عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ رضي الله عنهما قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ غَدَاةَ الْعَقَبَةِ وَهُوَ عَلَى نَاقَتِهِ: «الْقُطْ لِي حَصًى» فَلَقَطْتُ لَهُ سَبْعَ حَصَيَاتٍ، هُنَّ حَصَى الْخَذْفِ، فَجَعَلَ يَنْفُضُهُنَّ فِي كَفِّهِ وَيَقُولُ: «أَمْثَالَ هَؤُلَاءِ فَارْمُوا» ثُمَّ قَالَ: «أَيُّهَا النَّاسُ، إِيَّاكُمْ وَالْغُلُوَّ فِي الدِّينِ، فَإِنَّما أَهْلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ الْغُلُوُّ فِي الدِّينِ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अक़बा की सुबह, जबकि आप अपनी ऊँटनी पर सवार थे, फ़रमाया : "मेरे लिए कुछ कंकड़ी चुनो।" चुनांचे मैंने आपके लिए सात कंकड़ी चुने, जो चने के दाने के बराबर थे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें अपनी हथेली में रखकर झाड़ने लगे और कहने लगे : "इसी तरह के कंकड़ी मारा करो।" फिर फ़रमाया : "लोगो, दीन में अतिशयोक्ति से बचो। क्योंकि दीन में इसी अतिशयोक्ति ने तुमसे पहले लोगों का विनाश किया है।"
इसे इब्न-ए-माजह, नसई और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा बता रहे हैं कि वह हज्जतुल वदा के अवसर पर, क़ुरबानी के दिन, जमरा अक़बा में कंकड़ी मारने की सुबह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ थे। इसी दौरान आपने उनको कुछ कंकड़ी चुनने का आदेश दिया। चुनांचे उन्होंने आपके लिए सात कंकड़ी चुने। हर कंकड़ चने के दाने के बराबर था। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन कंकड़ीयों को अपनी हथेली पर रखकर हिलाया और फ़रमाया : इसी आकार के कंकड़ी मारा करो। उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने धार्मिक मामलों में अतिशयोक्ति से काम लेने और सीमा का उल्लंघन करने से मना किया। क्योंकि इसी अतिशयोक्ति और सीमा के उल्लंघन ने पिछली उम्मतों का विनाश किया है।
फ़ायदे
- दीन में अतिशयोक्ति की मनाही, उसके बुरे अंजाम और इस बात का बयान कि दीन में अतिशयोक्ति विनाश का कारण है।
- पिछली उम्मतों की ग़लतियों से बचने के लिए उनसे शिक्षा ग्रहण करना चाहिए।
- सुन्नत के अनुसरण की प्रेरणा।
हवाला
سنن النسائي (5/ 268)(3057).
سنن ابن ماجه (4/ 228) (3029).
مسند أحمد (5/ 298) (3248).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص165).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص179).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن جابر رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن النُّشْرَةِ؟ فقال: هي من عمل الشيطان.
जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से जादू द्वारा जादू के उपचार के बारे में पूछा गया, तो फ़रमायाः "यह शैतानी कार्य है।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से जादू किए हुए व्यक्ति का उपचार जाहिलियत के ज़माने में प्रचलित विशेष पद्धति, जैसे जादू द्वारा जादू का इलाज, से करने के बारे में पूछा गया, तो आपने उत्तर दिया : यह शैतानी कार्य है या शैतान द्वारा संपन्न होने वाला कार्य है, क्योंकि इस उपचार के लिए विभिन्न जादूई पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं तथा शैतानी सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं। अतः यह शिर्क एवं हराम है। जहाँ तक जायज़ तरीके से जादू के उपचार की बात है, तो ऐसा दम करके, जादू की हुई वस्तुओं को ढूँढ निकालने के बाद क़ुरआन पढ़ते हुए हाथ से खोलकर अथवा जायज़ दवाओं के द्वारा हो सकता है।
फ़ायदे
- यदि वर्जित कर्म में फँस जाने का डर हो, तो हर उस काम के बारे में जिसका जायज़ या नाजायज़ होना समझ में न आए, उलेमा से पूछ लेना धर्म सम्मत है।
- जाहिलियत में जिस पद्धति से जादू का उपचार किया जाता था, उससे उपचार करने की मनाही आई है, क्योंकि वह जादू पर आधारित था और जादू करना या कराना कुफ्र है।
- जितने भी शैतानी कर्म हैं, सब हराम हैं।
हवाला
1- الملخص في شرح كتاب التوحيد، صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، دار العاصمة، الرياض، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2001م.
2- الجديد في شرح كتاب التوحيد، محمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي، تحقيق: محمد بن أحمد سيد، مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424هـ - 2003م.
3- سنن أبي داود، سليمان بن الأشعث أبوداود، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، المكتبة العصرية، صيدا، بيروت.
4- مسند الإمام أحمد بن حنبل، أحمد بن حنبل أبو عبدالله الشيباني، تحقيق: شعيب الأرنؤوط و عادل مرشد، وآخرون، تحت إشراف: عبد الله بن عبد المحسن التركي، مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م.
5- سلسلة الأحاديث الصحيحة وشيء من فقهها وفوائدها، محمد ناصر الدين الألباني، مكتبة المعارف للنشر والتوزيع، الرياض.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لاَ عَدْوَى وَلاَ طِيَرَةَ، وَلاَ هَامَةَ وَلاَ صَفَرَ، وَفِرَّ مِنَ المَجْذُومِ كَمَا تَفِرُّ مِنَ الأَسَدِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "कोई संक्रामकता नहीं, अपशगुनता नहीं, उल्लू का कोई कुप्रभाव नहीं और सफ़र मास में कोई दोष नहीं। कोढ़ के रोगी से वैसे ही भागो, जैसे शेर से भागते हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अज्ञानता काल की कुछ चीज़ों का ज़िक्र उनसे सावधान करने और यह बताने के लिए किया है कि सब कुछ अल्लाह के हाथ में है, और कुछ भी उसकी मर्ज़ी और निर्णय से हटकर नहीं होता। यह चीज़ें हैं :
1- अज्ञानता काल के लोग समझते थे कि बीमारियाँ अपने आपमें संक्रामक हुआ करती हैं। अतः अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रकार का विश्वास रखने से मना कर दिया, कि कोई बीमारी स्वभाविक रूप से एक बीमार व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक जाती है। इस कायनात का संचालक एकमात्र अल्लाह है, वही बीमारी देता और ठीक करता है, यह सब कुछ उसके इरादे एवं फ़ैसले के अनुसार हुआ करता है।
2- अज्ञानता काल के लोग जब किसी यात्रा में या व्यवसाय के लिए निकलते, तो किसी चिड़िया को भगाते। वह उड़कर दाईं ओर जाती, तो खुश हो जाते। लेकिन अगर बाईं ओर जाती, तो बुरा शगुन लेकर लौट जाते। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस तरह चिड़िया उड़ाकर बुरा शगुन लेने से मना फ़रमाया और बताया कि यह एक ग़लत धारणा है।
3- अज्ञानता काल के लोग कहते थे : किसी घर पर उल्लू बैठ जाए, तो घर वाले मुसीबत में पड़ जाते हैं। लेकिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रकार का बुरा शगुन लेने से भी मना फ़रमा दिया।
4- आपने सफ़र महीने से बुरे शगुन लेने से भी मना फ़रमाया। सफ़र चाँद के महीनों में दूसरा महीना है। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि सफ़र एक कीड़ा है, जो जानवर या इन्सान के पेट में पैदा हो जाता है। अरबों का मानना था कि यह कीड़ा खुजली से भी अधिक संक्रमित होता है। अतः आपने इस प्रकार की धारणा का खंडन कर दिया।
5- आपने कोढ़ की बीमारी वाले इन्सान से उसी तरह भागने का आदेश दिया है, जिस तरह शेर से भागा जाता है। यह हदीस सावधानी बरतने, सुरक्षित रहने का प्रयास करने और अल्लाह के बताए हुए साधनों का प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। कोढ़ दरअसल एक बीमारी है, जिसका शिकार हो जाने के बाद इन्सान के शरीर के अंग गलने लगते हैं।
फ़ायदे
- अल्लाह पर तवक्कुल और भरोसा करना अनिवार्य है तथा इसके साथ ही शरीयत सम्मत साधनों का उपयोग करना भी ज़रूरी है।
- इस बात पर ईमान रखना ज़रूरी है कि इस कायनात में जो कुछ होता है, अल्लाह की तक़दीर और उसके निर्णय के अनुसार होता है, और दुनिया के सारे साधन अल्लाह के हाथ में हैं। वही उनको प्रभावकारी बनाता है या उनको प्रभाव रहित बनाता है।
- जो लोग काले एवं लाल आदि रंगों, कुछ संख्याओं, नामों, व्यक्तियों एवं विक्लाँग लोगों से बुरा शगुन लेते हैं, उनका ऐसा करना ग़लत है।
- कुष्ठ रोग और इस तरह की अन्य संक्रामक बीमारियों से पीड़ित लोगों के पास जाने की मनाही दरअसल उन कारणों में से एक है, जिनकी कोख से आम तौर पर अल्लाह के आदेश से नतीजे सामने आया करते हैं। देखा जाए तो कारणों का अपना कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता, बल्कि यदि अल्लाह चाहे तो उनकी प्रभावशीलता को समाप्त कर उन्हें अप्रभावी बना सकता है और यदि चाहे तो उनका प्रभाव बाक़ी रखकर उन्हें प्रभावी रहने दे सकता है।
हवाला
صحيح البخاري (7/ 126) (5707).
صحيح مسلم (4/ 1742) (2220).
فتح المجيد شرح كتاب التوحيد، لعبد الرحمن التميمي (ص307).
القول المفيد على كتاب التوحيد، لابن عثيمين (1/ 565).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص228).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص253).
التمهيد لشرح كتاب التوحيد، لصالح آل الشيخ (ص77).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللَّهِ بنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَيْسَ مِنَّا مَنْ لَطَمَ الخُدُودَ، وَشَقَّ الجُيُوبَ، وَدَعَا بِدَعْوَى الجَاهِلِيَّةِ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "वह व्यक्ति हममें से नहीं, जो गालों पर थप्पड़ मारे, गिरेबान फाड़े और जाहिलियत का कोई बोल बोले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अज्ञानता काल के लोगों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यों से मना और सावधान किया है। आपने फ़रमाया कि निम्नलिखित काम करने वाले लोग हम में से नहीं हैं :
1- गाल पीटने वाला। वैसे तो चेहरे के अन्य भागों को पीटना भी मनाही के दायरे में आता है, लेकिन चेहरे का ज़िक्र ख़ास तौर से इसलिए किया गया है कि आम तौर से गाल ही पीटा जाता है।
2- अत्यधिक व्याकुलता के कारण वस्त्र का वह भाग (गिरेबान) फाड़ देना जहाँ से सिर प्रविष्ट होता है।
3- अज्ञानता (जाहिलियत) के युग के लोगों की तरह विलाप करना, जैसे 'हाय-हाय' और 'बर्बादी' की पुकार लगाना, और रोना-धोना तथा शोक गीत गाना।
फ़ायदे
- इस हदीस में दी गई धमकी यह बताती है कि ये कार्य कबीरा गुनाहों के दायरे में आते हैं।
- मुसीबत पर सब्र करना ज़रूरी और अल्लाह के कष्टदायक निर्णयों पर नाराज़गी दिखाना और इसका इज़हार रोने-धोने, मातम, बाल मुंडवाने और गिरेबान फ़ाड़ने आदि द्वारा करना हराम है।
- इस्लाम-पूर्व युग की उन प्रथाओं का अनुकरण करना निषिद्ध है, जिन्हें शरीयत द्वारा मान्यता नहीं दी गई है।
- दुखी होने और रोने में कोई हर्ज नहीं है। यह अल्लाह के फ़ैसले के प्रति सब्र करने के विपरीत नहीं है। बल्कि यह दया है, जिसे अल्लाह ने रिश्तेदारों और दोस्तों के दिलों में रख दिया है।
- एक मुसलमान पर वाजिब है कि अल्लाह के फ़ैसले से ख़ुश रहे। अगर खुश नहीं रह पाता है, तो सब्र वाजिब है।
हवाला
صحيح البخاري (2/ 81) (1294).
صحيح مسلم (1/ 99) (103).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص287).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (2/ 379) .
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عمران بن حصين رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «لَيْسَ مِنَّا مَنْ تَطَيَّرَ أَوْ تُطُيِّرَ لَهُ، أَوْ تَكَهَّنَ أَوْ تُكُهِّنَ لَهُ، أَوْ سَحَرَ أَوْ سُحِرَ لَهُ، وَمَنْ عَقَدَ عُقْدَةً، وَمَنْ أَتَى كَاهِنًا فَصَدَّقَهُ بِمَا يَقُولُ فَقَدْ كَفَرَ بِمَا أُنْزِلَ عَلَى مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ».
इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "वह व्यक्ति हममें से नहीं, जिसने अपशगुन लिया अथवा जिसके लिए अपशगुन लिया गया, जिसने ओझा वाला कार्य किया अथवा ओझा वाला कार्य किसी से करवाया, जिसने जादू किया या जादू करवाया। तथा जिसने कोई गिरह लाई और जो किसी ओझा के पास गया और उसकी बात को सच माना, उसने उस शरीयत का इनकार किया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी गई है।"
इसे बज़्ज़ार ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ काम करने वाले अपनी उम्मत के कुछ लोगों को यह कहकर चेतावनी दी है कि वे हममें से नहीं हैं। ये काम कुछ इस प्रकार हैं:
1- ऐसा व्यक्ति जिसने अपशगुन लिया या जिसके लिए अपशगुन लिया गया। अरब के लोग कोई काम शुरू करते समय पक्षी को छोड़ते थे। पक्षी अगर दाएँ उड़ता, तो अच्छा शगुन लेते और जिस काम का इरादा होता, उसे करते। लेकिन अगर बाएँ उड़ता, तो बुरा शगुन लेते और जो काम करना चाहते, उसे छोड़ देते। यह काम न तो खुद करना जायज़ है और न किसी से करवाना जायज़ है। इसके अंदर किसी भी चीज़ से लिया जाने वाला हर अपशगुन दाख़िल है। चाहे उस चीज़ का संबंध सुनने से हो या देखने से हो, अथवा वह चीज़ चिड़िया हो, जानवर हो, विकलांग लोग हों, संख्या हों या दिन आदि हों, सभी अपशगुन अमान्य है।
2- ऐसा व्यक्ति जिसने खुद ओझा वाला कार्य किया या किसी से ओझा वाला कार्य करवाया। जिसने नक्षत्रों आदि का सहारा लेकर ग़ैब की बात जानने का दावा किया या फिर किसी ऐसे व्यक्ति के पास गया, जो ग़ैब की बात जानने का दावा करता हो और उसकी बात को सच भी माना, उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी गई शिक्षाओं के प्रति अविश्वास व्यक्त किया।
3- ऐसा व्यक्ति जिसने किसी को लाभ पहुँचाने या किसी की हानि करने के उद्देश्य से जादू किया या जादू करवाया या नाजायज़ मंत्र आदि का उच्चारण करके धागा आदि पर गिरह लगाई तथा फूँक मारी।
फ़ायदे
- अल्लाह पर भरोसा करने तथा अल्लाह की बनाई हुई तक़दीर पर विश्वास रखने की अनिवार्यता और अपशगुन, जादू तथा कहानत (ओझा का काम) आदि करने या किसी से करवाने का हारम होना।
- ग़ैब की बात जानने का दावा करना शिर्क तथा तौहीद के विपरीत है।
- ओझाओं के द्वारा कही गई बात को सच मानना और उनके पास जाना हराम है। इसी संदर्भ में हथेली और प्याली को पढ़ना तथा इनसान के सौभाग्य एवं दुर्भाग्य को नक्षत्रों से जोड़ना आदि भी शामिल हैं, यद्यपि यह सब कार्य जानकारी के लिए किए गए हों।
हवाला
مسند البزار = البحر الزخار (9/ 52) (3578).
شرح السنة للبغوي (12/ 182).
مجموع الفتاوى (35/ 173).
القول المفيد على كتاب التوحيد، لابن عثيمين (1/ 543).
التمهيد لشرح كتاب التوحيد، لصالح آل الشيخ (ص315).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص242).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص217).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي ذر رضي الله عنه مرفوعًا: (ليس من رجل ادَّعَى لغير أبيه -وهو يعلمه- إلا كفر، ومن ادعى ما ليس له، فليس منا وَلَيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ من النار، ومن دعا رجلا بالكفر، أو قال: عدو الله، وليس كذلك، إلا حَارَ عليه).
अबू ज़र्र (रज़ियल्लाहु अनहु) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हैं कि जिस आदमी ने (अपने पिता को जानते हुए) यह दावा किया कि उसका पिता कोई और है, वह काफ़िर हो गया तथा जिसने किसी ऐसी चीज़ का दावा किया जो उसकी नहीं है, वह हममें से नहीं है तथा वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले और जिसने किसी व्यक्ति को काफ़िर कहकर पुकारा या अल्लाह का दुश्मन कहा, हालाँकि वह वैसा नहीं है तो उसकी यह बात उसी की ओर लौट आएगी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में उस व्यक्ति के लिए भयानक चेतावनी और बड़ी ज़ोरदार धमकी है, जो निम्नलिखित कार्यों में से कोई एक कार्य करे। ऐसे में उस व्यक्ति के बारे में आप क्या कहेंगे, जो तीनों काम करता हो?
पहला : कोई अपने पिता को जानता हो और उसका नसब साबित हो, इससे बावजूद उसे पिता न माने और जानते हुए अनजान बन जाए तथा किसी और को पिता कहने लगे या अपने कुल के अतिरिक्त किसी और कुल से अपना संबंध जोड़े।
दूसरा : कोई जान-बूझकर किसी ऐसे नसब, धन, अधिकार, कार्य या ज्ञान का दावा करे, जो उसका या उसके पास न हो या फिर अपने अंदर कोई ऐसा गुण होने का झूठा दावा करे, जिसके द्वारा वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सके। इस व्यक्ति के लिए बड़ी भयानक यातना है। क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस प्रकार के व्यक्ति से अपना कोई संबंध न होने की बात कही है और उससे कहा है कि वह जहन्नम के अंदर अपना ठिकाना ग्रहण कर ले, जिसका वह हक़दार है।
तीसरा : कोई किसी निर्दोष को काफ़िर, यहूदी, ईसाई या अल्लाह का दुश्मन कहे। इस तरह के व्यक्ति की कही हुई बात उसी की ओर लौट जाती है। क्योंकि वह खुद ही इन बुरी विशेषताओं का एक ऐसे मुसलमान की तुलना में अधिक हक़दार है, जो बुरे कामों से गाफ़िल हो।
हवाला
صحيح البخاري، دار طوق النجاة، ط 1422هـ.
صحيح مسلم، ط دار إحياء التراث العربي، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي.
تيسير العلام، للبسام، الناشر: مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة العاشرة، 1426هـ - 2006 م.
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط دار الفكر بدمشق، الطبعة الأولى 1381هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عائشة رضي الله عنها قالت: سَأَلَ أُنَاسٌ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنِ الْكُهَّانِ، فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَيْسُوا بِشَيْءٍ» قَالُوا: يَا رَسُولَ اللهِ، فَإِنَّهُمْ يُحَدِّثُونَ أَحْيَانًا بِالشَّيْءِ يَكُونُ حَقًّا، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «تِلْكَ الْكَلِمَةُ مِنَ الْحَقِّ يَخْطَفُهَا الْجِنِّيُّ فَيَقُرُّهَا فِي أُذُنِ وَلِيِّهِ قَرَّ الدَّجَاجَةِ، فَيَخْلِطُونَ فِيهَا أَكْثَرَ مِنْ مِائَةِ كَذْبَةٍ».
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : कुछ लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से काहिनों (ओझों) के बारे में पूछा तो आपने फ़रमाया : "इन लोगों की बातों में कोई सच्चाई नहीं होती।" लोगों ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यह लोग कभी-कभी ऐसी बात बताते हैं, जो सच हो जाया करती है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "यह सच्ची बात वह होती है, जिसे जिन्न उचक लेता है और उसे अपने इंसान दोस्त के कान में ऐसी आवाज़ में डाल देता है, जो मुर्गी के कुड़कुड़ाने जैसी होती है, फिर यह लोग उसके साथ अपनी तरफ से सौ से अधिक झूठ मिला देते हैं।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ऐसे लोगों के बारे में पूछा गया, जो आने वाले समय से संबंधित ग़ैब की बातें बताया करते हैं, तो आपने कहा कि उनकी परवाह मत करो, उनकी बात न सुनो और उनपर ध्यान मत दो।
यह सुन सहाबा ने कहा कि उनकी बातें कभी-कभी सही साबित हो भी जाती हैं। मसलन अगर उन्होंने बताया कि अमुक महीने की अमुक तारीख़ को कोई बात होगी, तो वह हो जाती है।
इसपर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : दरअसल जिन्नात आकाश की जो थोड़ी-बहुत सूचनाएँ सुन लेते हैं, उनको वे आने वाले समय से संबंधित ग़ैब की बात बताने वाले दोस्त को बता देते हैं और फिर उसका यह दोस्त उसमें अपनी ओर से सौ झूठ मिला लेते हैं।
फ़ायदे
- आने वाले समय से संबंधित ग़ैब की बात बताने वालों को सच मानने की मनाही और इस बात का उल्लेख उनकी बताई हुई बातें झूठी होती हैं, चाहे कभी-कभार एक-आध सच सामने आ भी जाए।
- मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनने के बाद आकाश को इस बात से सुरक्षित कर दिया गया है कि शैतान वह्य आदि को सुन न सके। हाँ, अगर कोई चोरी-छुपे कुछ सुन ले और उल्का से सुरक्षित रह जाए, तो बात अलग है।
- जिन्नात कुछ इन्सानों को अपना दोस्त बना लेते हैं।
हवाला
صحيح البخاري (8/ 47) (6213).
صحيح مسلم (4/ 1750) (2228).
نزهة المتقين (2/ 1143).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 557).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (3/ 177).
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (7/ 2904).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 404).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن عمرو رضي الله عنهما أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب يوم الفتح فقال: «ألا إن كل مَأْثُرَة كانت في الجاهلية من دم أو مال تُذْكَرُ وَتُدْعَى تحت قدمي، إلا ما كان من سِقَايَةِ الحاج، وسِدَانَة البيت» ثم قال: «ألا إن دِيَةَ الخطإ شِبْه العمد ما كان بالسَّوْطِ والعَصَا مِائة من الإبل: منها أربعون في بُطُونِهَا أولادُهَا».
अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मक्का विजय के दिन खुतबा (भाषण) दिया तथा फ़रमाया : “याद रहे, रक्त एवं धन से संबंधित जाहिलियत के समय की वह सारी बातें जो गौरवपूर्ण तरीक़े से बयान की जाती हैं और जिनके दावे किए जाते हैं, मेरे पाँव तले हैं, सिवाय हाजियों को पानी पिलाने एवं काबा की सेवा के कार्य के।” फिर फ़रमाया : “गलती से किया गया वह क़त्ल, जो शिब्ह-ए-अमद (जान बूझकर किए गए क़त्ल के समान) हो तथा कोड़े एवं लाठी से किया गया हो, उसकी दियत सौ ऊँट है, जिसमें चालीस गाभिन ऊँटनियाँ होनी चाहिए।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن أبي داود، المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد-الناشر: المكتبة العصرية، صيدا – بيروت.
سنن ابن ماجه، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي-الناشر: دار إحياء الكتب العربية - فيصل عيسى البابي الحلبي.
سنن للنسائي، تحقيق: عبد الفتاح أبو غدة، الناشر: مكتب المطبوعات الإسلامية، حلب،الطبعة: الثانية، 1406 – 1986.
مسند الإمام أحمد بن حنبل، المحقق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421 هـ - 2001 م.
فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام،محمد بن صالح بن محمد العثيمين، تحقيق: صبحي بن محمد رمضان، وأُم إسراء بنت عرفة، المكتبة الإسلامية، القاهرة، الطبعة الأولى، 1427هـ.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام ، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، الطبعة الخامسة، 1423.
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بلوغ المرام من أدلة الأحكام، أحمد بن علي بن حجر العسقلاني، تحقيق وتخريج وتعليق: سمير بن أمين الزهري-الناشر: دار الفلق، الرياض، الطبعة: السابعة، 1424 هـ.
سبل السلام، محمد بن إسماعيل الصنعاني، الناشر: دار الحديث.
عون المعبود شرح سنن أبي داود، محمد أشرف الصديقي، العظيم آبادي،الناشر: دار الكتب العلمية، بيروت، الطبعة: الثانية، 1415 هـ.
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