ईमान लाने वाले और कुछ ने कुफ़्र करने वाले बनकर सुबह की

عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ الجُهَنِيِّ رضي الله عنه أَنَّهُ قَالَ: صَلَّى لَنَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَاةَ الصُّبْحِ بِالْحُدَيْبِيَةِ عَلَى إِثْرِ سَمَاءٍ كَانَتْ مِنَ اللَّيْلَةِ، فَلَمَّا انْصَرَفَ أَقْبَلَ عَلَى النَّاسِ، فَقَالَ: «هَلْ تَدْرُونَ مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ؟» قَالُوا: اللهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ، قَالَ: «أَصْبَحَ مِنْ عِبَادِي مُؤْمِنٌ بِي وَكَافِرٌ، فَأَمَّا مَنْ قَالَ: مُطِرْنَا بِفَضْلِ اللهِ وَرَحْمَتِهِ، فَذَلِكَ مُؤْمِنٌ بِي وَكَافِرٌ بِالْكَوْكَبِ، وَأَمَّا مَنْ قَالَ: بِنَوْءِ كَذَا وَكَذَا، فَذَلِكَ كَافِرٌ بِي وَمُؤْمِنٌ بِالْكَوْكَبِ».
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं : हुदैबिया में रात में बारिश होने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें लेकर फ़ज्र की नमाज़ अदा की। सलाम फेरने के बाद लोगों की ओर मुंह करके फ़रमाया : “क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे रब ने क्या कहा?” लोगों ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। (आपने फ़रमाया कि अल्लाह ने) फ़रमाया : “मेरे बंदों में से कुछ ने मुझपर ईमान लाने वाले और कुछ ने कुफ़्र करने वाले बनकर सुबह की। जिसने कहा कि अल्लाह की कृपा व रहमत से हमपर बारिश हुई तो वह मुझपर ईमान लाने वाला और नक्षत्रों को नकारने वाला है और जिसने कहा कि अमुक-अमुक नक्षत्रों के कारण हमपर बारिश हुई तो वह मेरे साथ कुफ़्र करने वाला और नक्षत्रों पर ईमान लाने वाला ठहरा।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हुदैबिया के स्थान पर सुबह की नमाज़ पढ़ी। हुदैबिया मक्का के निकट एक बस्ती का नाम है। उस दिन रात को बारिश हुई थी। जब आपने नमाज़ पूरी कर ली और सलाम फेरा तो लोगों की ओर मुँह किया और उनसे पूछा : क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे सर्वशक्तिमान एवं महान रब ने क्या कहा है? लोगों ने उत्तर दिया : अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते हैं। यह सुन आपने कहा : अल्लाह ने बताया है कि वर्षा होते समय लोग दो प्रकार में बँट जाते हैं। कुछ लोग अल्लाह पर विश्वास रखते हैं और कुछ लोग उसके प्रति अविश्वास व्यक्त करते हैं। ऐसे में जिसने कहा कि हमें अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से बारिश मिली और इस तरह उसने बारिश देने वाला अल्लाह को माना, वह अल्लाह पर विश्वास रखने वाला है और नक्षत्रों के प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला है। इसके विपरीत जिसने कहा कि हमें अमुक नक्षत्र के कारण बारिश मिली, वह अल्लाह के प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला और नक्षत्र पर विश्वास रखने वाला है। याद रहे कि इस तरह से नक्षत्र की ओर बारिश की निस्बत करना छोटा कुफ़्र है, क्योंकि अल्लाह ने नक्षत्र को बारिश का शरई एवं सांसारिक सबब नहीं बनाया है। लेकिन जिसने बारिश होने आदि लौकिक घटनाओं का संबंध यह समझकर नक्षत्रों के निकलने या डूबने की से जोड़ा कि यही वास्तविक कारक हैं, तो वह बड़ा कुफ़्र करने वाला है।

फ़ायदे
  1. बारिश होने के बाद यह कहना मुसतहब है कि हमें अल्लाह के अनुग्रह और उसकी रहमत से बारिश मिली।
  2. जिसने बारिश बरसाने आदि घटनाओं का संबंध नक्षत्रों से जोड़ा और उनको इन घटनाओं का कारक माना, उसने बड़ा कुफ़्र किया। लेकिन अगर उसे केवल सबब माना, तो उसने छोटा शिर्क किया, क्योंकि यह न तो शरई सबब है और न भौतिक।
  3. नेमत की जब नाशुक्री हो, तो वह अविश्वास का सबब बन जाती है और जब उसका शुक्र अदा किया जाए, तो वह ईमान का सबब बन जाती है।
  4. यह कहना मना है कि हमें अमुक नक्षत्र के कारण बारिश मिली, चाहे इससे मुराद समय ही क्यों न लिया गया हो। ऐसा दरअसल शिर्क का द्वार बंद करने के लिए किया गया है।
  5. नेमतों की प्राप्ति और अप्रिय चीज़ों से बचाव के संबंध में दिल का संबंध अल्लाह से होना ज़रूरी है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 169) (846)، صحيح مسلم (1/ 83) (71)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (2/ 484)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 260).

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आदमी के बीच तथा कुफ़्र एवं शिर्क के बीच की रेखा नमाज़ छोड़ना है।

عن جابرٍ رضي الله عنه قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: «إِنَّ بَيْنَ الرَّجُلِ وَبَيْنَ الشِّرْكِ وَالْكُفْرِ تَرْكَ الصَّلَاةِ».
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना है : "आदमी के बीच तथा कुफ़्र एवं शिर्क के बीच की रेखा नमाज़ छोड़ना है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़र्ज़ नमाज़ छोड़ने से सावधान किया है और बताया है कि इन्सान तथा कुफ़्र एवं शिर्क में पड़ने के बीच जो चीज़ खड़ी है, वह है नमाज़ छोड़ना। नमाज़ इस्लाम का दूसरा स्तंभ और एक बहुत ही महत्वपूर्ण फ़रीज़ा (कर्तव्य) है। जिसने इसे इसकी अनिवार्यता का इनकार करते हुए छोड़ दिया, वह काफ़िर हो गया, इस बात पर सारे मुसलमान एकमत हैं। अगर किसी ने सुस्ती के कारण भी इसे पूरे तौर पर छोड़ दिया, तो वह भी काफ़िर है। इस बात पर सहाबा का इजमा (एकमत) नक़ल किया गया है। लेकिन अगर कभी छोड़ दे और कभी पढ़ ले, तो वह इस सख़्त चेतावनी की ज़द में होगा।

फ़ायदे
  1. नमाज़ तथा उसकी पाबंदी करने का महत्व। क्योंकि यही कुफ़्र एवं ईमान के बीच अंतर करने वाली चीज़ है।
  2. नमाज़ छोड़ने तथा उसे नष्ट करने पर सख़्त चेतावनी।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 88) (82)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 271)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (2/ 622).

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वह वचन, जो हमारे और उनके बीच है, नमाज़ है। जिसने इसे छोड़ दिया, उसने कुफ़्र किया।

عن بريدة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «إِنَّ الْعَهْدَ الَّذِي بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمُ الصَّلَاةُ، فَمَنْ تَرَكَهَا فَقَدْ كَفَرَ».
बुरैदा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "वह वचन, जो हमारे और उनके बीच है, नमाज़ है। जिसने इसे छोड़ दिया, उसने कुफ़्र किया।"
इसे तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि मुसलमानों और दूसरों अर्थाथ काफ़िरों और मुनाफ़िकों के बीच जो वचन है, वह नमाज़ है। जिसने नमाज़ छोड़ दी, उसने कुफ़्र किया।

फ़ायदे
  1. नमाज़ का महत्व तथा यह कि नमाज़ मोमिन तथा काफ़िर के बीच अंतर करने वाली चीज़ है।
  2. इस्लाम के अहकाम इन्सान के ज़ाहिरी हाल से साबित होंगे, बातिन से नहीं।
हवाला

سنن النسائي (1/ 231) (463)، سنن الترمذي (4/ 365) (2621)، سنن ابن ماجه (2/ 181) (1079)، مسند أحمد (38/ 20) (22937)، فيض القدير (4/ 395)، ذخيرة العقبى في شرح المجتبى (6/ 192) (6/ 193).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com